विद्रोही चिर निद्रा में

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एक सच्चा समाजवादी दुनिया के हर कोने में हो रहे प्रत्येक विप्लव, विद्रोह, क्रान्ति, उथल-पुथल, संघर्ष, बगावत और गदर का समर्थक होता है। क्योंकि उससे व्यवस्था बदलती है, सुधरती है। जॉर्ज फर्नांडिस सदा बदलाव के पक्षधर रहे। प्राण तजकर भी इतिहास रच गये। आज भी आमजन के मनपसन्द राजनेता हैं। . . .

क ऐसा भी राजनीतिक नेता रहा जो दस साल तीन प्रधानमंत्रियों की काबीना में पांच उच्च विभागों में रहा था, मगर गया तो बेघर था। 88 वर्ष की आयु थी। नाम था जॉर्ज फर्नांडिस। राजशक्ति और जनशक्ति उसके सखा रहे पर अहंकार कभी समीप नहीं फटका। झूलता पैजामा और कुचैला कुर्ता देखकर न्यूयार्क के आव्रजन कक्ष में उसकी तलाशी ली गई कि कोई एशियाई श्रमिक तो नहीं घुसा आ रहा है। उसकी फर्राटेदार अंग्रेजी सुनी तो पता चला कि विश्व के महान लोकतंत्र का रक्षा मंत्री है, अमरीकी राष्ट्रपति का अतिथि है।
आजमगढ़ के संसदीय उपचुनाव (1978) में वह जनता पार्टी के रामबचन यादव के अभियान में आया था। मुकाबला इंदिरा गांधी की प्रत्याशी मोहसिना किदवई से था। चुनावी जलूस में मैं भी साथ था। टाइम्स आॅफ इंडिया ने तब मुझे लखनऊ में ब्यूरो प्रमुख बनाया था। आजमगढ़ के सड़क पर फुटपाथ पर बने नल से चुल्लू लगाकर उसने पानी पिया। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने नाराजगी जताई, ‘जॉर्ज तुम भारत के उद्योग मंत्री हो, रेस्त्रां में जाकर गिलास में पानी पियो’वह मुस्कराया, बोला, ‘पहले से मैं ऐसे ही पीता रहा हूं, क्यों बदलूं?’
जॉर्ज अद्भुत साथी था, अनोखा आदमी था, कुल मिलाकर एक अजूबा था, चला गया, मगर दर्द दे गया। प्राण तजकर भी जॉर्ज मैथ्यू फर्नांडिस आज इतिहास रच गये। ईसाई थे, लोदी रोड विद्युत शवदाह गृह (दिल्ली) में चिता बनी, शेष अस्थियां पृथ्वीराज रोड के ईसाई कब्रगाह में गजभर भूमि को अर्पित हुईं। जीते जी भौतिकवादी और लोहियावादी थे वे, ईसाई माता-पिता के पुत्र, सुन्नी महिला के पति (मौलाना आजाद के साथी, शिक्षाशास्त्री, हुमायूं कबीर के दामाद) गीताज्ञानी और मानसपाठी जॉर्ज से बड़ा कोई और सेक्युलर राजनेता मिलेगा? स्मृति लोप से ग्रसित थे। अपने मित्र अटल बिहारी वाजपेयी की भांति जिस युवा समाजवादी द्वारा बन्द के एक ऐलान पर सदागतिमान, करोड़ की आबादीवाली मुम्बई सुन्न पड़ जाती थी। जिस मजदूर पुरोधा के एक संकेत पर देश में रेल का चक्का जाम हो जाता था। जिस सत्तर वर्षीय रक्षामंत्री ने विश्व की उच्चतम रणभूमि सियाचिन की 18 बार यात्रा कर मियां परवेज मुशर्रफ को पटकनी दी थी। सरकारें बनाने-उलटने का दंभ भरनेवाले कारपोरेट बांकों को उनके सम्मेलन में ही जिस उद्योग मंत्री ने तानाशाह (इमरजेंसी में) के सामने हड़बड़ाते हुये चूहे की