पूर्वोत्तर में विकास का सेतु

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वर्ष 2014 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नरेंन्द्र मोदी ने कहा था कि पूर्वोत्तर के विकास के बिना देश का विकास अधूरा है। सत्ता में आने पर उनकी कोशिश होगी कि पूर्वोत्तर को शेष देश से जोड़कर उसे विकास-पथ पर सरपट दौड़ाएं। मोदी तब भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे। कहना न होगा कि पूरे बहुमत से सरकार बनाने के बाद उन्होंने अपना वादा निभाया। उनकी ही कोशिशों का नतीजा है कि ब्रह्मपुत्र नदी पर 21 साल से लटका डबल डेकर (रेल-सड़क) बोगीबील पुल चार साल में पूरा हो गया। इस पर नीचे डबल लाइन है जिस पर रेलगाड़ी का परिचालन शुरू हो गया। ऊपरी हिस्से पर तीन लेन की सड़क पर भी आवागमन शुरू हो गया। 1997 में तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा ने इस पुल का शिलान्यास किया था। उसका काम अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में 2002 में शुरू हुआ था। उसे गति मिलती, उससे पहले वाजपेयी सरकार सत्ताच्युत हो गयी।

संप्रग सरकार के 10 सालों में खास प्रगति नहीं हुई। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन 25 दिसंबर को मोदी ने उसका लोकार्पण किया। फिर दोहराया कि पूर्वोत्तर को विकास की मुख्य धारा से जोड़ने का सिलसिला जारी रहेगा। 4.94 किलोमीटर लंबा यह पुल देश का सबसे बड़ा डबल डेकर पुल है। अपनी तरह का यह पुल एशिया का दूसरा सबसे बड़ा पुल है। इसे दो यूरोपीय देशों स्वीडेन और डेनमार्क को जोड़ने वाले पुल की तरह बनाया गया है। इसके निर्माण से पूर्वोत्तर के राज्यों के विकास को नई गति मिलेगी। असम और अरुणाचल प्रदेश में ब्रह्मपुत्र नदी के दोनों ओर बसे 50 लाख से अधिक लोगों को सबसे ज्यादा फायदा होगा। इन लोगों का आावागमन बहुत कम समय में हो सकेगा। इस पुल के न होने से इन लोगों को बहुत लंबा चक्कर लगाकर नदी पार करनी पड़ती थी। इसके बनने से करीब 150 किलोमीटर की दूरी कम हो गयी। डिब्रूगढ़ से अरुणाचल तक जाने के लिए किसी व्यक्ति को असम की राजधानी गुवाहाटी से होकर जाना पड़ता था। 500 किलोमीटर की अधिक दूरी तय करनी पड़ती थी।

अब केवल 100 किलोमीटर दूरी तय कर आावागमन हो सकेगा। पुल से अरुणाचल के दूरस्थ जिलों तक गमनागमन सरल हो गया। असम में तिनसुकिया और अरुणाचल प्रदेश के नाहरलागुन के बीच रेलयात्रा का समय 10 घंटे से भी कम हो गया। यही नहीं, शेष भारत के लोगों को असम और मिजोरम के कई हिस्सों तक रेल से पहुंचने में पांच घंटे कम लगेंगे। इस पुल को बनाने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ी। एक तो भूकंप की दृष्टि से यह क्षेत्र बहुत संवेदनशील है। दूसरे यहां प्राय: भारी बरसात होती है। इसीलिए इसे पूरी तरह स्टील का बनाया गया है। इसकी उम्र 120 वर्ष आंकी गयी है। सात रेक्टर स्केल पर आये भूकंप से भी इसे क्षति न पहुंचने का दावा किया जा रहा है। इसका दूसरे सबसे बड़ा फायदा सेना को होगा। युद्ध के समय इस मार्ग से सीमा पर तेजी से हथियार और रसद को पहुंचाया जा सकेगा। आपातकाल में इस पर लड़ाकू विमान भी उतारे जा सकेंगे। पूर्वोत्तर की सुरक्षा अब पहले से सदृढ़ हो गयी है। चीन से लगी भारत की करीब चार हजार किलोमीटल लंबी सीमा का करीब 75 फीसद हिस्सा अरुणाचल प्रदेश में है। इससे भारतीय सेना के लिए आवागमन सरल हो गया है। इस तरह के पुल और अन्य आधारभूत सुविधाओं के न होने से 1962 के भारत-चीन युद्ध में सेना को भारी क्षति उठानी पड़ी थी।

सेना को सीमा तक पहुंचने में देर लगी थी। अन्य जरूरत की चीजें सुलभ न होने से उन्हें हार का मुहं देखना पड़ा था। चीन ने शुरू में ही भारत से लगी अपनी सीमा पर आधारभूत संरचना को सुदृढ़ कर लिया था, करता भी जा रहा है। आजादी के छह दशक तक यहां आधारभूत संरचना को मजबूत करने पर खास ध्यान नहीं दिया गया। पहले वाजपेयी सरकार और अब मोदी सरकार ने इस पर ध्यान दिया। इसी का नतीजा है कि अपने को शेष भारत से अलग-थलग महसूस करने वाले पूर्वोत्तर के निवासी अब ‘दिल्ली’ से नजदीकी महसूस कर रहे हैं। विकास के नये पथ की ओर बढ़ चले हैं।

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