परंपरा के बरअक्स स्त्री-अस्मिता का संघर्ष

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मय के साथ आये तमाम सामाजिक और राजनीतिक बदलावों के बावजूद उत्तर भारत के ग्रामीण समाज के सामंती, जातिग्रस्त और रूढि़वादी परिवेश का यथार्थ अभी भी कमोबेश जस का तस है। इसके साथ उल्लेखनीय यह है कि उत्तर-आधुनिक और उसके बाद की हिंदी कहानी और उपन्यास ने प्रयोगधर्मिता के अपने आग्रह, आकर्षण और अपनी शहरी मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि के कारण अपनी कथा-वस्तु के चयन में इस परिदृश्य को अनदेखा करना शुरू कर दिया है। इसके पीछे यह सोच भी है कि ग्रामीण समाज का यथार्थ अब पर्याप्त उद्घाटित हो चुका है और साहित्य को अब दूसरी अनछुए जमीनों की तलाश करनी चाहिए। यह सोच अपने आप में जितनी इकहरी है, उतनी ही अनुचित भी। नम्रता सिंह का हाल ही में उत्कर्ष प्रकाशन से आया नया उपन्यास ‘बसंत के दो रंग’ इस लिहाज से एक ताज़ा हवा के झोंके की तरह है।

पुस्तक-नाम
बसंत के दो रंग
लेखक
नम्रता सिंह
मूल्य
200 रुपये
प्रकाशक का नाम
उत्कर्ष प्रकाशन, 142, शाक्य
पुरी, कंकरखेड़ा, मेरठ
कैन्ट-250001 (उत्तर प्रदेश)

उपन्यास बखूबी यह सिद्ध करता है कि यथार्थ कभी पुराना नहीं पड़ता। परंपरा के बरअक्स और उसके भीतर स्त्री अस्मिता के संघर्ष को केंद्र में रख कर लिखा गया उपन्यास अपने शिल्प की सादगी में कुशलता से अपने परिवेश की परतें हटाता चलता है। इस तरह पूरी कहानी रोचक पठनीयता से भर जाती है। स्त्री-अस्मिता को केंद्र में रख कर पिछले कुछ सालों में अनेक कहानियां और उपन्यास हिंदी जगत में सामने आये हैं। ‘बसंत के दो रंग’ के साथ खास यह है कि इसमें न तो इंकलाब का कोई मूर्तिभंजक शोर है और न ही अति नारीवादी विचारधारा से प्रेरित असंभव क्रान्ति का कोई आह्वान। उपन्यास में कुसुम और मैना के चरित्रों के भिन्न मगर समानांतर संघर्षों को इसी नजरिये से देखने की जरूरत है। एक सामंती समाज में जितना अभिशप्त किसी विधवा स्त्री का जीवन होता है, उससे कम किसी ब्याहता को भी नहीं झेलना पड़ता। नियति पर किसी का कोई बस नहीं हो सकता लेकिन सारा फर्क नियति के आगे लाचार समर्पण नहीं करने की हमारी जिद से पैदा होता है। उपन्यास में कुसुम इसी संघर्ष की मिसाल बनती हुई अपने विवाह संबंध में भयंकर रूप से छले जाने और अपने सपनों के चकनाचूर हो जाने के बाद भी मूक निरीहता के साथ अपनी नियति के आगे समर्पण करने की बजाय स्त्रियोचित गरिमा के साथ अवश्यम्भावी मृत्यु का वरण करती है।

वहीं मैना की परिस्थितियां जितनी मारक और त्रासद हैं, वह उतनी ही मजबूती से उनका सामना करती हुई अपने सपनों को जिंदा रखती है। वह अंतत: अपने हालात में तब्दीली में भी कामयाब होती है। बसंत में अंतर्निहित दोनों रंगों-उदासी और प्रसन्नता- के अपने समानांतर संघर्षों का आशय यही है कि पितृसत्ता के साथ स्त्री अधिकारों और समानता की लड़ाई का नेतृत्व स्वयं स्त्रियों को ही करना पड़ेगा। ‘बसंत के दो रंग’ की एक और सशक्त थीम है भीषण रूढि़ग्रस्त परिवेश में प्रगतिशील तत्वों की मौजूदगी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ठकुराइन पतरका आजी का पात्र है। सामान्य रूप से सामंती ठाकुरों के परिवार की वयोवृद्ध महिला चरित्रों का जैसा निरूपण किया जाता है, पतरका आजी उनसे ठीक उलट हैं। वे अपने समय से कहीं आगे जान पड़ती हैं। यही प्रगतिशीलता शशिकला और प्रधान हरिहर सिंह जैसे लोगों को भी समाज में अलग से रेखांकित करती है। कहने की जरूरत नहीं कि वास्तविक दुनिया में भी ऐसे लोग सदैव धरातल पर सक्रिय होते हैं और धीरे-धीरे ही सही, स्त्री अस्मिता के महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर ढूंढने में योगदान करते चलते हैं। उपन्यास अपने मूल कथ्य में ब्राह्मणवादी और धार्मिक पाखंडों की कलई भी खोलता है।

यह आलोचना कटु कम और सकारात्मक अधिक है। दृष्टिकोण की यही सकारात्मकता इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत है। ‘बसंत के दो रंग’ की एक और विशेषता इसकी सहज आंचलिकता है। यह आंचलिकता उपन्यास की भाषा से तो व्यक्त होती ही है, कहानी के यथार्थपरक ट्रीटमेंट में भी खुल कर सामने आती है। उपन्यास का पाठ सरल और बोधगम्य है। कहानी में स्वाभाविक रूप से आरोह आता है और इसके चलते उपन्यास कभी बोझिल नहीं होता।

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