गोल्ड से बनी बात

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गस्त माह में ही ठीक 15 अगस्त को गोल्ड दिखाई गई। यह एक असली फिल्म थी। रीमा कतगी की यह फिल्म भारतीय हॉकी पर आधारित है। यह किसी सच्ची कहानी पर आधारित नहीं है, पर सच्ची जैसी ही लगती है।

यह हमें 1947 से पहले ले जाती है। तब हम ब्रिटिश इंडिया कहलाते थे। पहला मैच ही जमर्नी में होता है। हिटलर भी फिल्म देखते हैं। उनकी जमर्नी की टीम हार जाती है।

इस फिल्म में संकेत के तौर पर बहुत सारी चीजें उभरती हैं। पहली चीज तो तपन दास (अक्षय कुमार) का चरित्र चित्रण है। यह बंगाली शराबी है। हॉकी के लिए अपनी पत्नी के जेवर तक गिरवी रखता है। उसी के साथ हॉकी फेडरेशन की राजनीति भी उभरती है।

उस राजनीति का शिकार तपन दास भी है। उसके जिम्मे हॉकी के खिलाडि़यों की खोज करना है। उस खोज के दौरान ही उसका सेंटर फारवर्ड हिंदुस्तान के बंटवारे का शिकार हो जाता है।

“गोल्ड फिल्म भारतीय हॉकी पर आधारित है । यह  किसी सच्ची कहानी पर आधारित नहीं है, पर सच्ची जैसी ही लगती है।”

यह एक मुसीबत सामने आती है। उसे फिर से हॉकी के खिलाडि़यों की खोज करनी पड़ती है। उस खोज में उसे फेडरेशन से कोई मदद नहीं मिलती। उस खोज में पहले तो वह एक जागीरदार पुत्र रघुराज प्रताप सिंह से मिलता है और उसके बाद सरदार हिम्मत सिंह से मिलता है।

दरअसल यह निर्धारित पटकथा का बेहतरीन नमूना है। हॉकी फेडरेशन की राजनीति भी इसमें है। सबसे बड़ी बात तो इसमें बौद्ध समुदाय का शामिल हो जाना है। बौद्ध लामा लंबे समय से मौन पर हैं।

लेकिन वह हॉकी के खिलाड़ी सम्राट के दीवाने हैं और जब उनसे कहा जाता है कि सम्राट भी इसमें शामिल होने बाला है। फिर तो बात बन गई। बौद्ध समुदाय की सहायता मिल जाती है। रीमा कतगी ने कोई भी दृश्य बंध फालतू नहीं रखा है।

एक दृश्य है कि तांगा कीचड़ में फंस गया है। तपन दास उसे कीचड़ से निकलाना चाहता है तो उसकी पत्नी कहती है कि जूता निकाल कर धक्का दो। तांगा आसानी से कीचड़ से निकल जाता है। यहां यह फालतू सा लगता है।

लेकिन जब ग्रेट ब्रिटेन के साथ मैच हो रहा है तो बारिश होने लगती है। हिंदुस्तानी खिलाडि़यों के पास का जूता पानी में फिसलता रहता है। तब तपन दास को तांगा की याद आती है और वह खिलाडि़यों को जूता निकालने को कहता है।

बस इसी से खेल पलट जाता है और अभी भी एक पेंच है। पेंच यह है कि तपन दास बार बार कह रहा है कि रघुराज प्रताप सिंह का खेल ब्रिटेन के लोग समझ चुके हैं। वह चाहता है कि रघुराज प्रताप सिंह के बजाय हिम्मत खेले।

रघुराज प्रताप सिंह अकेले का खेल खेलता था। वह बाल को पास देने में विश्वास नहीं करता था। हिम्मत और रघुराज में झगड़ा होता है। हिम्मत को बिठा दिया जाता है।

जब लगातार हार हो रही थी तो हिम्मत को उतारा जाता है और खेल पलट जाता भारत जीत जाता है। तपन दास के मुंह से निकलता है वंदे मातरम और भारत के जन गण मन की धुन पर दर्शक भी खड़े हो जाते हैं (कम से कम यह समीक्षक जिस थिएटर में देख रहा था)। यह गोल्ड की सबसे बड़ी जीत है।

अगस्त में ही सत्यमेव जयते पुलिस के भ्रष्टाचार के खिलाफ बनाई गई फिल्म थी। इस पर दक्षिण की फिल्मों। का बहुत असर था। यह भी कमाई वाली फिल्म साबित हुई।

 

