दर्शन, पश्चिमी विज्ञान और अंधविश्वास

0
31

पश्चिमी विज्ञान का इतिहास लोभ, छल-कपट और अन्य सब लोगों तथा जीवों पर अपनी प्रभुता स्थापित करने की कामना से भरा हुआ है। यह कामना आसुरी कामना है। उसका सत्यान्वेषण से कोई लेना-देना नहीं है। पश्चिमी विज्ञान ने अमेरिका को न केवल अजेय बना दिया है बल्कि उसे और उसके अनुकरण पर चल रहे रूस तथा चीन आदि को ऐसे हथियार उपलब्ध करा दिए हैं, जो समूची पृथ्वी पर विनाशलीला रच सकते हैं। उस विज्ञान का गौरवगान करते हुए प्राचीन भारत की खिल्ली उड़ाना हमारी आत्महीनता दर्शाता है।

ह सब दावे विवादास्पद हो सकते हैं और जिस तरह वे किए गए, उससे वे कुछ हास्यास्पद लगते हैं। उनके आलोचकों का यह तर्क सही है कि आज जैसे प्रक्षेपास्त्र बनाने के लिए जिस तरह के औद्योगिक तंत्र के विकास की आवश्यकता होती है, वह अतीत में संभव नहीं था। लेकिन प्राचीन भारत को यह श्रेय देना होगा कि उन्होंने ऐसे प्रक्षेपास्त्रों की कल्पना कर ली थी। कौरवों के संदर्भ में टेस्ट ट्यूब बेबी की कल्पना करना हास्यास्पद भी है और वह काफी बेहूदा लगती है। यह बात भी व्यथित कर सकती है कि ये सब बातें किसी और ने नहीं, एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के उपकुलपति ने कही। वे अपने विश्वविद्यालय की शैक्षिक उन्नति में किस तरह का योगदान कर रहे होंगे, इसकी कल्पना की जा सकती है। लेकिन एक बड़ी कांफ्रेंस में इक्का-दुक्का लोगों की टिप्पणियों का सीमित महत्व ही होना चाहिए। अगर यह विवाद कांग्रेस के अधिवेशन में उठकर वहीं निपटा लिया गया होता तो ठीक था। लेकिन उसे एक राष्ट्रीय विवाद बनाने की कोशिश की गई कि आज के पश्चिमी विज्ञान के सामने प्राचीन भारत की खिल्ली उड़ाई जा सके। आंध्र विश्वविद्यालय के उपकुलपति की टिप्पणियों पर विवाद ने इसलिए तूल पकड़ा कि वे टिप्पणियां प्राचीन भारत के बारे में थी। अगर किसी ने प्राचीन यूरोप या मध्यकालीन यूरोप की वैज्ञानिक गतिविधियों पर टिप्पणी की होती तो चाहे वे कितनी बेतुकी दिखाई देतीं, उन पर हो-हल्ला नहीं हुआ होता।
अठाहरवीं शताब्दी तक यूरोप के नामचीन वैज्ञानिक दो तरह के प्रयोगों में लगे हुए थे। एक तरफ वे ऐसा कोई रसायन विकसित करने की कोशिश कर रहे थे, जो आदमी को अमर कर दे। दूसरी तरफ वे धातुओं के मिश्रण से सोना बनाने की विधि विकसित करने में लगे हुए थे। यह हाल का फैलाया हुआ अंधविश्वास है कि यूरोपीय वैज्ञानिक सत्य के अन्वेषी थे और वे प्रकृति की प्रक्रियाओं को समझने में लगे हुए थे। उनका मुख्य उद्देश्य सृष्टि से स्वरूप, उसकी गति-नियति और जीवन की दशा-दिशा को समझना नहीं था। वे दरअसल सत्य के नहीं, शक्ति के अनुसंधान में लगे थे। इसलिए पश्चिमी विज्ञान एक विनाशकारी तंत्र खड़ा करने में लगा, जो आज पृथ्वी पर जीवन को ही नष्ट कर देने की दिशा में बढ़ता जा रहा है। पश्चिमी विज्ञान का इतिहास लोभ, छल-कपट तथा अन्य सब लोगों और जीवों पर अपनी प्रभुता स्थापित