पुस्तक मेला एक छत के नीचे ज्ञान का विपुल भंडार

0
69

दिल्ली के प्रगति मैदान में जब पांच से 13 जनवरी तक विश्व पुस्तक मेला का आयोजन किया गया, उसी दौरान 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस भी था। यह स्वामी विवेकानन्द की जयंती का दिन है, उस संन्यासी का जन्मदिन, जिसने संन्यास को भी भावी पीढ़ी की शिक्षा के लिए समर्पित कर दिया। साल 1894 की 23 जून को शिकागो से मैसूर के महाराजा को उन्होंने एक पत्र लिखा था। पत्र में कहा गया कि स्कूल खोलने से बेहतर है कि एकनिष्ठ और त्यागी साधुओं को ऐहिक शिक्षा का भी प्रशिक्षण दिया जाय। इसका परिणाम यह होगा कि मां-बाप के साथ काम करने वाले मजदूर बच्चे भी शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे। स्पष्ट है कि स्वामी जी शिक्षा को जरूरतमंदों के द्वार तक पहुंचाने के हक में थे।
दरअसल, पुस्तक मेलों का आयोजन भी स्वामी विवेकानन्द के उस महती उद्देश्य का एक अंग है। आज प्राथमिक से उच्चतर स्तर की शिक्षा के अनगिनत संस्थान स्थापित हैं। राजतंत्र से लोकतंत्र में प्रवेश के साथ शिक्षण संस्थान और प्रशिक्षित शिक्षक, दोनों ही क्षेत्र में गुणात्मक विस्तार हुआ है। दुनिया में शिक्षण के बढ़ते और व्यापक होते क्षेत्र के अनुरूप शिक्षण सामग्री एक ही जगह मिले, यह भी शिक्षा को लोगों के द्वार पहुंचाने का एक ढंग है। इस मायने में नेशनल बुक ट्रस्ट (एनबीटी) का भारत व्यापार संवर्धन संगठन यानी इंडियन ट्रेड प्रमोशन आॅर्गनाइजेशन (आइटीपीओ) से मेले को नि: शुल्क करने की मांग सराहनीय है। इस बार आइटीपीओ कुछ नरम भी हुआ। परिणाम के तौर पर 30 और 20 रुपये के प्रवेश टिकट क्रमश: 20 और 10 रुपये के कर दिए गये।
टिकट सस्ती कराने के साथ एनबीटी ने मेले के प्रचार पर भी खासा जोर दिया। वैसे स्कूल ड्रेस में आने वाले बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों के लिए कोई शुल्क नहीं था। ‘रीडर्स विद स्पेशल नीड्स’ थीम वाले मेले का उद्घाटन करते हुए मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा, ‘इस थीम के पीछे विचार यह है कि सम्मान व समानता की भावनाएं पैदा हों, सहानुभूति नहीं।’ थीम पवेलियन में विशेष तौर पर ब्रेल किताबें, आॅडियो किताबें, प्रिंट-ब्रेल किताबें प्रदर्शित करने के साथ बच्चों और दिव्यांग जन के लिए अन्य कई सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी की गईं। मेले के दौरान अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के अंतर्गत ‘वी केयर’ में 27 देशों की ओर से 47 फिल्मों का प्रदर्शन तय था। इन 27 देशों में भारत, कनाडा, अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, घाना, हांगकांग व कई यूरोपीय देश शामिल हुए।
इस बार शारजाह मेले का अतिथि प्रतिभागी देश था। उसके पवेलियन में किताबों का लोकार्पण, साहित्यिक आयोजन, प्रकाशकों के संवाद हुए, तो कविता पाठ व बच्चों की गतिविधियां भी रखी गईं। इस पवेलियन के बाहर लोग अमीराती लोक वाद्य का आनंद लेते रहे। इस बार पुस्तक मेले में व्यापार, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी,सामाजिक विज्ञान और मानविकी के साथ बाल एवं शैक्षणिक पुस्तकें खूब बिकीं। हॉल संख्या 7 ए, बी और सी में विदेशी प्रकाशनों में भी लोगों की रुचि दिखी। हॉल संख्या 7 सी में ही चित्र प्रदर्शनी आयोजित हुई तो महात्मा गांधी के 150 साल पर विशेष प्रदर्शनी हॉल सं. 7 (फोयर) में लगी। हॉल संख्या 8 (प्रथम तल) और कॉन्फ्रेंस हॉल ( हॉल संख्या 7 का प्रथम तल) संगोष्ठियों और विशेष आयोजन के लिए निश्चित किए गये थे। जरूरतमंद लोगों के लिए प्रोटोकॉल वाले बैट्री-चालित वाहन, व्हील चेयर, स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एंबुलेंस आदि का भी इंतजाम रहा। मेलों में जनहित की ये व्यवस्थाएं अपेक्षित होती ही हैं, मूल यह कि मेले का मुख्य केंद्र प्रभावी रहे। प्रगति मैदान में पुनर्निर्माण के बावजूद, इस वर्ष विश्व पुस्तक मेला पहले से अधिक प्रभाव छोड़ सका।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here