आधुनिक समस्याओं का सनातन समाधान

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मारे देश की वैचारिक बहसों में ‘पश्चिमी संस्कृति बनाम भारतीय संस्कृति’ का मुद्दा अक्सर विमर्श के केंद्र में होता है। पश्चिमी संस्कृति यानी वह जीवन-दर्शन, जो प्रकृति को जीतकर आगे बढ़ने की बात करता है। प्रकृति पर कब्जा जमाना, उसमें तोड़फोड़ मचाकर उसे अपने मनमुताबिक ढाल लेने की काबिलियत हासिल करना पश्चिमी संस्कृति की बुनियादी सोच है। विज्ञान और तकनीक का आधुनिक ढांचा इसी सोच पर आधारित है। इसके विपरीत, भारतीय संस्कृति प्रकृति के साथ समरस होकर जीने की बात करती है। भारतीय संस्कृति प्रकृति को जीत लेने, नष्ट कर देने की नहीं, बल्कि उसमें अपना योगदान करते हुए ‘जियो और जीने दो’ की बुनियादी सोच पर चलती है। उपभोक्तावाद की पूरी बहस दरअसल दो संस्कृतियों के इसी वैचारिक घर्षण का प्रतिफल है। समस्या इस विमर्श में नहीं है। यह ऊपर से बड़ी उदात्त और जरूरी बहस लगती है, पर परेशानी तब खड़ी होती है, जब हम इस पूरी बहस की भीतरी पर्तों को कुछ और गहराई से खंगालने की कोशिश करते हैं। पता चलता है कि जिन दो सांस्कृतिक छोरों की शिनाख्त का दम हमारे बुद्धिजीवी भरते हैं, उन्हीं के बारे में उनकी बुनियादी समझ बहुत अधकचरी है।

पुस्तक-नाम- वैदिक सनातन हिंदुत्व
लेखक- मनोज सिंह
मूल्य 250 रुपये
प्रकाशक का नाम
प्रभात पेपरबैक्स, 4/19 आसफ
अली रोड, नई दिल्ली-110002

भारतीयता की अधकचरी समझ से निकलकर आ रहीं भांति-भांति की बेस्टसेलर किताबों के इस दौर में इसी बिंदु पर आकर मनोज सिंह की नई किताब ‘वैदिक सनातन हिंदुत्व’ काफी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। इस किताब के पन्ने पलटते हुए आप महसूस कर सकते हैं कि धर्म-दर्शन-संस्कृति पर फैलाए जा रहे साहित्यिक कचरे के खिलाफ जैसे यह ‘स्वच्छता अभियान’-सी हो। मनोज सिंह शुरुआत में ही भारतीय मनीषा के दिए हुए बुनियादी सूत्र ‘नेति नेति’ को अपने विमर्श का प्रस्थान-बिंदु बनाते हैं, इसलिए वे उच्छृंखल बयानबाजी से तो बचे ही रहते हैं, फतवेबाजी की आदत के भी शिकार नहीं होने पाते। वे धर्म-संस्कृति की जमीनी हकीकत की बात करते हैं। उनकी यह किताब हिंदी के पाठकों को उस भावभूमि में उतारती है, जहां हमारे सांस्कृतिक-धार्मिक आख्यानों को चालाकी से महज गल्प का ढेर बना देने के बरअक्स एकदम व्यावहारिक स्तर पर सनातनता का सांस्कृतिक यथार्थ भरपूर तार्किकता के साथ रूपाकार होता हुआ दिखाई देने लगता है।

लेखक की असली कामयाबी यही है। ‘वैदिक सनातन हिंदुत्व’ की आत्मविश्वासपूर्ण उद्घोषणा है– ‘अगली सदी का एकमात्र प्रवेश मार्ग।’ इस उद्घोषणा के पीछे आधुनिक जीवनशैली की विफलता का वह स्पष्ट चेहरा है, जो अनगिन वैज्ञानिक उपलब्धियों के मुकुट का भार थामे कुछ यों दबता दिखाई दे रहा है कि जीवन की असली आश्वस्ति और आह्लाद की आभा दिन-ब-दिन जैसे गायब ही होती जा रही है। लेखक विज्ञान के अध्येता रहे हैं, तो विज्ञान की कचरा समझ को भी परत-दर-परत उघाड़ पाने में कामयाब हैं। पुस्तक तार्किक तरीके से स्थापित करती है कि आधुनिक विज्ञान को प्रामाणिकता का मानदंड बनाना भ्रमात्मक है और पूरी मानव जाति को इसने एक ऐसे मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से और आगे जाना विनाश के अंधकूप में गिरने जैसा ही होगा। पुस्तक भारतीय संस्कृति के उन पैरोकारों को भी सावधान करती है, जो अहर्निश इस तलाश के पुरुषार्थ में लगे रहते हैं कि वेद में कहां-कहां विज्ञान की बातें हैं। इसके उलट इसकी स्थापना है कि हमें यह देखना चाहिए कि आज के विज्ञान में वेद कहां-कहां है। यदि वेद की शिनाख्त जीवन के प्रकृतिसम्मत दर्शन के रूप में करें तो इस किताब का यह सवाल भी लाजिम हो ही जाता है कि यदि विज्ञान की तमाम निर्मितियों में प्रकृति के साथ समरसता का कोई जीवन- दर्शन नहीं, तो आखिर इसकी उपयोगिता भी क्या? वैज्ञानिक प्रगति की विडंबनाओं पर यह किताब कुछ बुनियादी सवाल उठाकर ही चुप नहीं हो जाती, बल्कि आधुनिक समाज की समस्याओं को तरतीब से खंगालती है और उनके समाधान वैदिक सनातन संस्कृति के माध्यम से सुझाती है। व्रत-त्योहार, रीति-रिवाज, मेले-पर्व, कर्मकांड-अनुष्ठान, पूजा-अर्चना जैसी तमाम चीजों, मान्यताओं, विधियों के पीछे की तार्किकता और व्यावहारिकता को लेखक जिस तरीके से खोलते हैं, वह दिलचस्प है और भारतीय अस्मिता के प्रति गौरव के क्षण उपलब्ध कराने जैसा है। निष्कर्ष रूप में कहें तो ‘वैदिक सनातन हिंदुत्व’ विचारोत्तेजक तो है ही, यह स्थापित करने में भी कामयाब है कि वैदिक सनातन संस्कृति, जिसे आज के समय में हिंदू संस्कृति कहा जाता है, प्रकृति के संरक्षण की संस्कृति है; उपभोक्तावाद के बरअक्स ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा’ की संस्कृति है; और इसलिए, संसार के लिए यह सही मायने में कल्याणकारी है।

 

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