संघर्ष को बनाया सेवा की ताकत

न 1947 में देश आजाद तो हुआ लेकिन देश का विभाजन भारतीय इतिहास में एक काला अध्याय है। लाखों परिवार बेघर हुए। विभाजन के बाद पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दू परिवारों को या तो मार दिया गया या अमानवीय व्यवहार कर पाकिस्तान से भगा दिया गया। हजारों परिवार इन अमानवीय यातनाओं से टूटकर बिखर गए लेकिन कुछ परिवारों ने हिम्मत नहीं हारी, संघर्ष किया और यातनाओं को ही ताकत बना लिया। ऐसा ही एक परिवार ओम प्रकाश आर्य का है जो विभाजन के समय विस्थापित हुआ।

ओम प्रकाश ने विभाजन के समय मिली यातनाओं और अभावों को अपनी ताकत बनाकर विभाजन के दौरान बिना दवा के रोगों और बीमारियों से जूझ लोगों के लिए कुछ करने का प्रण लिया। खाली हाथ होते हुए भी चल पड़े समाज को निरोगी बनाने। आज उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर के लालकुर्ती क्षेत्र में श्याम होम्योपेथी चिकित्सा केंद्र चलते है जहां रोगियों को नि:शुल्क दवा दी जाती हैं। ओम प्रकाश उस पंजाब के मूल निवासी हैं जो अब पाकिस्तान में है। विभाजन के बाद पंजाब लुधियाना (भारत) में आकर बस गए। कुछ रिश्तेदार हरियाणा के भिवानी में रहते थे जिनके कहने पर भिवानी में रहने लगे। कुछ दिनों बाद बड़े भाई के बुलाने पर मेरठ आ गये ओम प्रकाश आजादी के पहले से ही संघ के स्वयंसेवक हैं जिनके दो बेटे हंै राकेश आर्य और दिनेश आर्य। ओम प्रकाश मेरठ में संघ के विभिन्न दायित्वों पर रहे हैं। मन में हमेशा सेवा का भाव था। अतएव सेवा भारती के सेवा कार्यों में सक्रियता बढ़ती गयी।

ओम प्रकाश ने विभाजन के समय मिली यातनाओं और अभावों को अपनी ताकत बनाया। बिना दवा के रोगों और बीमारियों से जूझ लोगों के लिए कुछ करने का प्रण लिया। खाली हाथ होते हुए भी चल पड़े समाज को निरोगी बनाने। आज उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर के लालकुर्ती क्षेत्र में श्याम होम्योपेथी चिकित्सा केंद्र चलते हैं जहां रोगियों को नि:शुल्क दवा दी जाती है।

बड़े बेटे राकेश आर्य को सेवाभारती के द्वारा लगाए गए होम्योपेथी प्रशिक्षण शिविर में प्रशिक्षण दिलाया। इस के बाद शुरू हुई सेवा और त्याग की नवयात्रा। सन 1996 में अपने घर से ही रोगियों को नि:शुल्क दवा देना शुरू किया। जैसे-जैसे आने वाले रोगी, निरोगी होकर जाने लगे, मरीजों की संख्या भी बढ़ने लगी। एक समय ऐसा भी आया जब काफी आर्थिक परेशानियां आयीं लेकिन न तो ओमप्रकाश पीछे हटे, न ही उनके बेटे राकेश आर्य ने हिम्मत हारी। सेवा की इस अनंत यात्रा में आगे बढ़ते गए। राकेश आर्य बताते हैं कि वो इस सेवाकार्य को ईश्वर की वंदना के रूप में करते हंै। उनके पास काफी दूर दूर से मरीज आते हैं और जब कोई भी मरीज उनके पास आकर निरोगी होकर जाता है तो उनको ईश्वर की अनुभूति होती है। राकेश जिम में प्रयोग होने वाली मशीनें बनाने वाली फैक्ट्री चलाते हैं। अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकालकर रात्रि आठ बजे चिकित्सालय जाते हंै और देर रात तक मरीज देखते हं।ै रविवार को पूरे दिन मरीजों को देखते हैं। वह इस सेवा कार्य को ईश्वर की पूर्ण भक्ति के रूप में करते हैं। बुधवार और शनिवार को अपने दैनिक और व्यापार संबंधी कार्यों के लिए अवकाश रखते हैं। चिकित्सालय का एक महीने का खर्च लगभग बीस से बाइस हजार तक हो जाता है। आज पुरे मेरठ में ओमप्रकाश और बेटे राकेश के मार्ग दर्शन में कई और भी सेवा चिकित्सालय चलते हंै। ओम प्रकाश जी और उनके बेटे राकेश जी पुरे समाज के लिए एक आदर्श है दोनों एक स्वर में कहते अगर मन में सेवा करने का संकल्प हो तो कितनी भी विपरीत परिस्थितिया हो ईश्वर हमेशा साथ देता है और रास्ते अपने आप ही बनते चले जाते है।

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