संज्ञा दी, आज वही पुरुष अनन्त में विलीन हो गया। जॉर्ज के देशभर में फैले मित्र याद करते रहे। विशेषकर श्रमिक नेता विजय नारायण (काशीवासी) और साहित्यकार कमलेश शुक्ल, जो मेरे साथ तिहाड़ जेल में बडौदा डायनामाइट केस में जॉर्ज के 24 सहअभियुक्तों में रहे। अपने 58 वर्षों के सामीप्य पर आधारित स्मृतियां लिए, एक सुहृद को याद करते मेरे इस लेख का आशय यही है कि कुछ उन घटनाओं और बातों का उल्लेख हो, जो अनजानी रहीं।
बात फरवरी 1967 की है। मुम्बई की है। तब नई नवेली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कांग्रेसी दिग्गज गंूगी गुडि़या समझते थे, हालांकि इस विशेषण को गढ़ा था लोहिया ने। चौथी लोकसभा की निर्वाचन बेला थी। स्वातंत्र्योत्तर भारत में सत्तासीन कांग्रेस पार्टी ढलान पर थी। उसकी टूट आसन्न थी। पहले तीन आम मतदान के परिणाम में तीन चौथाई सीटें जीतने वाली नेहरू की पार्टी, उनके निधन के ढाई वर्षों में ही, साठ सीटें हार गयी। सदन में सामान्य बहुमत से ग्यारह सदस्य अधिक थे। कम्युनिस्टों को वैशाखी की जरूरत पड़ गई थी।

निर्दोष जॉर्ज पर अनर्गल आरोप
डा. राम मनोहर लोहिया का चेला हो और विवादित व्यक्तित्व वाला न हो? नामुमकिन। भ्रष्टाचार के तीन भयंकर आरोप लगे थे जॉर्ज पर। कारगिल के शहीदों की लाशें लाने के लिए विदेश से अल्यूमीनियम के ताबूत का आयात किया गया। आरोप था कि इनकी खरीद में लूट हुई है। जॉर्ज को सोनिया गांधी ने ‘कफन चोर’ कहा था। तहलका ने एक स्टिंग आपरेशन में शस्त्रों की फर्जी खरीद में दलाली का आरोप लगाया। इस्राइल से शस्त्र खरीदने में भी रिश्वत का आरोप लगाया गया। सबकी सीबीआई ने जांच की। रक्षा विशेषज्ञ एपीजे अब्दुल कलाम जो बाद में राष्ट्रपति बने, ने गवाही दी थी। सोनियानीत यूपीए सरकार ने चार वर्ष तक जांच टाला। अन्तत: सी.बी.आई. ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बता दिया कि इन मामलों में जॉर्ज फर्नांडिस निरपराध हैं। इस तरह वे दोषमुक्त हुए। जिसे उच्चतम न्यायालय ने भी स्वीकारा।

उस वक्त राष्ट्र की उत्सुक नजरें मुम्बई की चार लोकसभाई सीटों पर केन्द्रित थी। वैचारिक रूप से ऊंचे कदवाले, सियासी तौर पर दृढ़ काठीवाले इन नेताओं की प्रतिद्वंद्विता भी उग्रतर हो रही थी। नेहरू के रक्षामंत्री रहे निर्दलीय प्रत्याशी वीके कृष्ण मेनन का सामना महाराष्ट्र के कांग्रेसी मंत्री एसजी बर्वे से था। कम्युनिस्ट श्रीपाद अमृत डांगे की टक्कर उद्योगपति हरीश महिंद्रा से थी। अपने दैनिक मराठा में आग उगलते सम्पादक रिपब्लिकन पार्टी के प्रह्लाद अत्रे का मुकाबला दलित कांग्रेसी आर. डी. भंडारे से था। इन सबसे ज्यादा दिलचस्प था दक्षिण मुम्बई में बेताज बादशाह, नेहरू काबीना में वरिष्ठ मंत्री रहे एस. के. पाटिल का नगर पार्षद और श्रमिक पुरोधा जॉर्ज फर्नांडिस से।
