मतान्तरण: लोहिया की दृष्टि में

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लोहिया की आस्था विषयक दूरदृष्टि आज के संदर्भ में बड़ी गौरतलब लगती है, खासकर सिंध (पाकिस्तान) में दो नाबालिग हिन्दू बच्चियों को जबरन मुसलमान बनाने की ताजा घटना के सिलसिले में। इसी से जुड़ जाता है सोनिया गांधी के सलाहकार टॉम वडक्कन का भाजपा में शामिल हो जाना। ये दोनों वाकये इसी पुरानी प्रथा पर फिर से बहस की व्यापक दरकार दिखाते हैं। अन्य राजनेताओं की तुलना में लोहिया की नजर अनूठी और तर्कसम्मत लगती है।
धर्म तथा मजहब जैसे विषयों पर लोहिया की उक्ति बड़ी सटीक और माकूल रही। मुम्बई में एक सार्वजनिक सभा (शिवाजी पार्क, दादर, 1966) में लोहिया ने सुझाया था कि मतान्तरण करानेवाले अकीदों तथा अपरिवर्तनशील आस्थाओं के रिश्तों को तय करने के लिए कुछ आचरण-संबंधी नियम रचित हों। मतपरिवर्तन के नाम पर छीना-झपटी को इजाजत नहीं दी जा सकती है।
‘‘टाइम्स आॅफ इण्डिया’’ के रिपोर्टर के नाते मैं इस सभा (फरवरी 1966) को कवर करने गया था। मेरी रपट को आधार बनाकर कई मराठी पत्र-पत्रिकाओं ने संपादकीय टिप्पणियां भी की थी। आज के परिवेश में जब कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी की सरकारों ने हिन्दुत्व को वैचारिक फुटबॉल और सेक्युलरवाद को राजनीतिक फितरत बना डाला है, लोहिया की पांच दशक पुरानी बात पर फिर से आत्मावलोकन होना चाहिए। खासकर राजस्थान, गुजरात कुछ अन्य राज्य विधान सभाओं द्वारा पारित मतान्तरण पर रोक लगाने वाले विधेयक के सन्दर्भ में।
देश में आये दिन, खासकर ओडिशा और कर्नाटक में हुई मतान्तरण की कुछ वारदातों से, दंगे की स्थिति पैदा हो जाती है। इसीलिए राष्ट्रहित की बात है कि सम्यक तरीके से लोहिया द्वारा सुझाये इस मुद्दे पर बहस हो और कानून बने ताकि देश की एकता बरकरार रहे।

महत्वपूर्ण बात है कि बौद्ध, जैन और सिख धर्म शांतिमय तरीके से, आग्रह से अपनी आस्था का प्रसार करते रहे। इतिहास साक्षी है कि सिर्फ इस्लाम और ईसाई मजहब ने ताकत और दौलत के दम पर अपनी आस्था गैरधर्मियों से मनवायी। भारत में इन दोनों मजहबों के अनुयायी न आकाश से अवतरित हुए और न धरती से उपजे। शमशीरे इस्लाम की बदौलत और अंग्रेजी सत्ता द्वारा प्रलोभन से हिन्दुओं का मतान्तरण सदियों से कराया जाता रहा। यदि आज भारत में आस्था का तनाव पैदा होता है तो उस पर विचार हो, निदान हो और समाधान भी। सत्रहवीं लोकसभा निर्वाचन के मद्देनजर विशेषकर। जब निर्धन हिन्दू को अर्थलोभ दिखाकर बपतिस्मा द्वारा ईसाई बनाया जाता है तो हिंदुओं का आक्रोश स्वाभाविक है। लोहिया की स्पष्टोक्ति थी: ‘‘लाखों लोगों को दबाव या प्रलोभन से विजेताओं के धर्म को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया गया है।’’ (पृष्ट 197, त्वचा का रंग, राममनोहर लोहिया रचनावलि, खण्ड 9, अनामिका प्रकाशन)।

युगों पूर्व महर्षि वेदव्यास ने कहा था ‘‘उसको भी पेड़ अपनी छाया देता है, जो उसे काटने आता है’’, अत: धर्मप्रचार हेतु हमारे देश में किसी अन्य मतावलम्बी के आगमन का विरोध करना भारत की आत्मा पर आघात जैसा माना जाता रहा है। परन्तु लोहिया की बात मानकर बहुसंख्यक हिन्दू के क्रोध और आशंका का निवारण करना होगा क्योंकि वह देखता है कि पोप के लोग भारत में निर्धन हिन्दुओं को ईसाई बनाते हैं। उसने स्वयं किसी को हिन्दू नहीं बनाया, सिवाय वर्षों पूर्व आर्य समाज के छुटपुट शुद्धि आंदोलन के। पहला आयोजित धर्मांतरण सम्राट अशोक ने कराया था, मगर वह सनातनी नहीं था, बौद्ध था। तो अब खुले दिमाग से भारत के राजनीतिक और भौगोलिक हितों के आलोक में धर्मांतरण के मसले पर भी बेलौस बात होनी चाहिए।

