नवोन्मेष की अलख जगाएं

0
39

भविष्य के भारत के लिए शैक्षिक पुनरुत्थान जैसे विषयों का मंथन बहुत आवश्यक है और समय की मांग भी है। जब मैं पुनरुत्थान जैसे शब्द के बारे में सोचता हूं, तो मन-मस्तिष्क में सबसे पहले छवि स्वामी विवेकानंद की उभरकर आती है। स्वामी विवेकानंद ने ही दशकों पहले भारत के दर्शन की शक्ति का पुनरुत्थान दुनिया के सामने प्रस्तुत किया था। यह उस समय की बात है जब दुनिया एक प्रकार से हमारे देश की क्षमता, हमारा सामर्थ्य, हमारा योगदान, हमारा
पुरुषार्थ, हमारा पराक्रम सब कुछ भूल चुकी थी। स्वामी विवेकानंद की बात से ही मैं अपनी बात शुरू करना चाहता हूं। उन्हों ने शिक्षा के बारेमें एक महत्वपूर्ण बात कही थी, मैं समझता हूं, हमारे आज के सम्मेलन का मार्गदर्शक सिद्धांत हो सकता है। उन्होंने कहा था कि हमें ऐसी सर्वसम्पन न शिक्षा चाहिए जो हमें मनुष्य बना सके। शिक्षा सिर्फ उस जानकारी का नाम नहीं है, जो आपके मस्तिष्क में भर दी गई है। हमें तो भावों या विचारों को इस प्रकार आत्मसात करना चाहिए, जिससे जीवन निर्माण हो, मानवता का प्रसार हो और चरित्र गठन हो। ये स्वामी विवेकानंद की बातें हैं। ये तीन तत्व आज की शिक्षा के तीन स्तम्भ हैं, जीवन निर्माण, मानवता और चरित्र गठन। स्वामी जी के इन्हीं विचारों से प्रेरित हो करके मैं आज इसमें एक और स्तम्भ जोड़ने का साहस करता हूं। क्योंकि यह समय की मांग है.. और वो है – नवोन्मेष, नव उन्मेष। जब नवोन्मेष अटक जाता है तो जिंदगी ठहर जाती है। कोई युग, कोई काल, कोई व्यवस्थाा ऐसी नहीं हो सकती है कि जो नवोन्मेष के बिना चल सकती है। जीवंतता का भी अगर एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है तो वो नवोन्मेष है। और अगर नवोन्मेष नहीं है तो जिंदगी को ढोना होता है। वयवस्थाएँ , विचार, जिंदगी परंपराएं ये सब बोझ बन जाती हैं। अगर हम इन चारों पहलुओं को लेकर अपनी उच्च शिक्षा के पुनरुत्थान के बारे में सोचेंगे, तो हमें एक सही दिशा दिखाई देती है। शिक्षा की ऐसी दिशा जो व्यक्ति के जीवन से ले करके समाज की जरूरतों और राष्ट्र के निर्माण तक में काम आए।

ऐसा किया, हमने लैब में वैसा किया, मैं चकित हो जा रहा था। हमारे बच्चों में कितना दम-खम (पोटेंसियल) है? उनको थोड़ा सा अवसर दिया जाए, उनकी भीतर की शक्तियों को उभरने दिया जाए, कल्पना से बाहर का परिणाम देते हैं। थोपा न जाए, समस्या वहीं पैदा होती है।

हमारी सरकार शिक्षा जगत में निवेश पर भी ध्यान दे रही है। जैसे शिक्षा का आधारभूत ढांचा बेहतर बनाने के लिए राइज यानी ‘रिविटलाइजिंग आॅफ इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड सिस्टम इन एजुकेशन’ कार्यक्रम को हमने व्यापक रूप से शुरू किया है। जब 2022 में भारत की आजादी के 75 साल होंगे। इसके जरिये 2022 तक एक लाख करोड़ रुपये खर्च करने का हमारा इरादा है। सरकार ने हेरा यानी हायर एजुकेशन फंडिंग एजेंसी की स्थापना भी की। जो उच्च शिक्षा संस्थान के गठन में आर्थिक सहायता मुहैया कराएगी। सरकार ने राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान का बजट भी तीन गुना बढ़ाने का निर्णय किया है। राज्यों में उच्च शिक्षा को मजबूत करने में प्रभावी कदम साबित होंगे।

पिछले चार सालों में देश में बहुत सारे नये आईआईटी, नये आईआईएम, नये आईआईएसईआर और नये आईआईआईटी, नये केंद्रीय विश्वविद्यालय स्वीकृत किए हैं। सरकार एक नीति भी लाई है, जिसके अंतर्गत देश में 20 इंस्टीट्यूट आॅफ इमिनेंस स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। इसमें 10 सार्वजनिक क्षेत्र और 10 निजी क्षेत्र में स्थापित होंगे। इस नीति का मकसद देश के शिक्षा संस्थानों को दुनिया के सिद्ध संस्थानों की सूची में शामिल करना है। आज हम विश्वस्तर की सर्वोच्च 500 में बहुत कम संख्या में नजर आते हैं। यह स्थिति हमें बदलनी है और इसके लिए सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के हर संस्थान पर लगभग एक हजार करोड़ रुपये अगले कुछ वर्षों में खर्च करेगी। आप इस बात से भी भलीभांति परिचित होंगे कि ग्लोबल इनीशियेटिव फार एकेडमिक नेटवर्क यानी ज्ञान योजना के तहत हम भारतीय संस्थाओं में पढ़ाने के लिए दुनियाभर के सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों को आमंत्रित कर रहे हैं।