उसी चुनाव में सुदूर यूपी. में बलरामपुर से अटल बिहारी वाजपेयी, फूलपुर से विजयलक्ष्मी पण्डित, गोंडा से सुचेता कृपलानी और लखनऊ से न्यायमूर्ति आनंद नारायण मुल्ला निर्दलीय प्रत्याशी थे। मगर देश मुम्बई को एकटक निहार रहा था। उसमें भी दक्षिण मुम्बई को, जहां से महाबली पाटिल और वामनाकार जॉर्ज फर्नांडिस के बीच असमान मुकाबला था। पाटिल रथी थे, जॉर्ज विरथी। तीनों लोकसभाओं के चुनाव में अपार बहुमत से जीतनेवाले सदाशिव कान्होजी (सदोबा) पाटिल चौथी बार इसी क्षेत्र से कांग्रेस के प्रत्याशी थे। इंदिरा गांधी काबीना में वे दमदार मंत्री थे।

तिहाड़ में अखंड मानस पाठ
जार्ज की राजनेतावाली ओजस्विता तिहाड़ जेल में हमारे बड़े काम आयी। दशहरा का पर्व आया (अक्टूबर 1976)। तय हुआ कि अखण्ड मानसपाठ किया जाय। पूर्वी रेल यूनियन के नेता महेन्द्र नारायण वाजपेयी ने संचालन संभाला। मानस की प्रतियां भी आ गईं। आसन साधा गया। मुश्किल आयी कि हम हिन्दूजन केवल आधे-पौन घंटे की क्षमतावाले ही थे। कम से कम दो तीन घंटे का माद्दा केवल जार्ज में था। आखिर श्रमिक रैली, चुनावी सभाओं और लोकसभा में भाषण की आदत तो थी ही। तय हुआ कि जार्ज को पाठ के लिए 24 में से 12 घंटे चार दौर में आवंटित किये जायें। शेष हम 12 लोग एक-एक घंटे तक दो किश्तों में पाठ करें। इसमें थे सर्वोदयी प्रभुदास पटवारी जो बाद में तमिलनाडु के राज्यपाल बने (फिर प्रधानमंत्री बनते ही इन्दिरा गांधी ने उन्हें बर्खास्त कर दिया था)। स्वर्गीय वीरेन शाह थे। नामी गिरामी उद्योगपति और भाजपा सांसद, वे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे। दोहों के उच्चारण, लय तथा शुद्धता में कवि कमलेश शुक्ल माहिर रहे। आखिर पूर्वी उत्तर प्रदेश के विप्र शिरोमणि जो थे। विजय नारायण, महेन्द्र नारायण वाजपेयी, वकील जसवंत चौहान बड़े सहायक रहे। तभी भारतीय जनसंघ (तब भाजपा जन्मी नहीं थी) के विजय कुमार मल्होत्रा, सुन्दर सिंह भंडारी, केदारनाथ साहनी, मदनलाल खुराना और प्राणनाथ लेखी, अकाली दल के प्रकाश सिंह बादल आदि भी हमारे 17 नम्बर वार्ड में यदाकदा आते थे। एक बार हम सब को भोजन करते समय ये राजनेता ‘त्वदीयम् वस्तु गोविन्दम्’ उच्चारण देख अचरज में पड़ गये। वे समझते थे कि लोहिया के अनुयायी अनीश्वरवादी होते हैं।

घटना दिसम्बर 1966 की है। सदोबा पाटिल से मिलने हम संवाददाता प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में खबर की खोज में गये। उन्होंने विदेश नीति से लेकर खाद्यनीति तक अपने पांडित्यपूर्ण विचार बेलौस व्यक्त किये, हालांकि ये विषय उनके केन्द्रीय मंत्रालय से नहीं जुड़े थे। बयान तब भाषणनुमा हो रहा था। तभी मैंने उनसे पूछा कि लोकसभा के चुनाव की घोषणा चन्द हμतों में होने वाली है। आप क्या फिर दक्षिण मुम्बई से ही उम्मीदवारी करेंगे? कुछ अचम्भे के साथ वे बोले – ‘और कहां से फिर?’ मैंने पूछा कि, ‘यूं तो आप अजेय हैं, पर इस बार लोहियावादी जॉर्ज फर्नांडिस आपको टक्कर देनेवाले हैें’ तनिक भौं सिकोड़ कर पाटिल बोले, ‘कौन है यह फर्नांडिस ? वही म्युनिसिपल पार्षद ?’ मेरा अगला वाक्य था, ‘आप तो महाबली हैं आपको तो बस आपसे भी बड़ा महाबली ही हरा सकता है’ कुछ मुदित मुद्रा में वे बोले, ‘मुझे तो भगवान भी नहीं हरा सकते हैं’उस जमाने में रिपोर्टरों के पास टेप रिकॉर्डर नहीं होता थो अत: जैसे ही उनके बयानों पर विवाद उठता कि राजनेता साफ मुकर जाते थे। हम रिपोर्टरों की शामत आती थी इसीलिए बाहर निकलकर मैंने अपने संवाददाता साथियों से नोट्स मिलाये। तय हुआ कि हम सब की रपट का इंट्रो (प्रथम पैराग्राफ) होगा कि सदोबा पाटिल ने कहा कि ‘भगवान भी उन्हें नहीं हरा सकता है’ जॉर्ज, जिनका पार्षद कार्यालय मेरे आॅफिस टाइम्स आॅफ इंडिया भवन से लगा हुआ था, से मैं मिला और उन्हें हिन्दू भगवानों के अवतार के किस्से बताये, फिर कहा कि वह वामनावतार लें और विरोचनपुत्र दैत्यराज महाबली बलि (पाटिल) से भिड़ें।
जॉर्ज तब 37 वर्ष के थे। श्रमिकों के पुरोधा थे। तय कर लिया सब साथियों ने कि पाटिल को टक्कर दी जाये। यह कहानी थी दीये और तूफान की। अभियान सूत्र मात्र एक वाक्य था : ‘पाटिल कहते हैं कि उन्हें भगवान भी नहीं हरा सकता है’ फिर इसके बाद सात किश्तों में पोस्टर निकले। पहला था, ‘क्या पाटिल को साक्षात् परमेश्वर भी नहीं हरा सकते?’ और अंतिम पोस्टर था, ‘अब मुकाबला पाटिल बनाम आमजन हैे’ फिर मतदान के परिणाम आये। जॉर्ज को 48.5 प्रतिशत वोट मिले। परमशक्तिशाली, महाबलवान, अहंकारी, अजेय एस. के. पाटिल 40 हजार वोटों से हारे।
हालांकि पाटिल बनाम जॉर्ज वाले मतदान से कई निहितार्थ भी निकले हैं जिनका सीधा प्रभाव मुम्बई नगर के सियासी भूगोल पर पड़ा। मसलन कुछ राष्ट्रीय कांग्रेसियों ने अभियान के दौरान स्थानीय और बाहरीवाला मुद्दा भी चलाया। इससे तमाम गैर-मराठी भाषियों को दर्द और संवेदना हुई जो आमतौर पर पाटिल के पारंपरिक समर्थक रहे।
स्वयं पाटिल कभी भी संकीर्ण सोच के नहीं थे। जब उनके काबीना साथी यशवंतराव चव्हाण और उनमें महाराष्ट्र राज्य के गठन पर चर्चा होती थी तो पाटिल सदैव मुम्बई को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के पक्षधर रहे। उनके मराठीभाषी मित्र उनसे नाराज थे क्योंकि वे कई बार 1960 में संयुक्त महाराष्ट्र आन्दोलन के वक्त मराठी में कह चुके थे, कि ‘यावत् चन्द्र दिवाकरौ’है, मुम्बई का महाराष्ट्र में विलय नहीं होगा। पाटिल उदार और खुले दिमाग वाले थे मगर विजय-पराजय की बेला पर सारे समीकरण बिगड़ गये थे। धरती पुत्र वाला नारा जो हर लोकसभा निर्वाचन में बार-बार चलता है, तब (1967) में भी जोरों से प्रचारित हुआ था जॉर्ज की उम्मीदवारी में कई अड़ंगे थे, तो कई अटकलें भी। वे कर्नाटक के मंगलूर सागरतटीय क्षेत्र के कोंकणी-भाषी थे। मुम्बई के एक फुटपाथ से एक मजदूर की तरह जीवन शुरू किया। मुम्बई के पार्षद बने। धारा प्रवाह मराठी बोलना सीखा।