“यह हमें 1947 से पहले ले जाती है। तब हम ब्रिटिश इंडिया कहलाते थे। पहला मैच ही जमर्नी में होता है। हिटलर भी फिल्म देखते हैं। उनकी जमर्नी की टीम हार जाती है।”

 

अगस्त माह में दिखाई गई फिल्मों में मुल्क सबसे घाटे की फिल्म साबित हुई। मुल्क में मुल्क का हाल बताती मुल्क बुनियादी तौर पर एक नकली फिल्म थी। यह एक सिनेमा है।

और सिनेमा में जैसा होता है,वैसी नाटकीयता भी है। पर यह नाटकीयता का विषय है हिंदू -मुसलमान संबंध। इसकी पृष्ठभूमि में है आतंकवाद  है। आतंकवाद के लिए जरूरी होता है मुसलमान। यहां वह है। एक पूरे परिवार की शक्ल में है।

परिवार है एडवोकेट पीर मोहम्मद (ऋषि कपूर) का और उनके भाई बिलाल (मनोज पाहवा) का और उसके बेटे शाहिद (प्रतीक बब्बर) का। इस परिवार में एक हिंदू भी है परिवार की बहू के रूप में आरती मल्होत्रा मुहम्मद (तापसी पन्नू)।

यह एक पूरा पंथ निरपेक्ष परिवार बन गया न। इस मायने में पूरा मुहल्ला ही पंथ निरपेक्ष है – आखिर बनारस का मशहूर मुहल्ला मदनपुरा जो है। अब खाली एक मदनपुरा की कहानी लिखी जाती तो बहुत सारे पचड़े हो सकते थे। तो ऐसी हालत में आतंकवाद को डाल दिया जाए।

पीर मोहम्मद का जन्म दिन है। उद्देश्य बस इतना है कि पूरा मुहल्ला एक है। यह भी समझने की बात है कि पूरा मुहल्ला दिल से नहीं मांसाहारी भोजन के लिए एक है तभी तो चौबे जी (अतुल तिवारी) छिप छिप कर कवाब खाते हैं।

बस यूं समझिए कि बनारस का मदनपुरा मुहल्ला भारतवर्ष है। इस कवाब में हड्डी बनता है शाहिद एक बम विस्फोट कर। पर यहीं से जुड़ जाता है पुलिस कप्तान दानिश जावेद (रजत कपूर) का यह दिखलाना कि वह एक कट्टर मुसलमान अफसर है कि कोई उसे मुसलमान परस्त न कहे। यहीं पर पीर मोहम्मद का शाहिद की लाश लेने ले इनकार  करना कि वह उसका भतीजा आतंकवादी नहीं है।

पर जब कोई कैलकुलेट होती है तो ऐसा ही होता। इसलिए शाहिद के पिता का संबंध आतंकवाद से जोड़ दिया जाता है ताकि अदालती ड्रामा खड़ा किया जा सके। अदालती ड्रामा में संतोष आनंद (आशुतोष राना) और तापसी पन्नू की डायलगबाजी होती है।

बिलाल की खांसी उभरती रहती है। अब पता चलता है कि वह दिल का मरीज था। अदालतबाजी के बाद जज साहब पीर मोहम्मद को सपरिवार बाइजत बरी कर देते हैं। एक और कमी है कि पीर मुहम्मद का भाई लगातार खांसता रहता है। उस पर किसी का ध्यान नहीं जाता। अंतत: वह अदालत से ही अस्पताल ले जाया जाता है।

वहां उसकी मौत हो जाती है। इस दृश्यबंध का उदेश्य यह दिखलाना था कि उसका पाकिस्तानी रिश्तेदार ने जो पैसे भेजे थे, वह आतंकवाद के लिए नहीं, उसके इलाज के लिए भेजे थे। लोगों का ध्यान अदालतबाजी पर जब होता है तो लोग मजा लेते हैं।

पर जब हिंदू समाज अपने पुराने मुसलमान परिवार को भूल सा जाता है। पाकिस्तान चले जाओ के नारे लिखता है। मुकदमा लड़ने के पहले आरती पूजा पाठ कर लेती है। एक मायने में यह अपने प्यारे मुल्क की असलियत को भी यह यह फिल्म खोलती है।

यह उतनी महान फिल्म नहीं है, जितना महान इसे बनाया या बताया जा रहा है। कुल मिला जुला कर जैसी हिंदी फिल्में बन रही हैं, उसमें यह ताजी सी बासी हवा का झोंका ही है।

पर दर्शकों को यह नहीं जंची क्योंकि अनुभव सिन्हा हिंदू -मुसलमान संबंधों को ठीक समझ न पाए और सारा समय अदालत में बरबाद किया।

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