हमारी सरकार शिक्षण संस्थानों में विचारों के खुले प्रवाह की पक्षधर है। हमने आईआईएम जैसे संस्थानों को स्वायत्तता देकर इसकी शुरुआत कर दी है। मैं हैरान हूं देश में इस बात की चर्चा नहीं हो रही है। विद्वानजन भी पता नहीं चुप बैठे हैं? आईआईएम में जो सुधार किए गए, शायद हिन्दुस्तान में जो सुधार की बड़ी-बड़ी वकालत करने वाले लोग थे, जो पिछले 20-25 साल से लिखते रहे होंगे, शायद उन्होंने भी सोचा नहीं होगा। लेकिन हो जाने के बाद कहीं अच्छा कहेंगे तो मोदी के खाते में चला जाएगा तो मुसीबत होगी, लिखना बंद कर देंगे। इसकी वजह से बड़ा बदलाव आया है। आईआईएम को अपना कोर्स, अपना पाठ्यक्रम, अध्यापकों की नियुक्ति, यहां तक कि बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति और विस्तार के बारें खुद ही निर्णय लेना है। आप कर लीजिए, मैंने यही कहा है, मुझे करके दिखाइये, सरकार कहीं नहीं आएगी। कोई ‘बाबू’ आ करके नहीं बैठेगा। अब यह उनका जिम्मा है वो करके दिखाएं।

इतना ही नहींए शिक्षा की इस दिशा को गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने उसी कालखंड में अलग तरीके से समझाया था। तभी तो उन्होंने कहा था कि हर व्यक्ति का जन्म किसी न किसी लक्ष्य के साथ होता है। और उस लक्ष्य को पाने में शिक्षा का बहुत बड़ा योगदान होता है। मैं इसी बात को आगे बढ़ाते हुए भी कहूंगा कि जैसे व्यक्ति के जीवन में हैए हर संस्था का जन्म भी किसी न किसी निर्धारित लक्ष्य के साथ होना चाहिए और फिर इसके लिए साधन और साध्य में एक सूत्रता भी होनी चाहिए।
जब बात विद्याए विद्यालयए विद्यार्थी की हो रही हो तो मैं आपका ध्यान अपने देश की पुरातन गौरवशाली परंपरा की तरफ भी ले जाना चाहता हूं। हमारी संस्कृति का आधार स्तंभ वेद है। आप सभी इस बात को जानते हैं कि वेद संस्कृत भाषा के विद् शब्द से बना हैए जिसका शाब्दिक अर्थ ज्ञानग्रंथ है। इसी विद् से विद्या शब्द विकसित हुआ हैए यानी ज्ञान के बिना हमारे समाजए हमारे देशए और तो और हमारे जीवन के आधार की भी कल्पना कतई नहीं की जा सकती है। साथियों ज्ञान और शिक्षा सिर्फ किताबें नहीं हो सकती हंै। शिक्षा का मकसद व्यक्ति के हर आयाम को संतुलित विकास करने का होए और आप सभी जानते हंै कि संतुलित विकास इसके लिए निरंतर नवोन्मेष अनिवार्य होता है। हमारे प्राचीन तक्षशिलाए नालंदाए विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों में ज्ञान के साथ नवोन्मेष पर भी जोर दिया जाता था। तभी तो ऐसे विद्या के मंदिरों से आचार्य चाणक्यए आर्य भट्टए पाणिनीए धनवंतरिए चरकए सुश्रुत अनगिनत विद्वान उससे निकले थे। अगर इन्होंने सिर्फ किताबी ज्ञान को पर्याप्त मान लिया होता तो क्या दुनिया को राजनीतिशास्त्र अर्थशास्त्रए खगोल विज्ञानए शल्य चिकित्साए गणित और व्याकरण के नियम मिल पाते क्याघ् वो शायद नहीं मिलते। और इसलिए जब शैक्षिक पुनरुत्थान की बात होती हैए तो सोच मेंए विचारों मेंए नवीनता के बिना काम नहीं चल सकता।