अल्पसंख्यक इसाई समुदाय के थे। मगर हिंदुत्व-बहुल समाज को स्वीकार्य थे। संसाधन से निर्धन थे पर इस कमी को उनकी श्रमिक संस्थाओं ने दूर कर दिया जब जॉर्ज ने चुनाव लड़ने का ऐलान किया तो मुम्बई लेबर यूनियन के हजारों लोग अभियान में धन और तन से जुट गय। मन तो पूरा लगा दिया था। तब एक रिपोर्टर के नाते मैं देखता था कि वस्तुत: यह चुनावी संघर्ष जनबल बनाम धनबल था। उसी वक्त कन्नौज (उत्तर प्रदेश) से दुबारा संसदीय चुनाव लड़ रहे डॉ. राममनोहर लोहिया का बयान आया कि वे समान आचार संहिता के पक्षधर हैं। एक पत्नी व्यवस्था का कानून सभी भारतीयों पर लागू कराने की मांग लोहिया ने उठाई थी। उनकी प्रेस कांफ्रेंस में एक कांग्रेस समर्थक मौलाना ने यह प्रश्न किया था। उत्तर प्रदेश में तो लोहिया के इस बयान से उनकी पार्टी को घातक हानि हुई। बरेली से इलाहाबाद तक सोशलिस्ट उम्मीदवार हारे। स्वयं लोहिया केवल पांच सौ वोटों से बमुश्किल जीत पाये। उस वक्त मुम्बई में भी जॉर्ज फर्नांडिस के मुसलमान वोट कट रहे थे। यूं भी पाटिल की कांग्रेस को मुसलमान समर्थन काफी था। दक्षिण मुम्बई के बड़े हिस्से में मुसलमान बहुलता में रहते थे बल्कि आजादी के पूर्व मोहम्मद अली जिन्ना का पाकिस्तान-समर्थक आन्दोलन उसी इलाके से चलता था। जिन्ना का यह गढ़ रहा। ऐसी विपरीत परिस्थिति में भी जॉर्ज ने केवल अपने उक्ति और तर्क से मुस्लिम महिलाओं को प्रभावित किया था कि निकाह के भेदभाव नियम की पुरुष तरफदारी करते थे। अत: उन्हें परिमार्जित करना चाहिए।
इन्दिरा गांधी का हुकुम स्पष्ट था सीबीआई के लिए कि भूमिगत जॉर्ज फर्नांडिस को जीवित नहीं पकड़ना है। दौर इमर्जेंसी का था। दो लाख विरोधी सीखचों के पीछे ढकेल दिये गये थे। कुछ ही जननेता कैद से बचे थे। नानाजी देशमुख, कर्पूरी ठाकुर आदि। जॉर्ज की खोज सरगर्मी से थी। उस दिन (10 जून 1976) शाम को बडौदा जेल में हमें जेल अधीक्षक पण्ड्या ने बताया कि कलकत्ता में जॉर्ज को पकड़ लिया गया है। तब तक मैं अभियुक्त नम्बर एक था। मुकदमों की तहरीर में भारत सरकार बनाम मुलजिम विक्रम राव तथा अन्य था। फिर क्रम बदल गया। जॉर्ज का नाम मेरे ऊपर आ गया। तिहाड़ जेल में पहुंचने पर साथी विजय नारायण से जॉर्ज की गिरμतारी का सारा किस्सा पता चला। कलकत्ता के चौरंगी के पास संत पाल कैथिड्रल है। बडौदा फिर दिल्ली से भागते हुये जॉर्ज ने कोलकता की चर्च में पनाह पाई। कभी तरुणाई में बंगलौर में पादरी का प्रशिक्षण ठुकरानेवाले, धर्म को बकवास कहनेवाले जॉर्ज ने अपने राजनेता मित्र रूडोल्फ राड्रिक्स की मदद से चर्च में कमरा पाया। रूडोल्फ को 1977 में जनता पार्टी सरकार ने राज्य सभा में एंग्लो-इण्डियन प्रतिनिधि के तौर पर मनोनीत किया था।
