राहुल कब तक बांट पाएंगे खैरात?

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जिस दिन छत्तीसगढ़ में कहा कि उनकी पार्टी सत्ता में आई तो देश में हर गरीब को न्यूनतम आय की गारंटी देगी। उसी दिन से सार्वजनीन बुनियादी आय (यूनिवर्सल बेसिक इनकम) पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। मोदी सरकार के इस कार्यकाल के अंतरिम बजट में किसानों व असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को एक निर्धारित राशि दिए जाने की घोषणा ने इस बहस को और तेज कर दिया है। क्या भारत में सार्वजनीन बुनियादी आय देना संभव है? यह बात पहली बार 2016-2017 के आर्थिक सर्वेक्षण में आई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विशेष आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यन ने इसे पूरे विस्तार से पेश करते हुए कहा था कि महात्मा गांधी हमेशा ‘हर आंख से अंतिम आंसू पोंछे जाने की जरूरत’ बताते थे। यूनिवर्सल बेसिक इनकम उस जरूरत को पूरा करती है।
समझा जा रहा था कि इस अंतरिम बजट में मोदी सरकार लोकलुभावन बजट (पापुलिस्ट बजट) पेश करने के बाद यूनिवर्सल बेसिक इनकम की घोषणा कर सकती है। माना जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने उससे पहले ही गरीबों को न्यूनतम आय की गारंटी का आश्वासन दे बाजी मारने की कोशिश की है। कितने सफल होते हैं यह चुनावी नतीजे बताएंगे लेकिन इससे यह जरूर साफ हो गया है कि उनके पास भी ऐसी कोई योजना या कार्यक्रम नहीं है जिससे देश में रोजगार बढ़े और युवकों व गरीबों को काम मिले।

क्या राहुल गांधी या कांग्रेस लगातार महंगी होती शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं को कारपोरेट जगत के चंगुल से बाहर निकाल पाएंगे? यह जरूरी है, नहीं तो गरीब के खाते में गई न्यूनतम आय से वह रोटी तो खा लेगा पर अपने को एक सक्षम नागरिक नहीं बना पाएगा। उसके बिना रोजगार कैसे करेगा? अगर वह ठीकठाक कमा ही नहीं पाएगा तो आप भी खैरात कब तक बांटते रहोगे।