शिक्षा और शिक्षा में किताबी ज्ञान को लेकर हमारे देश के आधुनिक इतिहास के तीन महापुरुषों के विचार एक जैसे थे।
बाबा साहब भीमराव अम्बेडकरए पंडित दीनदयाल उपाध्याय और डॉण् राममनोहर लोहिया। इन्होंने शिक्षा में चरित्र और समाजहित का प्रतिबिम्ब देखा और बाबा साहब अम्बेडकर ने कहा. चरित्रहीन व विनयहीन सुशिक्षित व्यक्ति पशु से अधिक खतरनाक होता है। यदि सुशिक्षित व्यक्ति की शिक्षा गरीब जनता के हित की विरोधी होगीए तो व्यक्ति समाज के लिए अभिशाप बन जाता है। शिक्षा से अधिक महत्व चरित्र का है। यह शब्द डॉण् बाबा साहब अम्बेडकर के हैं। वहींए पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भी शिक्षा के सामाजिक दायित्वों को जोड़ करके कहा था कि समाज को हर व्यक्ति को ढंग से शिक्षित करना होगाए तभी वह समाज के प्रति दायित्वों को पूरा करने में सक्षम होगा। यहां उन्होंने शिक्षा को संस्थान तक सीमित नहीं रखा विचारए समाज ने ही समाज को शिक्षित करनाए एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को संस्कार संक्रमण करती है उस विचार को आधुनिक स्वरूप में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने देखा था। देश के मनीषी डॉण् राममनोहर लोहिया भी कहते थे कि.शिक्षा शोधपरक होनी चाहिए। उन्होंने कहा था कि शिक्षा व्यवस्था का स्वरूप ऐसा हो जो व्यक्तिए परिवारए समाज और राष्ट्र को एक सूत्र में बांध सके। हम उस समाज की कल्पना नहीं कर सकते हैं कि एक सर्कल यानि व्यक्तिए दूसरा सर्कल यानि परिवारए तीसरा सर्कल यानि समाजए चौथा सर्कल यानि राज्यए पांचवा सर्कल यानि देशण्ण् यह कल्पना हम नहीं कर सकते। हम तो व्यक्ति से चलते.चलते परिवारए परिवार से चलते.चलते एक ही धारा में एक ही सूत्र में विस्तार होता चलेए यह कल्पना लेकर चलने वाले लोग हैंए हम ऐसे सर्कल की कल्पना नहीं कर सकते कि एक सर्कल दूसरे से जुड़ा हुआ नहीं है। दोनों सर्कल अलग हैं तो समाज का वैचारिक विकासए विस्तार और संस्कार की प्रवृत्ति असंभव होगी। देश के इन तीन महान चिंतकों के विचारों से भी स्पष्ट है कि शिक्षा का अगर कोई लक्ष्य न हो तो वह खूंटी पर टंगे हुए सर्टिफिकेट से ज्यादा और कुछ नहीं होता है।

हमारे प्राचीन तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों में ज्ञान के साथ नवोन्मेष पर भी जोर दिया जाता था। तभी तो ऐसे विद्या के मंदिरों से आचार्य चाणक्य, आर्य भट्ट, पाणिनी, धनवंतरि, चरक, सुश्रुत जैसे अनगिनत विद्वान निकले थे। अगर इन्होंने सिर्फ किताबी ज्ञान को पर्याप्त मान लिया होता तो क्या दुनिया को राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, खगोल विज्ञान, शल्य चिकित्सा, गणित और व्याकरण के नियम मिल पाते? वो शायद नहीं मिलते।

हमें एक और वास्तविकता को स्वीकार करना होगा कि आज दुनिया में कोई भी देश समाज या व्यक्ति एकांकी हो करके नहीं रह सकता। हमें वैश्विक नागरिक और वैश्विक गांव के दर्शन पर सोचना ही होगा। और यह दर्शन तो हमारे संस्कारों में प्राचीनकाल से मौजूद है। जब हम वसुधैव कुटुम्बकम् और सर्वे भवन्तु सुखिनरू की बात करते हैं तो हमारे दर्शन का हिस्सा इसी विश्व परिवार ;वैश्विक गांवद्ध का होता है। इसी विजन पर चलते हुए आज सरकार शिक्षा को लक्ष्य देनेए उसे समाज से जोड़ने और शिक्षा की समस्याओं का हल ढूंढ़ने की दिशा में लगातार प्रयास कर रही हैएनवोन्मेष भी कर रही है।
आज हमारे देश में करीब.करीब 900 विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षण संस्थानए साथ ही लगभग 40 हजार कॉलेज हैं। आप सोच सकते हैं कि कितनी बड़ी शक्ति हमारे जिम्मे है। यदि हम अपने गांवों और शहरों की समस्याओं से चुनौतियों से निपटने में इन शिक्षा संस्थानों का ज्यादा से ज्यादा सहयोग लेंए तो स्थितियां कितनी भिन्न हो जाएंगी। मेरे कहने का मतलब है कि हम इन संस्थाओं को नवोन्मेष के दर्शन से जोड़ें। एक एसी अंतर.संबंध जो समाज और संस्थान को जोड़े और संस्थानों को भी आपस में जोड़े और सब मिला करके राष्ट्र के सपनों के साथ जुड़े। कल्पना कीजिए कि 20.22 वर्ष का छात्र अपनी डिग्री के लिए पढ़ाई करते समय जब समाज की जरूरत को ध्यान में रखते हुए अपनी चिंतन प्रक्रिया का विकास करेगा तो कितना फर्क पड़ सकता है। जो वो अपने प्रोजेक्टों पर काम करते हुए सोच भी रखेगा कि इसका इस्तेमाल समाज के काम आएगाए तो परिणाम निश्चित ही बहुत ही सकारात्मक होंगे।

