मोदी पर भरोसा

‘‘अयोध्या में रामजन्म भूमि पर मंदिर ही बनेगा। मंदिर के सिवाय कुछ भी नहीं। हम एक इंच जमीन नहीं छोड़ेंगे। ’’

मोहन राव भागवत सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

योध्या में राम मंदिर का जटिल मामला अब सहजता से निपटने की ओर बढ़ता लग रहा है। इसमें देर लग सकती है लेकिन दिशा सही है। इस संबंध में केंद्र सरकार की पहल सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उसने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर गैर विवादित 67.70 एकड़ जमीन को उसके मूल मालिकों को वापस करने का आग्रह किया है। उस जमीन पर 2003 से ही यथास्थिति के आदेश हैं। सरकार की इस पहल से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और संत समाज का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर भरोसा बढ़ा है। विश्व हिंदू परिषद की प्रयागराज में हुई धर्म संसद ने सरकार के इस फैसले पर संतोष जताया है। 31 जनवरी और 1 फरवरी की दो दिवसीय धर्म संसद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन राव भागवत पूरे समय उपस्थित थे। देशभर से आये पांच हजार से अधिक संतों के बीच सरकार के कदम को उचित बताया गया।

अयोध्या में अविवादित जमीन के हस्तांतरण पर रोक हटाने के लिए केंद्र सरकार की उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका संबंधी कदम स्वागत योग्य है।

योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश

सिंहद्वार से शुरू करेंगे, गर्भगृह तक जाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे।

स्वामी चिन्मयानंनद, पूर्व गृहराज्यमंत्री

हम तो पहले से ही कह रहे हैं कि विवादित जमीन को छोड़कर सरकार मंदिर बनवाए, हमें कोई एतराज नहीं। विवादित जमीन पर उच्चतम न्यायालय का फैसला ही मान्य होगा।

मो. इकबाल अंसारी, मुद्दई, बाबरी प्रकरण

भागवत ने सरकार की नीयत पर भरोसा जताया। उन्होंने दावा किया किसरकार राम मंदिर के पक्ष में है। उसे संविधान के दायरे में काम करना है। उनका इशारा विवादित भूमि के उच्चतम न्यायालय में लंबित मुकदमे की ओर था। इसमें तारीख पर तारीख पड़ रही है। यानी फैसला विलंब से आने की संभावना है। भागवत ने इसीलिए कहा कि केंद्र सरकार का याचिका दायर करने का फैसला उसकी साफ मंशा का संकेत है। लिहाजा हम सभी को इस सरकार को 4-6 माह का समय देना चाहिए। इस बाबत रखे गये प्रस्ताव पर उन्होंने कहा कि मंदिर राम जन्मस्थान पर ही बनेगा। उसे वही लोग बनवाएंगे जिन्होंने सालों से आंदोलन किया है। यह भी कि राममंदिर के अलावा वहां कुछ नहीं बनेगा। हम एक इंच जमीन छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं।

पूरे मामले पर एक नजर

  • 9 नवंबर 1989 को अशोक सिंहल और संतों की मौजूदगी में राम मंदिर का शिलान्यास किया गया। सिंहल उस समय आंदोलन की अगुआई कर रहे थे। तब उत्तर प्रदेश और केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। राजीव गांधी प्रधानमंत्री और नारायणदत्त तिवारी यूपी के मुख्यमंत्री थे।
  • 6 दिसंबर,1992 को कारसेवकों ने बाबरी ढांचे को ढहा दिया था। लाल कृष्ण आडवाणी, डा. मुरली मनोहर जोशी और अशोक सिंहल प्रमुख रूप से मौजूद थे। तब केंद्र में कांग्रेस का शासन था। नरसिंहराव प्रधानमंत्री थे। भाजपा शासन में कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे।
  • 1993 में केंद्र की तत्कालीन नरसिंहराव सरकार ने विवादित जमीन सहित 67.70 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर लिया। इसमें 42 एकड़ जमीन राम जन्मभूमि न्यास की है।
  • 1994 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सरकार चाहे तो गैर विवादित जमीन उनके मूल मालिकों को लौटा सकती है।
  • 1996 में राम जन्मभूमि न्यास ने अपनी जमीन वापस मांगी लेकिन केंद्र सरकार ने उसकी मांग ठुकरा दी।
  • 1997 में राम जन्मभूमि न्यास इलाहाबाद उच्च न्यायालय में गया। वहां भी उसकी मांग नहीं मानी गयी।
  • 2003 में उच्चतम न्यायालय ने अधिग्रहीत की गयी पूरी जमीन पर यथास्थिति जारी रखने के निर्देश दिये।
  • 30 सितंबर 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला आया। न्यायालय ने विवादित जमीन के तीन हिस्से तीन फरीकों में बांट दिया। एक हिस्सा राम लला विराजमान को, एक हिस्सा निर्मोही अखाड़े को और एक हिस्सा मुस्लिम वक्फ बोर्ड को देने का फैसला किया। इस पर उच्चतम न्यायालय ने रोक लगा दी। उसी जमीन पर शीर्ष न्यायालय का फैसला आना है।
  • 29 जनवरी 2019 को केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय से गैर विवादित जमीन को उनके मूल मालिकों को वापस करने की इजाजत मांगी है।
  • 1 फरवरी 2019 को विश्व हिंदू परिषद की प्रयागराज कुंभ में हुई धर्म संसद ने सरकार के निर्णय पर संतोष जताया। कहा कि सरकार की नीयत साफ है। वह राम मंदिर निर्माण में मददगार होगी।

बहरहाल, प्रस्ताव का अनुमोदन करने जब स्वामी चिन्मयानंद मंच पर आये तो उन्होंने नया नारा दिया, ‘सिंहद्वार से शुरू करेंगे, गर्भगृह तक जाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे।’ मतलब साफ है। राम मंदिर का काम जल्द शुरू होगा। केंद्र की पहल पर शीर्ष न्यायालय का सकारात्मक रुख रहा तो राम जन्मभूमि न्यास मंदिर का काम शुरू कर सकता है। इसमें कोई बाधा भी नहीं दिखती है। 67.70 एकड़ जमीन में 42 एकड़ का स्वामित्व तो राम जन्मभूमि न्याय के पास ही है। उत्तर प्रदेश में 1991 में जब भाजपा का शासन था, मुख्यमंत्री रहते कल्याण सिंह ने राम जन्मभूमि न्यास को 42 एकड़ भूमि लीज पर राम कथा पार्क के निर्माण के लिए दी थी। 9 नवंबर 1989 को जिस स्थान पर राम मंदिर का शिलान्यास हुआ था, वह जमीन इसी का हिस्सा है। जहां शिलान्यास हुआ था, वहां राम मंदिर का सिंहद्वार बनाने की योजना थी।

इसीलिए पूर्व गृहराज्य मंत्री स्वामी चिन्मयानंद के नये नारे का निहितार्थ समझना होगा। यानी विश्व हिंदू परिषद को जमीन मिली तो शुरुआत सिंहद्वार से होगी। माना जा रहा है कि इस बीच विवादित जमीन पर शीर्ष न्यायालय का फैसला आ सकता है। विवादित जमीन के मुस्लिम पक्षकार इकबाल अंसारी का बयान भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि विवादित जमीन को छोड़कर शेष भूमि को उनके मूल मालिकों को लौटाने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

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