दुष्प्रचार की मशीन एन. राम

न. राम खबर के बजाए राजनीति कर रहे हैं। उसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन जब मामला सुरक्षा से जुड़ा हो तो राजनीति मुनासिब नहीं होती। पर उन्हें इसकी परवाह नहीं है। वे एजेंडा चलाने में लगे हुए हैं। तभी तो जिन तथ्यों को खारिज किया जा चुका है, उसे लेकर सनसनी फैला रहे हैं। यह कोर्ट को फरेब में फंसाने की साजिश है और जनता को गुमराह करने की एक चाल। दावा तो यही किया जा रहा है। ओपइंडिया की मानें तो एन. राम झूठी खबर परोस रहे हैं। वे जो दस्तावेज रखकर, राफेल को घोटाला करार देने की कोशिश में हैं, वह गुमराह करने की एक तरकीब है। एन. राम का दावा है कि राफेल सौदे में रक्षा खरीद नीति 2013 का पालन नहीं हुआ। यही दावा सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने से पहले भी किया जा रहा था।

देश की सुरक्षा संवेदनशील मसला है। इस पर राजनेता से लेकर पत्रकार तक को गंभीर होकर बात करना चाहिए। मगर राफेल के मामले में ऐसा नहीं हो रहा। एऩ राम जैसे वरिष्ठ पत्रकार कई तथ्यों को छुपाकर इसके दुष्प्रचार में जुटे हुये हैं। खबर के बजाए राजनीति कर रहे हैं। उसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन जब मामला सुरक्षा से जुड़ा हो तो राजनीति मुनासिब नहीं होती।

उन्हीं दावों को कोर्ट ने खारिज किया था और कहा था कि सौदा तय प्रक्रिया के तहत हुआ है। इससे सरकार को कठघरे में खड़ी करने वाली बिरादरी बहुत मायूस हुई थी। उन्होंने कहा था कि वे चुप नहीं बैठेंगे। राफेल को फिर से मुद्दा बनाएंगे। एन. राम ने उसी कोशिश को आगे बढ़ाया। उनका लेख उसी कड़ी का हिस्सा है। वे जो लिख रहे हैं, उसमें सीधा सरकार पर आरोप लगा रहे हैं। उनका दावा है कि सरकार ने राफेल सौदे में नियम के मुताबिक काम नहीं किया है। उसमें भ्रष्टाचार के लिए रास्ता खुला छोड़ दिया। भुगतान के लिए जो मानक तय किया गया, सरकार उससे पीछे हट गई। बिचौलियों के लिए जगह बनाई ताकि सौदे में हेराफेरी हो सके। अपने कहे को साबित करने के लिए आधे-अधूरे दस्तावेज सामने रखे।

कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय रक्षा मंत्रालय के समानांतर सौदे के लिए बात कर रहा है। इससे मंत्रालय के लोग नाराज थे। हालांकि जब सरकार ने पूरा दस्तावेज जारी किया तो एन. राम की पोल खुल गई। पता चला कि वे आधा ही दस्तावेज दिखा रहे थे। रक्षामंत्री के नोट को वे छुपा गए। उससे एन. राम बेनकाब हो गए। नोटिंग में रक्षामंत्री ने कहा था कि अगर प्रधानमंत्री कार्यालय सौदे को लेकर बात कर रहा है, तो सही है। मतलब विरोध जैसी कोई बात नहीं है। लेकिन एन. राम को विरोध और भ्रष्टाचार के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा है। वे रोज कुछ लिख रहे हैं। कहने के लिए नया तथ्य बता रहे हैं, पर असल में सब पुराने हैं। कारण वे जितने भी सवाल उठा रहे हैं, उस मूल में रक्षा खरीद नीति है। उसकी व्याख्या एन. राम अपने हिसाब से कर रहे हैं। बिल्कुल उसी तरह जैसे दस्तावेजों का किया। रक्षा खरीद नीति 2013 का एक अनुच्छेद 71 भी है। वह रक्षा सौदे को लेकर जो कहता है उसे एन. राम नहीं बताते। उसे छुपाने में लगे हैं। उस पर भी उन्हें बात करनी चाहिए। कोर्ट के निर्णय में भी उसका जिक्र है। वही अनुच्छेद पूरे राफेल सौदे की धुरी है। पर एन. राम उस पर कुंडली मारे बैठे हैं। उसको नहीं बता रहे हैं।

जो भी हो पर यह तो साफ है कि राफेल डील रक्षा नीति के मुताबिक हुई है। बैंक गारंटी को लेकर भी बात हो रही है। सवाल एन. राम उठा रहे हैं। पर वे दो बातें भूल रहे हैं या फिर जानबूझ कर उसकी अनदेखी कर रहे हैं। पहला, यह सौदा दो सरकारों के बीच हुआ है। इस वजह से बैंक गारंटी मायने नहीं रखती है। कारण बैंक गांरटी तब बाध्य है जब सौदा निजी कंपनी से हो।