उच्च शिक्षा में हमें उच्च विचारए उच्च आचारए उच्च संस्कार और उच्च व्यवहार के साथ ही समाज की समस्याओं का उच्च समाधान भी उपलब्ध कराना है। मेरा आग्रह है कि विद्यार्थी कालेज और विश्वविद्यालय की कक्षाओं में तो ध्यान दें हीए उन्हें देश की आशाओं.आकांक्षाओं के साथ भी जोड़ना होगा। इसी मार्ग पर चलते हुए केंद्र सरकार की भी यही कोशिश है कि हम हर स्तर पर देश की आवश्यकताओं में शिक्षण संस्थानों को भागीदार बनाएं। इसी विजन के साथ हमनेए जैसा अभी जावड़ेकर जी ;मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडे“करद्ध ने उल्लेख कियाए अटल टिंकरिंग लैब की शुरूआत की है। इसमें स्कूली बच्चों में नवोन्मेष की प्रवृत्ति बढ़ाने पर फोकस किया जा रहा है। अब तक देश के 2000 से ज्यादा स्कूलों में ऐसी अटल टिंकरिंग लैब की शुरुआत हो चुकी है और अगले कुछ महीनों में हम इसकी संख्या को बढ़ाकर 5000 तक करने जा रहे हैं। मैंने बीच में एक बार टेक्नोलॉजी के माध्यम से अटल टिंकरिंग लैब के माध्यम से देशभर के अलग.अलग कोने म अटल टिंकरिंग लैब में काम करने वाले बच्चों के साथ बात की थी। 8वींए 9वींए 10वीं कक्षा के बच्चे थे। मेरा उस कार्यक्रम को छोड़ने का मन नहीं करता था। वो एक.एक प्रयोग दिखाते थे कि हमने लैब में ऐसा किया, हमने लैब में वैसा किया, मैं चकित हो जा रहा था। हमारे बच्चों में कितना दम-खम (पोटेंसियल) है? उनको थोड़ा सा अवसर दिया जाए, उनकी भीतर की शक्तियों को उभरने दिया जाए, कल्पना से बाहर का परिणाम देते हैं। थोपा न जाए, समस्या वहीं पैदा होती है।

हमारी सरकार शिक्षा जगत में निवेश पर भी ध्यान दे रही है। जैसे शिक्षा का आधारभूत ढांचा बेहतर बनाने के लिए राइज यानी ‘रिविटलाइजिंग आॅफ इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड सिस्टम इन एजुकेशन’ कार्यक्रम को हमने व्यापक रूप से शुरू किया है। जब 2022 में भारत की आजादी के 75 साल होंगे। इसके जरिये 2022 तक एक लाख करोड़ रुपये खर्च करने का हमारा इरादा है। सरकार ने हेरा यानी हायर एजुकेशन फंडिंग एजेंसी की स्थापना भी की। जो उच्च शिक्षा संस्थान के गठन में आर्थिक सहायता मुहैया कराएगी। सरकार ने राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान का बजट भी तीन गुना बढ़ाने का निर्णय किया है। राज्यों में उच्च शिक्षा को मजबूत करने में प्रभावी कदम साबित होंगे।

पिछले चार सालों में देश में बहुत सारे नये आईआईटी, नये आईआईएम, नये आईआईएसईआर और नये आईआईआईटी, नये केंद्रीय विश्वविद्यालय स्वीकृत किए हैं। सरकार एक नीति भी लाई है, जिसके अंतर्गत देश में 20 इंस्टीट्यूट आॅफ इमिनेंस स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। इसमें 10 सार्वजनिक क्षेत्र और 10 निजी क्षेत्र में स्थापित होंगे। इस नीति का मकसद देश के शिक्षा संस्थानों को दुनिया के सिद्ध संस्थानों की सूची में शामिल करना है। आज हम विश्वस्तर की सर्वोच्च 500 में बहुत कम संख्या में नजर आते हैं। यह स्थिति हमें बदलनी है और इसके लिए सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के हर संस्थान पर लगभग एक हजार करोड़ रुपये अगले कुछ वर्षों में खर्च करेगी। आप इस बात से भी भलीभांति परिचित होंगे कि ग्लोबल इनीशियेटिव फार एकेडमिक नेटवर्क यानी ज्ञान योजना के तहत हम भारतीय संस्थाओं में पढ़ाने के लिए दुनियाभर के सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों को आमंत्रित कर रहे हैं।