सभी राज्यों की पुलिस और सीबीआई के टोहीजन शिकार को सूंघने में जुटे रहे। शिकंजा कसता गया। चर्च पर छापा पड़ा। पादरी विजयन ने जॉर्ज को छिपा रखा था। पुलिस को बताया कि उनका ईसाई अतिथि रह रहा है। पर पुलिसिया तहकीकात चालू रही। कमरे में ही एक छोटे से बक्से में एक रेलवे कार्ड मिला। वह आल-इंडिया रेलवे मेन्स फेडरेशन के अध्यक्ष का प्रथम एसी वाला कार्डपास था। नाम लिखा था जॉर्ज फर्नांडिस। बस पुलिस टीम उछल पड़ी, मानो लाटरी खुल गई हो। तुरन्त प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क साधा गया। बेशकीमती कैदी का क्या किया जाए? उस रात जॉर्ज को गुपचुप रूसी फौजी जहाज इल्यूशिन से दिल्ली ले जाया गया। इन्दिरा गांधी तब मास्को के दौरे पर थीं। उनसे फोन पर निर्देश लेने में समय लगा। इस बीच पादरी विजयन ने कलकत्ता में ब्रिटिश और जर्मन उपराजदूतावास को बता दिया कि जॉर्ज कैद हो गये हंै। खबर लन्दन और बर्लिन पहुंची। ब्रिटिश प्रधान मंत्री जेम्स कैलाघन, जर्मन चांसलर विली ब्राण्ड, आस्ट्रिया के चांसलर ब्रूनो क्राइस्की तथा नार्वे के प्रधानमंत्री ओडवार नोर्डी जो सोशलिस्ट इन्टरनेशनल के नेता थे, ने इन्दिरा गांधी को मास्को में फोन पर आगाह किया कि यदि जॉर्ज का एनकाउन्टर कर दिया गया तो परिणाम गम्भीर होंगे। योजना थी कि जॉर्ज की लाश तक न मिले। गुमशुदा दिखा दिया जाता। वे बच गये और तिहाड़ जेल में रखे गये।
एक बात जॉर्ज के बारे में और। समाजवादी हो और आतिशी न हो? यही तो उनकी फितरत होती है। जॉर्ज ने रक्षामंत्री के आवास (तीन कृष्ण मेनन मार्ग) में बर्मा के विद्रोहियों का दμतर खोल दिया। ये लोग फौजी तानाशाहों के विरुद्ध मोर्चा खोले थे। तिब्बत में दलाई लामा की घर वापसी का समर्थन और उनके बागियों को धन-मन से जॉर्ज मदद करते रहे। अण्डमान के समीप भारतीय नौसेना ने शस्त्रों से लदे जहाज पकड़े जो अराकान पर्वत के मुस्लिम पीडि़तों के लिए लाये जा रहे थे।
जॉर्ज ने जल सेना कमाण्डर को आदेश दिया कि ये जहाज रोके न जाएं। श्रीलंका के तमिल विद्रोहियों ने अपने दिवंगत नेता प्रभाकरण के बाद जॉर्ज को अपना सबसे निकट का हमदर्द माना था। सच्चा समाजवादी दुनिया के हर कोने में हो रहे प्रत्येक विप्लव, विद्रोह, क्रान्ति, उथल-पुथल, संघर्ष, बगावत और गदर का समर्थक होता है। क्योंकि उससे व्यवस्था बदलती है, सुधरती है। जॉर्ज सदा बदलाव के पक्षधर रहे। इसलिए आज भी आम जन के वे मनपसन्द राजनेता हंै।
(लेखक जाने माने पत्रकार हैं। इमरजेंसी के चर्चित डायनामाइट कांड में जॉर्ज फर्नांडिस के सहयोगी रहे।)

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