ममता के राजदार

राजीव कुमार वही अधिकारी हैं जिसके लिए ममता बनर्जी धरने पर बैठ गईं थीं। वह इसलिए नहीं बैठी थीं कि राजीव कुमार को सीबीआई पकड़ लेती बल्कि वह इसलिए बैठी थीं क्योंकि राजीव कुमार उनके राजदार हैं। वह राज सीबीआई के सामने न खुले, ममता बनर्जी उसी का जतन कर रही हंै। चुनाव आयोग की बैठक में बतौर कोलकाता पुलिस आयुक्त, उनका गैर-मौजूद रहना उसी का नमूना है। वह आयोग की बैठक से गायब रहते थे। तो आयोग ने सवाल किया। जवाब देने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आईं। उन्होंने बताया कि राजीव कुमार छुट्टी पर हैं। अगले दिन खबर आती है कि नहीं, वे तो काम कर रहे हैं। जाहिर है वे राजीव कुमार को सीबीआई की नजरों से छुपा रही थी। यह सिलसिला नया नहीं है। जब राकेश अस्थाना विशेष निदेशक हुआ करते थे, तब से यह खेल चल रहा है। वे शारदा चिट फंड घोटाले की जांच कर रहे थे। उस सिलसिले में राजीव कुमार से पूछताछ करना चाहते थे। तीन बार समन भी भेज चुके थे। लेकिन राजीव कुमार पूछताछ में सहयोग करने के बजाय सीबीआई को ही धमकाने लगे। तब आलोक वर्मा सीबीआई के निदेशक हुआ करते थे। आरोपियों के साथ खड़े रहने का उनका अपना रिकार्ड है। उसी के तहत वे राजीव कुमार को बचाने लगे और ममता बनर्जी के सहयोगी बन गए। राकेश अस्थाना की जांच में रोड़ा अटकाने लगे। इस वजह से उनसे पूछताछ नहीं हो पाई। पर यह अड्डगे बाजी ज्यादा नहीं चली। सीबीआई दोबारा राजीव कुमार के पीछे पड़ गई। ममता बनर्जी इससे वाकिफ थीं। इसी वजह से वह राजीव कुमार को चुनाव आयोग की बैठक तक में नहीं जाने दिया। छुट्टी का बहाना बना दिया। मगर यह बहाना चला नहीं बात आ गई कि राजीव दμतर में रहते हैं। तो सीबीआई पूछताछ के लिए उनके घर पहुंच गई। यह बात ममता बनर्जी को नागवार गुजरी और वे धरने पर बैठ गई। इसने सबको चौंका दिया।

वजह, बस यह थी कि सीबीआई तो शारदा चिट फंड घोटाले के बारे में राजीव से जानकारी लेने गई थी। गिरμतार करने तो गई नहीं थी। उसे तो महज घोटाले के बारे में सूचना चाहिए थी जो बतौर जांच अधिकारी राजीव कुमार के पास ही थी। उन्हें 2013 में चिट फंड घोटाले की जांच करनें का जिम्मा सौंपा गया था। जांच में कई सारे दस्तावेज बरामद हुए थे। उनमें कई राजनेताओं के नाम हैं। कहा जाता है कि उन कागजों में ममता बनर्जी के भी राज छुपे हैं। एक दौर में इसी वजह से ममता बनर्जी राजीव कुमार से बहुत नाराज रहा करती थीं। उन्हें ममता ने विपक्ष का एजेन्ट घोषित कर दिया था। वे राजीव कुमार का स्थानांतरण भी करना चाहती थी। पर उनके सहयोगियों ने ममता को समझाया-बुझाया। वे मान गए। इधर राजीव कुमार ने भी हवा का रूख भाप लिया और वे ममता बनर्जी की ढाल बन गए। शारदा चिंट फंड घोटाले में उनके जो निशान थे, उसे मिटाने में लग गए। फिर दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ का सिलसिला शुरू हुआ। आरोपियों के नाम कटने लगे। मुख्यमंत्री के भतीजें यानी कुलाण घोष के दामन की सफाई शुरू हो गई। अंजाम दिया राजीव कुमार ने।

सबूतों को मिटा दिया। इसके एवज में उन्हें ममता से अभयदान मिला। वह उनके खास हो गए। काम ही उन्होंने ऐसा किया था। उस घोटाले में फंसने से ममता को बचा लिया था, जिसमें वे आकंठ डूबी हैं। इसकी भनक सीबीआई को लग गई। तो वह राजीव कुमार से जानकारी मांगने लगीं। वे घोटाले के बारे में कुछ बताने के लिए तैयार नहीं थे। ममता बनर्जी के साथ ने उनको अड़यिल बना दिया। तो सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा। उसने राजीव कुमार को पूछताछ में सहयोग करने का आदेश दिया।

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