हमारी सरकार शिक्षण संस्थानों में विचारों के खुले प्रवाह की पक्षधर है। हमने आईआईएम जैसे संस्थानों को स्वायत्तता देकर इसकी शुरुआत कर दी है। मैं हैरान हूं देश में इस बात की चर्चा नहीं हो रही है। विद्वानजन भी पता नहीं चुप बैठे हैं? आईआईएम में जो सुधार किए गए, शायद हिन्दुस्तान में जो सुधार की बड़ी-बड़ी वकालत करने वाले लोग थे, जो पिछले 20-25 साल से लिखते रहे होंगे, शायद उन्होंने भी सोचा नहीं होगा। लेकिन हो जाने के बाद कहीं अच्छा कहेंगे तो मोदी के खाते में चला जाएगा तो मुसीबत होगी, लिखना बंद कर देंगे। इसकी वजह से बड़ा बदलाव आया है। आईआईएम को अपना कोर्स, अपना पाठ्यक्रम, अध्यापकों की नियुक्ति, यहां तक कि बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति और विस्तार के बारें खुद ही निर्णय लेना है। आप कर लीजिए, मैंने यही कहा है, मुझे करके दिखाइये, सरकार कहीं नहीं आएगी। कोई ‘बाबू’ आ करके नहीं बैठेगा। अब यह उनका जिम्मा है वो करके दिखाएं।

भारत में उच्च शिक्षा से जुड़ा यह एक बड़ा कदम उठाया गया है। मैं समझता हूं कि यह अभूतपूर्व प्रयोग है। हाल ही में यूजीसी ने ग्रेडेड इकोनामी रेगुलेशन भी जारी की है जिससे विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को स्वायत्तता दी गई। इसका उद्देश्य शिक्षा के स्तर को सुधारना तो है ही, इससे उन्हें सर्वश्रेष्ठ बनाने में भी मदद मिलेगी। इस रेगुलेशन की वजह से देश में उच्च शिक्षा संस्थानों और विश्वविद्यालयों को ग्रेड तय करने में स्वायत्तता मिल चुकी है। इसमें से कई राज्यों के विश्वविद्यालय भी इसका हिस्सा हंै। सरकार की तरफ से किये जा रहे इन प्रयासों के बीच आप सभी का भी यह दायित्व बनता है कि सकारात्मक माहौल का जितना ज्यादा लाभ उठा सकते हैं, उठाएं और उसमें जो अच्छाइयां हैं, जो हमारे उत्तम-उत्तम सपने थे उन सपनों से मेल बिठा करके इस समय को हम न गवाएं जाने न दें, इसको खोने न दें। आप में से ज्यादा लोगों का कार्यकाल चार-पांच साल का होता है। इन वर्षों के दौरान कार्य करते हुए आपको भी अपने लिए कुछ लक्ष्य निर्धारित करने चाहिए। आपको पहले दिन से यह सोचना होगा कि जब आपका कार्यकाल समाप्त होगा, तब आप क्या लिगेसी छोड़कर के जाएंगे। अनेक ऐसे विषय हैं जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है, जो उच्च शिक्षा के स्तर में नवोन्मेष के लिए बहुत आवश्यक है। जैसे कि आप शिक्षण की नई पद्धत्तियों को विकसित करने में सहयोग दे सकते हैं। आज हर दिन एक नई टेक्नोलॉजी आती है।