लोहिया राजनेता थे। अत: उन्हीं के वक्त की घटना का जिक्र हो जिस पर लोहिया ने नेहरू सरकार पर नाराजगी व्यक्त की थी। विश्व के प्रथम निर्वाचित कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री ई.एम.एस. नम्बुदिरीपाद ने केरल में (1958) ईसाइयों की राजनीतिक हरकतों का जमकर विरोध किया था क्योंकि उस वामपंथी सरकार को बर्खास्त कराने में चर्च का जबरदस्त हाथ था। कम्युनिस्ट सरकार को यकीन था कि पश्चिमी राष्ट्र और भारत के पूंजीशाह उनकी सरकार को उखाड़ने में धन और मन जुटा रहे हैं। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उस वक्त की कांग्रेस नेता इंदिरा गांधी के दबाव में ईसाई और नायर सेवा समिति की मांग को स्वीकार नम्बूदिरीपाद के निर्वाचित मंत्रिमंडल को बर्खास्त किया था। केरल विधानसभा को भंग किया। तब से पचास वर्ष बीते, ईसाई मिशनरियों ने सियासी चाल के तहत भारत के कई अंचलों में जनसांख्यिकी का धार्मिक रंग ही बदल डाला। छह राज्यों में आज हिन्दू अल्पसंख्यक हैं। बागी नागा नेता ए. जेड फिजो लंदन में बैठकर दीमापुर और कोहिमा में अलग ईसाई राष्ट्र के संघर्ष का संचालन करता था।

अब एक सार्थक चर्चा हो लोहिया की 53 साल पुरानी बात पर। मुद्दा है कि क्या धर्मांन्तरण करना ईश्वर के नियमों का अतिक्रमण नहीं है? ऐच्छिक और प्रेरित क्रियाओं को परखकर और उनमें भेद कर एक राष्ट्रनीति तय करनी होगी। जिन दिनों पूर्वांचल सीमाओं पर ईसाई मिशनरियों की सक्रियता से पृथकतावादी आंदोलन तेजी पर था, तो डॉ. राममनोहर लोहिया ने प्रश्न उठाया था कि ‘यहूदी, पारसी और सनातन धर्मावलंबियों तथा इस्लाम और ईसाई मतों में परस्पर रिश्तों का आधार कैसा हो। उनमें आपसी शिकार-चोरी (पोचिंग) मान्य न हो।’
यह निर्विवाद है कि मतान्तरण को प्रेरित अथवा प्रायोजित करना राजनीतिक मुहावरे में दल-बदल कराना जैसा है, जिसे रोकने हेतु एन्टि-डिफेक्शन कानून बना है। मतान्तर कराना एक किस्म की हिंसा भी है। हालांकि तमिलनाडु के अनीश्वरवादी मुख्यमंत्री एम. करूणानिधि ने धर्म परिवर्तन को नागरिक का मौलिक अधिकार बताया है। इन्हीं कारणों और आधारों पर अगली संसद को अधिनियम बनाना होगा ताकि धर्म का इस्तेमाल सियासी लक्ष्य पाने अथवा नव-उपनिवेशवाद के प्रसार के लिए न होने दिया जाये। अफ्रीका में लोग बाईबिल लेकर गये थे और उन्हीं पादरियों ने सोने की खान और जमीन अपने कब्जे में ले लिया। ऐसी ही मंशा से ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1820 में पादरियों की मांग पर कि भारत को ईसाई राष्ट्र बनाया जाय, स्वयं को अशक्त पाया था। उच्च ईसाई शिक्षा की संभावनाओं के अध्ययन पर बने लिण्डसे आयोग ने 1931 में पाया था कि भारत में हिन्दूधर्म वट वृक्ष की जड़ों की भांति इतना गहरा है कि उसे शिक्षा के माध्यम से उखाड़ा नहीं जा सकता है। हालांकि ब्रिटिश साम्राज्य ने भारतीय ईसाइयों को अपना नींव पत्थर बनाया था।

स्वतंत्रता के बाद सेक्युलर भारत ने हिन्दी वर्णमाला के पुस्तक में मतान्तरण अवश्य किया कि ‘ग’ से गणेश शब्द को हटा कर एक चौपाये की तस्वीर छापी। वह गधा था। उसी दौर की बात है। जबलपुर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति डॉक्टर भवानी शंकर नियोगी की अध्यक्षता में बने आयोग ने 1954 में रपट दी थी कि ईसाई मिशनरियां अंतरराष्ट्रीय गुप्तचरों का काम कर रही हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने 1977 में निर्णय दिया था कि धर्मांतरण छल, छद्म और प्रलोभन से कराना अवैध है। इसी मंतव्य को 21 जनवरी 2011 में सर्वोच्च न्यायालय ने ईसाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस के हत्यारे दारा सिंह को आजीवन कारावास के निर्णय पर फिर व्यक्त किया था। याद रहे कि इटली के राष्ट्रनायक गैरी बाल्डी ने उस समय के पोप को इटली का कैंसर और ढोंगी कहा था। प्रोटेस्टेन्ट ईसाई धर्मगुरू मार्टिन लूथर ने पोप को यीशु का शत्रु कहा था। यह सर्वविदित है कि यमुनातीरे, इन्द्रप्रस्थे भारतवर्षे कोई भी संगठन, खासकर हिन्दुवादी किसी ईसाई धर्मगुरू का अपमान नहीं करता है। क्योंकि हमारी मान्यता रही है ‘अतिथि देवो भव’। फिर भी राष्ट्र की अस्मिता के लिए स्वार्थी प्रचारकों के ढोंग से भिड़ना आवश्यक है। लोहिया की बात सुनें, पांच दशक बाद ही सही।

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