करने की कामना से भरा हुआ है। यह कामना आसुरी कामना है। उसका सत्यान्वेषण से कोई लेना-देना नहीं है। पश्चिमी विज्ञान ने अमेरिका को न केवल अजेय बना दिया है बल्कि उसे और उसके अनुकरण पर चल रहे रूस तथा चीन आदि को ऐसे हथियार उपलब्ध कर दिए हैं, जो समूची पृथ्वी पर विनाशलीला रच सकते हैं। उस विज्ञान का गौरवगान करते हुए प्राचीन भारत की खिल्ली उड़ाना हमारी आत्महीनता दर्शाता है। हम दरअसल न प्राचीन भारत की ज्ञानात्मक उपलब्धियों को समझते हैं, न आज के पश्चिमी विज्ञान की विनाशक दिशा को।
भारतीय विज्ञान कांग्रेस की स्थापना 1914 में हुई थी। तब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। उस समय ईसाई मिशनरियों से लगाकर विज्ञान के प्रोफेसरों तक यह धारणा बनी हुई थी कि अंधेरे में पड़े भारत को यूरोप के ज्ञान-विज्ञान और ईसाई मान्यताओं में दीक्षित करना है। यह एक तरह से भारत को पश्चिमी सभ्यता में अनुगत करने का अभियान था। ईसाई मिशनरी क्या करते थे, यह महात्मा गांधी ने अपनी जीवनी में लिखा है। वे चौराहों पर खड़े होकर हिन्दू देवी-देवताओं की निंदा करते हुए अनर्गल प्रलाप करते रहते थे। अपनी बाल्यावस्था में गांधी उनकी सब बातें सुनकर जुगुप्सा से भर उठे थे। पश्चिमी विज्ञान के पुरोधाओं की स्थिति उससे कोई अधिक भिन्न नहीं थी। वे भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों को तो तिरस्कार की दृष्टि से देखते ही थे। इसी सब माहौल में विज्ञान के दो प्रोफेसरों को भारतीय विज्ञान कांग्रेस गठित करने की बात सूझी। उसमें ब्रिटिश शासन का कितना हाथ था, हम नहीं जानते। किसी को भारतीय विज्ञान कांग्रेस के आरंभिक इतिहास की गवेषणा करनी चाहिए। भारतीय विज्ञान कांग्रेस का आरंभ कलकत्ता में हुआ था और उसकी पहल जे. एल. साइमनसन और पी. एस. मैकमहोन नाम के पश्चिमी विज्ञान के दो प्रोफेसरों ने की थी। 1947 तक उसके अधिवेशन कलकत्ता, चेन्नई, लाहौर, लखनऊ, इलाहाबाद आदि शहरों में होते रहे। 1947 के बाद इसे अधिक स्थानों पर आयोजित करने की कोशिश हुई। इस बार का सम्मेलन फगवाड़ा के एक विश्वविद्यालय में संपन्न हुआ है, जिसका नाम है लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी। अब अधिवेशन के स्थान का चुनाव आधुनिक सुविधाओं की उपलब्धता को ध्यान में रखकर किया जाता है। पंजाब का फगवाड़ा शहर भारतीय विज्ञान कांग्रेस के 106वें अधिवेशन का इसी आधार पर मेजबान हुआ है।
आरंभ से ही भारतीय विज्ञान कांग्रेस का उद्देश्य यूरोपीय विज्ञान में भारत को दीक्षित करना था। 