हम समय के साथ रहते हुए नई टेक्नोलॉजी का प्रयोग करके शिक्षण की व्यवस्था को और मजबूत कैसे कर सकते हैं? टीचर की ट्रेनिंग जो हमेशा से एक उपेक्षित क्षेत्र रहा है, उसे कैसे सुधार सकते हैं? हम इस बात से सहमत होंगे कि कोई गरीब से गरीब भी हो या अमीर से अमीर भी हो अगर उसको जीवन की एक इच्छा पूछोगे, गरीब से गरीब से पूछोगे, ड्राइवर होगा, चपरासी होगा, सामान्य जिंदगी गुजारा करने वाला मजदूर होगा या अमीर से अमीर होगा, अगर उससे पूछोगे, तो एक सपना सर्वथा समान (कामन) होता है और वो होता है खुद के बच्चों की अच्छी शिक्षा। अमीर से अमीर व्यक्ति भी चाहता है कि भई, मेरे बच्चों को संभालने वाला कोई अच्छा अध्यापक मिल जाए, कोई अच्छा स्कूल मिल जाए, गरीब से गरीब भी चाहता है कि मेरे बच्चे के लिए अच्छी शिक्षा की व्यवस्था हो जाए। अब यह बिना अध्यापक संभव नहीं है, हर कोई अच्छा अध्यापक ढूंढता है और इसलिए हमारा फोकस इस बात पर भी होना चाहिए कि समाज को उत्तम शिक्षक कैसे मिलें? और मिशनरी जीन वाले अध्यापक चाहिए। हमारे संस्थान बहुत बढि़या-बढि़या सीईओ को पैदा करते हैं, दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों के सीईओ बन जाते हैं, हम बड़ा गर्व करते हैं कि मेरे देश की फलानी संस्था से निकला हुआ व्यक्ति उस देश के बड़े उद्योग या व्यापार जगत का सीईओ बन गया है, मुझे तो खुशी तब होगी, जब हम कहेंगे कि मेरे यहां से निकले हुए अध्यापक ने देश को 50 वैज्ञानिक दिए हैं, 50 डॉक्टर दिए हैं। मैं यह मानता हूं कि यह आज की बड़ी आवश्यकता है। अगर आप किसी अच्छे साहित्यकार से मिलेंगे, कवि को सुनेगे, देखेंगे, तो पाएंगे कि उनके भीतर से जो चीजें निकली हंै चिंतन स्वयं का हो, कलम खुद की हो, शब्द स्वयं के होंगे, मां सरस्वती का आशीर्वाद होगा, लेकिन एक बात समान (कामन) होगी, वो यह होगी जो कुछ भी निकला होगा, वो जीवन के अनुभव से निकला होगा, समाज के प्रति संवेदना से निकला होगा, कुछ सपनों के कारण निकला होगा। यह सिर्फ शब्दों का जोड़ नहीं होता, पूरा भाव-विश्व होता है जो इन शब्दों को गर्भाधान करवाता है और उस गर्भाधान में से कोई कविता बनकर, कोई साहित्यिक रचना बन करके निकलती है। कोई रचनात्मक चीज बन करके निकलती होगी। शायद कलम से निकले, कम्प्यूटर से निकले लेकिन उसके मूल में समाज के प्रति वो संवेदना होती है। जिंदगी के अनुभव का एक निचोड़ होता है, तब जा करके निकलता है। इसलिए समाज के सुख-दुख को समझना, उसे जमीन पर रह करके महसूस करना यह हमारी शिक्षा व्यवस्था का अंग कैसे बने? यह समय की मांग है। यह तब होता है जब शिक्षा का विस्तार कक्षा की चौखट से बाहर भी हो। अब जैसे पुराने समय में गुरुकुल में विद्यार्थियों को लकड़ी काटने के लिए भेजा गया। राजा महाराजाओं के बेटे गुरुकुल में पढ़ते थे। अब उस संस्था के लिए लकड़ी मंगवाना कोई मुश्किल काम नहीं था, लेकिन संस्कार के लिए, जीवन का अनुभव करने के लिए राजा का बेटा भी अगर गुरुकुल में पढ़ता है तो उसको लकड़ी काटने के लिए जाना पड़ता था। इसलिए उसके पीछे मकसद यह होता था कि छात्र बाहर जाएं, समाज, उसकी चुनौतियों को देखें, समझें। इसी तरह विद्यार्थियों को दी जाने वाली शिक्षा का विस्तार कक्षा के दायरे से बाहर होना बहुत अनिवार्य है। वो आसपास के किसी मोहल्ले में जाए, अपने आसपास देखे कि कैसे झुग्गी-झोपडि़यों में कुपोषण की समस्या है। कुछ बच्चों को पर्याप्त टीके नहीं लगे हैं। नशाखोरी धीरे-धीरे गरीब परिवार में भी घुसती चली जा रही है। क्या कारण है बच्चे स्कूल छोड़ करके ऐसे ही भटक रहे हैं। समाज की इस तस्वीर से उनका परिचय भी बहुत आवश्यक है।

आप सोचिए, अगर कॉलेज में पढ़ने वाले युवा अपने आसपास के इलाके में जा करके सिर्फ एक बात का प्रचार करें, एक बात के प्रति जागरूकता फैलाएं, सब बच्चों को कहें कि झुग्गी झोपड़ी में, गरीबों में अरे भई, देखो बच्चे हाथ धोए बिना खाना नहीं खाना है। बार-बार कहें, आप कल्पना कर सकते हैं कि इतना बड़ा बदलाव आएगा। मैं वो बातें नहीं कर रहा हूं कि बजट लगाओ, बिटिंग करो, सुधार करो, फार्म भरो, वो नहीं कह रहा हूं। मैं जुड़ने की बात कर रहा हूं। जुटने की बात कर रहा हूं। जागरूकता के तरीके नवोन्मेष से हो सकते हैं। रचनात्मक हो सकते हैं। ऐसे अभियान न सिर्फ विद्यार्थियों का खुद का जीवन सुदृढ़ बनाएंगे बल्कि अनेक गरीब बच्चों के जीवन की रक्षा भी करेंगे।

हमें वैश्विक नागरिक और वैश्विक गांव के दर्शन पर सोचना ही होगा। यह दर्शन तो हमारे संस्कारों में प्राचीनकाल से मौजूद है। जब हम वसुधैव कुटुम्बकम् और सर्वे भवन्तु सुखिन: की बात करते हैं तो हमारे दर्शन का हिस्सा इसी विश्व परिवार (वैश्विक गांव) का होता है। इसी विजन पर चलते हुए आज सरकार शिक्षा को लक्ष्य देने, उसे समाज से जोड़ने और शिक्षा की समस्याओं का हल ढूंढने की दिशा में लगातार प्रयास कर रही है,नवोन्मेष भी कर रही है।

