मानव गरिमा के खिलाफ

जब इसरो ने एक दिन में 104 उपग्रह छोड़ने का कीर्तिमान बनाया तो पूरे देश का मस्तक गर्व से ऊंचा हो गया था। परमाणु हथियारों को ले जाने में सक्षम अग्नि मिसाइल-5 का सफल परीक्षण हुआ तो भी हम खुश हुए। होना भी चाहिए। आखिर यह हमारी उपलब्धि है। लेकिन इसी कालखंड में जब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली, गुजरात, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश आदि राज्यों से शुष्क शौचालयों से मानव-मल की सफाई या सीवर की सफाई कर रहे मजदूरों की मौत की खबर सुनते हैं, पढ़ते हैं तो लगता है कि हमारी प्रगति अधूरी है।

21वी सदी के दूसरे दशक में इस तरह की खबरें विकास को मुंह चिढ़ाती हैं। साफ है कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है। दिसंबर माह में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की एक रिपोर्ट इसकी तस्दीक करती है। उस रिपोर्ट के अनुसार पूरे देश में अब भी करीब 14 हजार शुष्क शौचालय कायम हैं जहां मानव-मल का निष्पादन सफाईकर्मी ही कर रहे हैं, जहां मानव-मल साफ करने के लिए जल की व्यवस्था ही नहीं है। सबसे ज्यादा 11,563 शुष्क शौचालय उत्तर प्रदेश में हैं। हालांकि आबादी के हिसाब से यह देश का सबसे बड़ा राज्य है। आबादी 22 करोड़ से अधिक है। इसके बावजूद यह शर्मनाक पहलू है।

दूसरे नंबर पर कर्नाटक है जहां 632 शुष्क शौचालय हैं। फिर तमिलनाडु, राजस्थान, ओडिशा, असम, बिहार, उत्तराखंड, पश्चमी बंगाल आदि का नंबर आता है। केवल शुष्क शौचालय ही नहीं हैं जहां अस्वास्थ्यकर हालात में सफाई करनी पड़ती है। पूरे देश में कायम लचर सीवर व्यवस्था के कारण सैकड़ों सफाई मजदूर अपनी जान गंवा चुके हैं। देश में कई शहर और जिले ऐसे हैं जहां सीवर व्यवस्था ही नहीं है। अब आप कल्पना कर सकते हैं कि वहां किस गंदे हालात में मजदूरों को काम करना पड़ता होगा। पूरे देश से आये दिन सीवर साफ कर रहे सफाईकर्मियों की मौत की खबरें आती रहती हैं। रेलवे ट्रैक से आज भी हजारों मजदूर मानव-मल हटाते देखे जा सकते हैं। केंद्र और राज्य सरकारों ने इसमें सुधार का अभियान चला रखा है लेकिन अभी इस कलंक को मिटाने में समय लगेगा। ऐसी मशीनों का निर्माण किया रहा है जिनसे सीवर के अंदर जाये बिना सफाई की जा सकती है। इनका प्रयोग जैसे-जैसे बढ़ेगा, सफाई की स्थिति में सुधार होगा और मानव-मौतें भी कम होंगी। रेलवे मंत्रालय ने 2022 तक सभी रेलगाडि़यों में बायो-टॉयलेट के निर्माण का संकल्प व्यक्त किया है। रेलवे कोचों में सवा लाख से अधिक बायो- टॉयलेट बनवाये जा चुके हैं। इनसे हर दिन चार हजार मीट्रिक टन मानव-मल का निष्पादन किया जाता है। इस मामले में केंद्र सरकार का स्वच्छ भारत अभियान काफी कारगर साबित हो रहा है।

मोदी सरकार के साढ़े चार साल के कार्यकाल में करीब नौ करोड़ शौचालयों का निर्माण किया जा चुका है। इनमें शहरों के अलावा कस्बे और दूरस्थ गांव भी शामिल हैं। आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़, छत्तीसगढ़ और अंडमान निकोबार द्वीप समूह में शत-प्रतिशत शौचालय बनाये जा चुके हैं। ओडिशा, गोवा, बिहार, तेलंगाना और त्रिपुरा शत-प्रतिशत लक्ष्य प्राप्त करने की ओर बढ़ चले हैं। सरकारी प्रयास अपनी जगह है। मूल सवाल यह है कि समाज क्या कर रहा है? क्या समाज की ओर से इस कलंक को मिटाने की आवाज उठी? हां, समाज दो कदम आगे तो बढ़ा है। स्वच्छ भारत अभियान की यही सबसे बड़ी सफलता है। यह अभियान जन आंदोलन बन गया है। अब लोग सफाई रखने और गंदगी न करने के प्रति संकल्पबद्ध दिखने लगे हैं। समाज का यह अभियान जैसे- जैसे आगे बढ़ेगा, हम सफलता के सोपान की ओर उतनी तेजी से बढ़ेंगे। फिर गर्व से कह सकेंगे- ‘स्वच्छ भारतस् वस्थ भारत।’

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