19वीं सदी तक यूरोप में अन्य सभ्यताओं की ज्ञान संबंधी उपलब्धियों को जानने की जो जिज्ञासा थी, वह बीसवीं सदी में उनके औपनिवेशिक साम्राज्य के शिखर छू लेने तक समाप्त हो गई थी। बीसवीं सदी के आरंभिक काल में यूरोप के वैज्ञानिकों को केवल अपनी उपलब्धियां आधुनिक लगती थीं और अन्य सभ्यताओं की उपलब्ध्यिां पिछड़ी व निरर्थक। इसलिए उनका एकमात्र उद्देश्य पश्चिमी विज्ञान का उसी तरह प्रचार-प्रसार था जिस तरह से चर्च का उद्देश्य ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार का था। न चर्च को अन्य सभ्यताओं की धर्म संबंधी अवधारणाओं को समझने की आवश्यकता अनुभव हुई, न यूरोपीय वैज्ञानिकों को अन्य सभ्यताओं की वैज्ञानिक उपलब्धियों को समझने की। भारत को पश्चिमी विज्ञान में दीक्षित करने की इस धारा के समानांतर पश्चिमी विज्ञान को आत्मसात करके उसे भारतीय विचारों और मान्यताओं की ओर मोड़ने की इच्छा लेकर पैदा हुई एक धारा भी थी। उसमें ही बीसवीं सदी के तीन महान भारतीय वैज्ञानिकों की गणना कर सकते हैं। जगदीश चंद्र बसु ने अपने प्रयोगों से यह सिद्ध करने की कोशिश की कि सभी पदार्थ जीव है और दु:ख-सुख की प्रतीति होती है। यह याद रखने की आवश्यकता थी कि भारतीय दर्शन में सृष्टि को जीवन सृष्टि के रूप में देखा गया है, जड़ सृष्टि के रूप में नहीं। इसी तरह रामानुज ने यह सिद्ध किया कि गणित के बहुत से रहस्यों को पश्चिमी विज्ञान से इतर पद्धतियों से उजागर किया जा सकता है। सी. वी. रमन ने अपने काम के आधार पर 1930 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार अर्जित किया था। स्वतंत्रता पूर्व के मुकाबले स्वतंत्रता पश्चात की हमारी वैज्ञानिक उपलब्धियां नगण्य ही हंै।
भारत संसार के तीसरे सबसे बड़े वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीय तंत्र का दावा करता है। लेकिन हमारे इस विस्तृत वैज्ञानिक प्रतिष्ठान की उपलब्धियां कुछ नहीं हैं। अक्सर यह शिकायत की जाती है कि देश में न वैज्ञानिक अनुसंधान का माहौल है, न भारतीय लोगों के भौतिक जीवन की दशा में सुधारने में वैज्ञानिकों ने कोई योगदान किया है। यूरोप में विज्ञान की मुख्य दिशा सामरिक तंत्र का विकास रही है। बीसवीं सदी में जब भी प्रौद्योगिकीय विकास हुआ है वह सामरिक प्रयोगशालाओं की ही देन है। दूसरे महायुद्ध की समाप्ति के बाद उसका उपयोग यूरोपीय लोगों के भौतिक जीवन को सुधारने में भी हुआ। पर इसका कारण शांतिकाल में सामरिक उद्देश्य से विकसित किए गए औद्योगिक तंत्र और वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं को काम में लगाए रखना था। आज भी नई प्रौद्योगिकी का पहला लक्ष्य अमेरिका और यूरोप की शक्तियों को अजेय बनाए रखना ही है। पश्चिमी विज्ञान का आरंभिक विकास जर्मनी की प्रयोगशालाओं में हुआ था, जो विस्मार्क के काल से जर्मनी को यूरोप की ब्रिटेन और फ्रांस जैसी औपनिवेशिक शक्तियों के बराबर लाने के लिए निर्मित की गई थी। इन प्रयोगशालाओं में अधिक संख्या यहूदी वैज्ञानिकों की थी। हिटलर के यहूदी विरोधी नृशंस अभियान के बाद अधिकांश यहूदी वैज्ञानिक जर्मनी छोड़कर अमेरिका चले गए 1930 के बाद नई वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीय उपलब्धियों का केंद्र अमेरिका हो गया। उसकी सब उपलब्धियां भी पहले और दूसरे महायुद्ध के लिए यूरोपीय शक्तियों को युद्ध सामग्री बेचकर मालामाल होने की इच्छा से हासिल की गई थी।