रक्षा खरीद नीति 2013 का अनुच्छेद 71 कहता है, ‘जब किसी मित्र राष्ट्र के साथ भूराजनीतिक परिस्थितयों को ध्यान में रखते हुए सौदा होता है तो वह तय प्रक्रिया के बजाए दोनों देशों की परस्पर सहमति पर होगा।’
इस पर बात करने के बजाए एन. राम गोल-गोल घूम रहे हैं। उसकी वजह साफ है। वे राजनीतिक अभियान चला रहे हैं। कायदे से यदि कोई यह अनुच्छेद पढ़ेगा, तो यही कहेगा। इसमें स्पष्ट लिखा है कि मित्र देश से सौदा करते समय तय प्रक्रिया मायने नहीं रखती। दोनों देशों के बीच परस्पर सहमति ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। उसी के तहत राफेल सौदा हुआ है। इस बात को एन. राम भी जानते हैं और कांग्रेस भी। हां, राहुल गांधी का नहीं पता कि वे इसे समझते हैं या नहीं। पर कांग्रेस तो जानती है। रक्षा खरीद नीति 2013 उनकी ही रचना है। जहां तक बात एन. राम की है तो वे बड़े पत्रकार है। उन्हें तो इसके बारे में जरूर जानकारी होगी। अगर नहीं है तो उन्हें रक्षा खरीद नीति को दोबारा पढ़ना चाहिए। यदि उसमें कोई समस्या हो तो उन्हें अपने वकील मित्रों से राय लेनी चाहिए।

खैर, जो भी हो पर यह तो साफ है कि राफेल डील रक्षा नीति के मुताबिक हुई है। बैंक गारंटी को लेकर भी बात हो रही है। सवाल एन. राम उठा रहे हैं। पर वे दो बातें भूल रहे हैं या फिर जानबूझ कर उसकी अनदेखी कर रहे हैं। पहला, यह सौदा दो सरकारों के बीच हुआ है। इस वजह से बैंक गारंटी मायने नहीं रखती है। कारण बैंक गांरटी तब बाध्य है जब सौदा निजी कंपनी से हो। पर इस सौदे में भारत सरकार सीधे फ्रांस की सरकार से खरीदारी कर रही है। उसमें राफेल निमार्ता कंपनी कहीं नहीं है। इसके विपरीत जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार राफेल के लिए बात कर रही थी तो उसका सीधा सरोकार राफेल निमार्ता कंपनी से था। यहां भारत सरकार का सीधा वास्ता फ्रांस की सरकार के साथ है। इसलिए बैंक गारंटी बहुत बड़ा मसला नहीं है। अमेरिका और रूस से भी जो रक्षा सौदा हुआ है, उसमें बैंक गारंटी नहीं है। उसे लेकर न तो एन. राम ने अभियान चलाया और न ही कांग्रेस ने। कायदे से उस पर भी सवाल उठाना चाहिए था। आखिर क्या कारण है कि रूस के साथ हुए सौदे पर कांग्रेस चुप है।

कारण, अगर बैंक गारंटी न होने की वजह राफेल सौदे में गड़बड़ी हुई है तो रूस के सौदे में भी गडबड़ी हुई होगी। अमेरिका के साथ जो रक्षा सौदा हुआ है उसमें भी गड़बड़ी हुई होगी। एऩ राम भी जानते हैं कि सौदा नियम अनुरूप हुये हैं। उसमें कोई हेराफेरी नहीं हुई है। इसलिए उसे नहीं उठा रहे हैं। जहां तक बात राफेल की है तो वह एन. राम की राजनीति का हिस्सा है। इसलिए वे तमाम तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं। एनडीटीवी के रक्षा संपादक विष्णु सोम ने एन. राम के झूठ को बेनकाब किया है।

विष्णु सोम उन पत्रकारों में शामिल है जो 2007 से राफेल सौदे को कवर कर रहे हैं। वे लिखते हैं कि संप्रग सरकार जिस राफेल के लिए बात कर रही थी, उससे ज्यादा उन्नत तकनीकी का राफेल भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने खरीदा है। वे उदाहरण देते हुए कहते हैं कि स्विμट डिजायर के कई मॉडल आते हैं। आप कौन सा मॉडल लेते हैं कीमत उस पर निर्भर करती है। मौजूदा सरकार ने ज्यादा उन्नत मॉडल खरीदा। इसलिए उसे अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। एन. राम अपने राजनीतिक अभियान में इस बात को छुपा रहे हैं। वे राहुल गांधी की तरह बात कर रहे हैं। यह सामान्य व्यक्ति भी जानता है कि जो कीमत 2007 में थी, वह 2016 तक काफी बढ़ गई होगी। यह अर्थशास्त्र का सामान्य सिद्धांत है। पर एन. राम और राहुल गांधी सामान्य से विपरीत व्यवहार कर रहे हैं।

उनकी मानें तो 2007 से 2016 तक राफेल की कीमत स्थिर रही। उसने राफेल में कोई उन्नत तकनीकी भी नहीं जोड़ी। क्या यह संभव है कि रोज बदलते तकनीकी के दौर में जब मोबाइल की तकनीकी बदल जा रही है तो राफेल में कोई बदलाव नहीं हुआ होगा? जाहिर है हुआ है। तभी तो विष्णु सोम लिख रहे हैं मगर एन. राम उसे लिखने के बजाए, यह बता रहे हैं कि कीमत ज्यादा अदा की जा रही है। जो सीधे तौर पर झूठ है। भुगतान के बारे में भी वे सच नहीं बता रहे हैं।
विष्णु सोम के मुताबिक फ्रांस की सरकार ने भुगतान के लिए पुख्ता व्यवस्था की है। वहां के सरकारी बैंक में एक अलग कोष का निर्माण किया गया है, जो सीधे सरकार के नियंत्रण में है। राफेल का भुगतान भारत सरकार इसी कोष में करती है। यहां से पैसा राफेल निमार्ता कंपनी को भेजा जाता है। यह व्यवस्था भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए की गई है। एन. राम इसे भी छुपा रहे हैं। इससे जाहिर है कि वे इन दिनों दुष्प्रचार की मशीन बन गए हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here