मैं अभी कुछ दिन पहले बनारस गया था, मेरा लोकसभा क्षेत्र है। और मेरी वहां मुलाकात काशी विश्वविद्यालय के कुछ नौजवानों के साथ हुई। मैं नहीं जानता हूं उनके कुलपति उनको कभी मिले हैं कि नहीं मिले हैं, लेकिन मुझे मिलने का मौका मिला। इन युवाओं ने चार-पांच साल पहले एक संस्था शुरू की ट्राई टु फाइट के नाम से। शुरू में ये तीन-चार लड़के थे और अब तो ये बहुत बड़ा समूह बन गया है, लड़के-लड़कियां सब इकट्ठे आए हैं। इन युवाओं ने जो कचरा बीनने वाले बच्चे होते हैं, उन पर उनका ध्यान गया और उनका मन कर गया कि इन बच्चों की शिक्षा होनी चाहिए। उन्होंने अपनी शिक्षा के समय में से समय निकाल करके इन कचरा बीनने वाले बच्चों को स्कूल ले जाने की दिशा में मेहनत की, कुछ पढ़ाना शुरू किया, कुछ समय देने लगे, मतलब मेहनत करने लगे। आज बनारस में ये संस्था 1000 से ज्यादा गरीब बच्चों को शिक्षा देने का काम कर रही है।

मैं उन बच्चों से भी मिला, उन नौजवानों से भी मिला और परिवार में ऐसे ही बच्चे पैदा हुए, मां अपने काम में है, बाप अपने काम में है। बच्चों की दुनिया अलग है। गलत आदतों में फंसे हुए थे, उन सबको बाहर निकाल करके आए। एक बच्ची की पेंटिंग मैंने देखी, इतना बढि़या पेंटिंग थी, उसकी ताकत थी, भगवान ने उसको गिμट दी थी। उन्होंने जब मुझे उसको गिμट किया, उस बच्ची ने, मैं हैरान था। फिर मैंने उससे पूछा, बेटा तुम्हारे परिवार में किसी ने… नहीं-नहीं। बोली, मैं ऐसे ही करती थी और ये जब साहब लोग आए, तो उन्होंने फिर मेरे लिए कागज लाए, कलम लाए, अब मैं उसी पर कर रही हूं।

देखिए, उस कॉलेज के छात्र, वे हुड़दंग में भी जा सकते थे, यूनियनबाजी में जा सकते थे, आंदोलन में जा सकते थे, उन्होंने रास्ता ये चुना और 1000 बच्चों की जिंदगी को बदल दिया और मैं मानता हूं सिर्फ उन हजार लड़कों की जिंदगी नहीं बदली, उन युवाओं की जिंदगी ज्यादा बदली है, जिन्होंने संवेदना को समझा है।

समाज के हित में काम करने वाली ऐसी संस्थाओं ने जितने ज्यादा युवा जुड़ेंगे, इस तरह के अभिनव प्रयोग करेंगे, उतना ही गरीब-वंचित बच्चों को लाभ मिलेगा। इन सब कार्यों में बहुत बजट या आर्थिक सहायता की आवश्यकता नहीं होती है लेकिन ऐसे कार्य कॉलेज में पढ़ने वाले विद्यार्थियों और किसी झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले छोटे बच्चों, दोनों को ही प्रेरणा देने का काम करेंगे। उनमें आपस में भी एक अतरसंबंध (कनेक्ट) साबित होगा, लेकिन हमारे देश का एक दुर्भाग्य भी है। क्षमा करना, कोई बुरा मत मानना। हम लोग स्कूल में पढ़ते थे, तब स्कूल में अध्यापक कहते थे कि आज कोई सेवा कार्य किया हो तो नोट लिख करके आना। शायद आप लोगों को भी होगा ऐसा, आज कौन सा सेवा कार्य किया, ऐसा लिख करके और 100 में से 90 बच्चे लिखते थे कि आज रास्ते में एक अंधजन मिला, उसको मैंने रास्ता पार करवाया। आप देख लीजिए, 90 बच्चे यही लिखते थे। यानी एक तो वो झूठ लिखने की आदत डालते थे, झूठा करने की आदत डालते थे और हम उसको टोकते भी नहीं थे कि ये छोटा सा गांव है यहां रास्ता पार करने की नौबत कहां से आई यार, बस चलती है गाड़ी। पहले से चली आ रही है, हमारी भी चलती है, आज भी चलता होगा शायद। मेरा कहने का तात्पर्य है ये सारा नवोन्मेष न होने का परिणाम है। ये शुरू इसलिए हुआ होगा कि बच्चों में समाज सेवा के संस्कार हों, लेकिन बाद में वो एक रस्म बन गया, प्राणहीन हो गया क्योंकि लिखना है, तुम लिख करके लाए हो, पेज भर गया है, अध्यापक को समय नहीं है, पढ़ने के लिए। पूरा पेज लिखा है फिर अंदर कुछ भी लिखा हो, लिखा तो है।

