हादसा नहीं हत्या !

0
53

राब थी कच्ची, पर जहरीली थी। सस्ती थी लेकिन गरीब इंसान की ‘हत्या’ करने का पर्याप्त मसाला था उसमें। कहने को वह बिकती है अवैध रूप से मगर संरक्षण पुलिस, आबकारी विभाग से लेकर नेताओं तक का मिलता है। इसलिए जब कभी अवैध कच्ची शराब इंसान की इहलीला को खत्म कर देती है तो सरकारी व्यवस्था जांच कराने की रस्म अदायगी भर करती है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड के सीमावर्ती क्षेत्र में पिछले दिनों जहरीली शराब पीने से सौ से ज्यादा लोगों की जान चली गई। मरने वालों में एक भी अमीर या मध्यम वर्गीय परिवार से नहीं था। सब के सब गरीब थे। इनमें से कइयों के घर में खाने का दाना हो या न हो पर इनके घरों में जहरीली शराब जरूर पहुंच जाती है। पैसा कमाने के चक्कर में शराब के धंधेबाज गरीबों की हत्या कर रहे हैं।

जी हां, हत्या। शराब से हुई मौतों को हादसा कहना बेमानी होगा। उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड के सीमावर्ती क्षेत्रों की घटना से एक दिन पहले उत्तर प्रदेश के करीब कुशीनगर में ऐसी ही घटना हुई थी। वहां भी जहरीली शराब पीने से एक दर्जन के करीब लोगों की मौत हो गयी। शराब पीने के अगले दिन सहारनपुर, मेरठ, कुशीनगर और हरिद्वार के अस्पतालों से एक के बाद एक मौत की खबरें आने लगीं। दो दिन के अंदर ही मौत का आंकड़ा शतक पूरा कर आगे बढ़ गया। अभी भी कई और मरीजों की स्थिति गंभीर बनी हुई है। मौत की संख्या जैसे-जैसे आगे बढ़ती गयी, वैसे-वैसे दोनों राज्यों के नेताओं के मुंह से मृतकों के लिए संवेदना और दर्द के शब्द निकलने लगे। मगर इन नेताओं में से किसी ने भी पीछे झांक कर नहीं देखा कि ऐसी घटना पहली बार नहीं हुई है। हर साल और हर सरकार में गरीबों की जान जहरीली शराब पीने से जाती रही है, मगर कोई सरकार जांच कराने के रस्म से आगे नहीं बढ़ी। वह भी तभी तक जब तक अस्पताल में दम तोड़ते मरीजों की तस्वीर मीडिया में जगह बना पाती है। अपने देश में गरीबों की जान बहुत सस्ती है।

दो-चार, दस जान तो मीडिया में जगह भी नहीं बना पाती। सिर्फ कल्पना करें कि यदि किसी फाइव स्टार क्लब में शराब पीने से एक इंसान की मौत हो जाए। पूरे राष्ट्रीय मीडिया पर वह ‘प्राइम टाइम’ के साथ-साथ दिन भर सुर्खियां बटोरता! यह भी अपने ही देश में होता है जहां बड़े-बड़े विज्ञापनों में शराब इंसानों के स्वास्थ्य के लिए जानलेवा और हानिकारक है, वहीं सरकारी खजानों के लिए वह ‘टॉनिक’ है। ऐसी हर बड़ी दुर्घटना के बाद एक सरकारी परंपरा रही है। सरकार जांच बैठाती है। उससे आगे एकदो अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होती है, बस। इससे आगे कुछ नहीं। इस बार उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने इससे एक कदम आगे बढ़ाया है। एक तो मौत पर एसआईटी जांच और दूसरा पूरे राज्य में पुलिस की एक खास टीम गठित की। इस टीम ने विभिन्न जिलों में अवैध शराब की बिक्री के खिलाफ अभियान भी शुरू कर दिया। मगर यह अभियान कब तक चलेगा और अवैध शराब माफिया के नेटवर्किंग को स्थायी रूप में खत्म कर पाता है या नहीं, ऐसी आशंका बनी हुई है। गुजरात और बिहार जैसे शराब बंदी वाले राज्य इसका प्रयोग पूरी तरह बंद करने की खुशफहमी में हैं, मगर अवैध शराब की बिक्री और इनसे मौतें, इन राज्यों में भी होती है। इसका सीधा अर्थ है, इनका नेटवर्क स्थानीय या क्षेत्रीय नहीं बल्कि राष्ट्रीय है। इसे ध्वस्त करने के लिए एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ-साथ नेक और ईमानदार नेतृत्व की जरूरत होगी। जब तक ऐसा कोई नेतृत्व नहीं आता तब तक हर कोई यही प्रार्थना करे कि ऐसा हादसा जल्दी गरीब के देहरी पर न आए।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here