राहुल गांधी की मां सोनिया गांधी के मार्गदर्शन में बनी नेतृत्व में बनी मनमोहन सिंह सरकार ने रोजगार आधारित मनरेगा योजना शुरू की थी। अपनी तमाम खामियों के बावजूद अगर आज भी वह जारी है और मोदी सरकार के इस अंतरिम बजट में भी उसके लिए र्प्याप्त राशि की व्यवस्था की गई है तो इसलिए कि उससे दूरदराज गांवों तक में गरीब को काम मिला, उसके हाथ में रोटी खाने लायक पैसा आया। पलायन रुका। दूसरा, गांवों में कुछ उपयोगी ढांचागत विकास हो सका। गांवों में गरीबी व बेरोजगारी को दूर करने के लिए देश को ऐसी ही श्रम आधारित योजनाओं व कार्यक्रमों की जरूरत है लेकिन ऐसा लगता है कि कांगे्रस पैसे की बंदरबांट करके ही साबित करना चाहती है कि वह अपने जनकल्याण आधारित समाजवादी एजेंडे पर ही टिकी हुई है। 2009 में किसानों के 6000 रुपये करोड़ के कर्ज माफ करके वह दोबारा सत्ता में लौटी थी। अभी 2018 में तीन राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में भी उसने किसानों के कर्ज माफ करने का वादा किया था और उसका लाभ उसे मिला भी। किसानों के साथ साथ उसने बेरोजगार युवकों को बेरोजगारी भत्ता देने की घोषणा की थी। उसका भी उसे लाभ मिला। इन घोषणओं के साथ तीन राज्यों में जीत का ही नतीजा है कि राहुल गांधी ने सत्ता में आने पर हर गरीब को न्यूनतम आय की गारंटी की घोषणा कर डाली।
मोदी सरकार ने किसानों के कर्ज तो माफ नहीं किए पर हर छोटे किसान के खाते में छह हजार रुपये डालने की व्यवस्था कर कांग्रेस की ही तरह अपने दोबारा सत्ता में लौटने का बंदोबस्त किया है। यह उनकी अपने से निराश किसानों को मनाने की कोशिश हो सकती है और बहुत संभव है वे इसमें कामयाब भी हो जाएं। लेकिन पैसे बांट कर रूठों को मनाने का यह तरीका किसी भी तरह देश हित या जनहित में नहीं है। आर्थिक सर्वेक्षण में यूनिवर्सल बेसिक इनकम का जिक्र करते हुए आर्थिक विशेषज्ञ अरविंद सुब्रमण्यन ने यही कहा था कि सभी तरह की सब्सिडी को बंद कर एक निश्चित रकम हर महीने गरीब परिवारों के खाते में डाल दी जाए तो आर्थिक व सामाजिक स्थिति में निश्चित ही सुधार आ सकता है।
कहने की जरूरत नहीं कि बजट से ठीक एक दिन पहले संसद में पेश किए जाने वाले आर्थिक सर्वेक्षण में यूनिवर्सल इनकम पर पूरा एक अध्याय प्रधानमंत्री की सहमति से ही शामिल किया गया होगा। 2017 में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा भी था कि अगर कोई सरकार या संगठन किसी राज्य में बेसिक इनकम के संदर्भ में पायलेट प्रोजेक्ट चलाना चाहता है तो केंद्र उसे मदद करने पर विचार कर सकता है। उधर जम्मू-कश्मीर में वित मंत्री हसीब द्राबू ने 2017 के बजट में कंस्ट्रक्शन मजदूरों के लिए बेसिक इनकम की घोषणा की थी। अब मोदी सरकार द्वारा किसानों को छह हजार रुपये उनके खाते में डलवाने की घोषणा राष्ट्रीय स्तर पर उसकी एक प्रायोगिक शुरुआत कही जा सकती है।
न्यूनतम आय संबंधी योजना के लिए पैसा मिलना तभी संभव है जब आज की तारीख में चल रही हर कल्याणकारी योजना को बंद कर सारा पैसा एक जगह कर लिया जाए। फिर चाहे वह स्वास्थ्य संबंधी हो, या पीडीएस अथवा शिक्षा या किसी भी तरह की पेंशन या रोजगार मसलन मनरेगा। स्वरोजगार महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए काम कर रहे संगठन सेवा ने जब मध्य प्रदेश के चार जिलों के 22 गांवों में बुनियादी आय का प्रयोग किया तो यही किया गया था। उसने इन गांवों के हर परिवार को, अमीर-गरीब सभी, एक निश्चित राशि हर महीने दी और कहा कि वह अपनी इच्छा से चाहे जैसे इसका इस्तेमाल करे। सेवा का कहना है कि उसके काफी अच्छे नतीजे आए। उसने यह प्रयोग यूनिसेफ के साथ मिलकर किया था। 15 अप्रैल 2017 के यथावत के अंक में ‘बुनियादी आय के पक्ष में बनने लगा माहौल’ शीर्षक से छपे मेरे आलेख में इसका विस्तृत जिक्र किया गया है। उसी में यह भी बताया गया था कि कैसे 2019 के चुनाव तक बुनियादी आय चर्चा का एक खास मुद्दा बन जाएगा।
राहुल गांधी ने गरीबों को न्यूनतम आय की घोषणा तो की पर यह नहीं बताया कि इसके लिए पैसा कहां से आएगा? क्या वे मनरेगा व पीडीएस समेत शिक्षा, स्वास्थ्य, पेंशन आदि बाकी की सारी कल्याणकारी योजनाओं को बंद कर देंगे? नहीं तो इतने पैसे की व्यवस्था कैसे होगी? यह भी नहीं पता कि उनकी निगाह में गरीब कौन होगा? अर्जुन सेनगुप्ता समिति ने 2009 की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भारत की 77 प्रतिशत जनता 2004-05 में प्रतिदिन 20 रुपये से भी कम आय पर जी रही थी जबकि सुरेश तेंदुलकर समिति का कहना था कि 2004-05 में गांवों में गरीबी रेखा पर जी रहे प्रति व्यक्ति की मासिक आय 447 रुपये व शहर में 579 रुपये थी। 2018 में सवर्णों को आर्थिक आरक्षण देते हुए मोदी सरकार ने आठ लाख सालाना कमाने वाले को गरीब माना है। ऐसे में राहुल गांधी अगर सत्ता में आते हैं तो गरीबी रेखा क्या होगी? यह शायद वे खुद भी तय न कर पाएं। न्यूनतम आय कार्यक्रम को लागू कैसे किया जाएगा, यह भी उन्होंने कुछ साफ नहीं किया। कांग्रेस की घोषणपत्र समिति के सदस्य पी चिदंबरम कह रहे हैं कि समिति इन सभी बिदुओं पर विचार कर रही है और घोषणापत्र में पूरी योजना का खुलासा कर दिया जाएगा।
मान लिया। पर क्या उसे लागू करवा पाना आसान होगा? सबसे बड़ी बात क्या वह देश की अर्थव्यवस्था के सुधरने की गारंटी होगी? जनआधारित कोई भी योजना तभी कामयाब मानी जा सकती है जब उससे हर नागरिक की सामाजिक आर्थिक स्थिति मजबूत हो। उसके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं को गरीबों की हद में लाना और श्रम आधारित रोजगार खड़े करना समय की मांग है। क्या राहुल गांधी या कांग्रेस लगातार महंगी होती शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं को कार्पोरेट जगत के चंगुल से बाहर निकाल पाएंगे?
यह जरूरी है, नहीं तो गरीब के खाते में गई न्यूनतम आय से वह रोटी तो खा लेगा पर अपने को एक सक्षम नागरिक नहीं बना पाएगा। उसके बिना रोजगार कैसे करेगा? और अगर वह ठीकठाक कमा ही नहीं पाएगा तो आप भी खैरात कब तक बांटते रहोगे। साल, दो साल। उसके बाद? क्या उससे किसान की समस्याओं का हल निकल आएगा। सारे देश के किसानों के कर्जे माफ करने हैं और न्यूनतम आय भी देनी हैं। तो क्या देश बेहद मजबूत अर्थव्यवस्था, जैसा कि मोदी जी कह रहे हैं, के दौर में है? फिनलैंड तो एक छोटा सा और समृद्ध देश है। वही सार्वजनीन बुनियादी आय योजना को नहीं निभा पाया तो विभिन्न समस्याओं से जूझ रहा विशाल भारत कैसे निभा पाएगा। इसलिए कहने को चाहे जो भी कहें ‘हर गरीब को न्यूनतम आय’ कांगे्रस के ‘गरीबी हटाओ’ नारे जैसा ही एक और चुनावी नारा ही है।

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