मैं समझता हूं, इसमें बदलाव जरूरी है। और मैं मानता हूं आप में से बहुत से लोग इन बातों से परिचित होंगे कि इस सरकार में आने के बाद मैंने एक और प्रयास शुरू किया है। मेरी कोशिश रहती है कि जहां कहीं भी विश्वविद्याल के दीेक्षांत में जाता हूं, यहां शायद कुछ बैठे होंगे जिनकी विश्वविद्यालय में जाने का मौका मिला, तो मैंने एक नियम बनाया है। मेरे आॅफिस से चिट्ठी जाती है कि मैं दीक्षांत में आऊंगा लेकिन वहां मेरे विशेष मेहमान होंगे पचास। उनके लिए बैठने की आगे की पंक्ति में विशेष व्यवस्था होनी चाहिए। ये मेरा आग्रह रहता है और वो 50 कौन होते हैं- उस इलाके के सरकारी स्कूल के झुग्गी-झोपड़ी वाले बच्चे जो पढ़ते हैं, वो सांतवीं, आठवीं, नौंवी, दसवीं के बच्चे मेरे मुख्य अतिथि होते हैं। उनका मैं परिचय करवाता हूं उस दीक्षांत में आये दर्शकों में। क्यों, मैं उन बच्चों को संस्कारित करना चाहता हूं। वो जब बैठता है बच्चा, उस बेचारे ने तो अपना झुग्गी-झोंपड़ी देखी हैं, स्कूल के वो जो वातावरण देखा है, इतनी बड़े विश्वविद्यालय के परिसर में आता है। बैठा है, सब अलग-अलग, बराबर और वो टोपी पहन करके बच्चे आते हैं और जब सर्टिफिकेट लेते हैं, उसके अंदर भी एक बीज अंकुरित होने लगता है कि कभी मैं भी…। मैं भी कभी इस मंच पर जाऊंगा और मुझे भी कोई इस प्रकार से देगा, ये सपने बोने का काम होता है।
चीज छोटी होती है, बदलाव बजट से आते हैं ऐसा नहीं हंै। बदलने के इरादे से आते हैं, जुड़ने के साथ शुरू होते हैं और जूझने से सफलता भी मिलती है, ये संकल्प ले करके चलना है। इसलिए जब भी मैं शिक्षा जगत के विद्वानों के बीच जाता हूं तो एक बात पर जरूर मैं बल देता हूं। वह है विषय शहर आधारित उत्कृष्ट केंद्रों (सिटी बेस्ड इक्सेलेंट सेंटर्स)। हर संस्थान को ये जिम्मेदारी लेनी होगी कि वह अपने आस-पास की शिक्षा और समस्या समाधान का सिस्टम (प्लाब्लम सोलुशन इको सिस्टम) सही रूप में बनाये। इसके लिए मैं आपको कुछ उदाहरण देना चाहता हूं।
हमारे विद्यार्थियों को जिम्मेदारी दी जा सकती है कि वह अपने आसपास के लोगों को डिजिटल साक्षरता का काम करें। वे अपने आसपास के लोगों को आयुष्मान भारत, उजाला, स्वच्छ भारत मिशन जैसी योजनाओं से परिचित कराएं। वो उनके जीवन को आसान बना सकते हैं। विद्यार्थी अपनी बस्ती में जल संरक्षण, पर्यावरण और बिजली बचाने की सीख दें। ऐसे अनेक कार्यों की सूची बनाकर शिक्षा संस्थान एक-दूसरे से साझा भी कर सकते हैं। मैं तो ये भी कहता हूं कि इस काम में सिर्फ शिक्षक और छात्र ही नहीं, अभिभावक और अलुमिनी को भी जोड़ना चाहिए। जब शिक्षा से इस कार्य हर स्तर पर समाज का जुड़ाव होगा तो हमारे युवाओं का सामर्थ्य और उनकी समझ में कितनी बढ़ोत्तरी होगी, इसका आप अंदाज लगा सकते हैं।
देश के युवाओं ने अपनी क्षमता से ब्रांड इंडिया को वैश्विक पहचान दिलवाई है। देश के तमाम विश्वविद्यालयों, अलग-अलग संस्थानों से जैसे आईआईएम, आईआईटी, मेडिकल कॉलेज में पढ़े छात्रों ने विदेश में जाकर भारत का नाम रोशन किया है। कई तो दुनिया की बड़ी कम्पनियां चला रहे हैं। हम सब इस बात से भी भलीभांति परिचित हैं कि देश के युवाओं के पास विचारों की कमी नहीं है। अगर हमारे पास लाखों लाख समस्याएं हैं तो करोड़ों करोड़ समाधान भी हैं, ये विश्वास है।
यह भी सच है कि आज की दुनिया की सबसे बड़ी
कंपनियां कभी न कभी स्टार्टअप ही होती थीं। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया, स्किल इंडिया जैसी योजनाएं चलायी जा रही हैं। आने वाले दिनों में हमारे युवा विश्व का नेतृत्व कर सकते हैं। हम सब जानते हैं कि हमारा देश तकनीकी मानव संसाधन के मामले में दुनिया का बहुत बड़ा पूल है। स्टार्ट अप के मामले में हम आगे हैं। नवोन्मेश मामले में लगातार प्रगति कर रहे हैं। ये सारी
स्ेिथतियां हमारे देश के नौजवानों और शिक्षा संस्थाओं दोनों के अनुकूल है। पुनरुत्थान तभी संभव है जब हम सब एक कदम आगे बढ़ें। █
(विज्ञान भवन में ‘कॉन्फ्रेंस आॅफ अकेडमिक लीडरशीप आॅन एजुकेशन फॉर रिसर्जेंस’ सम्मेलन में 29 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का उद्घाटन भाषण।)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here