दूसरे महायुद्ध में हुए व्यापक विनाश के बाद अमेरिकी कंपनियों को यूरोप के पुनर्निर्माण का काम भी मिल गया और युद्ध सामग्री से अर्जित मुनाफे आईएमएफ और विश्व बैंक के जरिये इस दिशा में मोड़ दिए गए। भारत के स्वतंत्र होने के बाद पश्चिमी विज्ञान के पूरे तंत्र को एक ही काम सौंपना चाहिए था कि वह भारत को सामरिक रूप से विश्व की प्रधान शक्तियों के समकक्ष ले आए। लेकिन हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पश्चिमी विज्ञान के अंधभक्त होने के बावजूद उसकी वास्तविक दिशा को नहीं समझ पाए। उन्होंने भारतीय सुरक्षा की चिंता नहीं की। हमारी सामरिक तैयारी उपेक्षित रही और हम 1962 में चीन से पिट गए। पर अपनी उस पराजय से भी हमने कोई सबक सीखा हो, ऐसा नहीं लगता। आज भी भारत हथियारों के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा खरीदार है। हम अपने लोगों के खून-पसीने की कमाई से अमेरिका, रूस और अन्य पश्चिमी देशों की हथियार बनाने वाली कंपनियों को मालामाल कर रहे हैं। उस सबके बाद भी हमारी सामरिक तैयारी इतनी नहीं हो पाती कि हम पाकिस्तान जैसे छोटे देश के मन में भी अपने प्रति भय पैदा कर सकें और उसे उत्पात करने से रोक सकें। हमारे इतने विस्तृत वैज्ञानिक और प्रोद्यौगिकीय प्रतिष्ठान की उपलब्धि इतनी भर है कि हमने अपने प्रशिक्षित इंजीनियरों द्वारा अमेरिका की सिलिकॉन वैली को प्रतिस्थापित कर दिया है। उससे अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का गौरव तो बढ़ा ही है, दुनिया में यह धारणा बनी है कि एक क्षेत्र में भारतीय भी बड़ी कुशलता रखते हैं। पर यह उपलब्धि भारत को कोई व्यावहारिक लाभ नहीं पहुंचा पाई। हमने नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद पूरा जोर लगा लिया कि हमारे यहां सामरिक उद्योग खड़ा हो  जाए। कम साधनों वाला रूस दूसरे महायुद्ध के बाद एक उन्नत सामरिक उद्योग खड़ा करके संसार की दूसरी बड़ी महाशक्ति बन गया तो हम क्यों नहीं बन सकते थे? यह हमारे राजनैतिक और वैज्ञानिक प्रतिष्ठान की असफलता है। उस पर देश के सबसे अधिक साधन खर्च हो रहे हैं, लेकिन उसकी उपलब्धियां नगण्य ही हैं।
पश्चिमी विज्ञान के भारतीय प्रतिष्ठान की उपलब्धियां भले कुछ न हों, उसका अहंकार बहुत बड़ा है। पश्चिमी विज्ञान में दीक्षित लोग केवल अपने को ज्ञान से प्रकाशित मानते हैं। अन्य सबको वे अंधेरे में पड़ा अज्ञानी समझते हैं। चिकित्सा पद्धति के रूप में आज भी आयुर्वेद संसार की सबसे उन्नत चिकित्सा प्रणाली है, जिसका निदान और उपचार ही नहीं दार्शनिक आधार भी बहुत ऊंचा है। लेकिन भारत में मेडिकल साइंस का तंत्र आयुर्वेद को विश्वसनीय चिकित्सा पद्धति तक मानने के लिए तैयार नहीं है। वह उसे झाड़-फूंक वाले ओझाओं की बराबरी में ही रखता है। भारतीय लोगों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में उसकी कम ही भूमिका है। लूट-खसोट और अप्राकृतिक जीवनशैली की ओर ले जाने में ही उसका अधिक योगदान दिखाई देता है। विज्ञान के प्रतिष्ठान ने हमारी खेती-बाड़ी को अधिक उत्पादन की क्षमता भले दी हो, हमारे भोजन की गुणवत्ता समाप्त कर दी है। आधुनिक कृषि जो पैदा करती है, वह पोषण कम देता है, हमारे शरीर में जहर अधिक पहुंचा रहा है। हमारा नया विकसित हो रहा ताना-बाना पारिवारिक और सामाजिक जीवन को अस्त-व्यस्त करने में लगा है। परिवहन की सुविधाओं ने समाज को समेटने की बजाय बिखेर दिया है। हमारा न परिवार का संबंध सुरक्षित बचा है, न कुटुंब का और न गांव-समाज का। सामाजिक जीवन को तहस-नहस करने को हम भौतिक उन्नति समझते हैं तो इस अंधविश्वास का कोई इलाज नहीं हो सकता। पुराने अंधविश्वास अतार्किक रहे हों, लेकिन जीवन को अधिक हानि नहीं पहुंचाते थे। आधुनिक जीवन के अंधविश्वास हमारे जीवन को ही नष्ट करने में लगे हैं और हमें अपने मकड़जाल से निकलने नहीं देते। पश्चिमी विज्ञान के इस तंत्र का सबसे बड़ा अपराध यह है कि उसने भारत की अपनी वैज्ञानिक परंपरा को सुखा डाला है।
पश्चिमी विज्ञान के उत्कर्ष से पहले संसार की सभी उन्नत सभ्यताओं में भारतीय दर्शन की मान्यताओं को ऊंची निगाह से देखा जाता था। चीन ने भारत से केवल बौद्ध धर्म ही नहीं सीखा, उसकी मध्यकालीन उपलब्धियों पर भारत के वैशेषिक दर्शन का महती प्रभाव था। अरब तो भारतीय सभ्यता से बहुत कुछ लेते ही रहे, यूरोप भी भारतीय उपलब्धियों से यथासंभव लाभान्वित हुआ। उसकी आज गवेषणा तो दूर, उसका उल्लेख करना भी हमारे आज के वैज्ञानिक प्रतिष्ठान को नागवार गुजरता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमने जीवन का अर्थ बदल दिया है। अब तक जीवन में सामाजिक संबंधों और प्रकृति की अनुकूलता का बहुत महत्व था। उसकी सब प्रेरणाएं हमें अपने दर्शन से मिली थीं। हमारे यहां हर क्षेत्र के लोग किसी न किसी दर्शन में सिद्ध होने की कोशिश करते थे। आज की सभ्यता केवल औद्योगिक वस्तुओं के अधिकाधिक उपभोग में अपना गौरव देखती है। उसके लिए जीवन की आवश्यकताएं अनावश्यक रूप से बढ़ाई जा रही है। सामाजिक संबंध छिन्न-भिन्न होते जा रहे हैं और प्रकृति की अनुकूलता अब हमारे लिए वरेण्य नहीं रही। वह पिछड़े जीवन का पर्याय बना दी गई है। पश्चिमी विज्ञान के ये घातक प्रभाव सबको दिखते हैं, उसका जादू एक नए अंधविश्वास का रूप ले चुका है और हम उसके मोहपाश में बंधे रहते हैं।
विज्ञान कांग्रेस की उपलब्धियां चाहे जितनी ही नगण्य हों, देश का प्रधानमंत्री कांग्रेस के हर अधिवेशन को संबोधित करने जाता है। हमारे राजनैतिक तंत्र को यह नहीं अखरता कि विज्ञान कांग्रेस का हर अधिवेशन भारत की परंपरागत उपलब्धियों की खिल्ली उड़ाने के ही काम आता है। यह देश का दुर्भाग्य है कि स्वतंत्रता के बाद हमारा अपने दर्शनों पर विश्वास घटा है और पश्चिमी विज्ञान पर अंधविश्वास बढ़ा है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here