शहीदों के परिवार के लिये समर्पित एक संत

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देश की रक्षा के लिये शहीद हुये सैनिकों के परिवारों की पीड़ा सहज कल्पनीय है। सरकार शहीद परिवारों को सहायता और सुविधायें देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेती है। समाज भी कुछ दिनों में उनकी शहादत भुला देता है लेकिन अपनों को खोने का दर्द तो ऐसा नही जो कुछ महीनों और साल में परिजन भूल जायें। शहीद परिवारों की यह पीड़ा हनुमान मदिंर बद्रीनाथ के संत बालक योगेश्वर दास के दिल में इतनी गहराई से बैठी कि वह सब कुछ भूल शहीद परिवारों को समर्पित हो गये।

शहीदों के परिवारों की यह पीड़ा हनुमान मंदिर बद्रीनाथ के संत बालक योगेश्वर दास के दिल में इतनी गहराई से बैठी कि वह सब कुछ भूल शहीद परिवारों को समर्पित हो गये।

संत बालक योगेश्वर दास पिछले 15 वर्षो से शहीद परिवारों को आपस में जोड़ कर उनके दुखों को कम करने में लगे हैं। वह कहते हैं कि ‘मेरी कर्मभूमि जम्मू है। कारगिल युद्ध के बाद मेरी मुलाकात शहीद अजय जसरोटिया की मां से हुई। उनके दुख दर्द तो थे ही लेकिन सरकार और समाज से मिल रही उपेक्षा और तिरस्कार ने उनके दुख को बहुत बड़ा कर दिया। सिलसिला आगे बढ़ा तो कई परिवार मिले, सब के दुख अपार थे। सरकार पेशंन, अनुग्रह राशि आदि देकर उन्हें भूल गयी। समाजसेवियों की भी उनमें कोई रुचि नहीं रही। धन की सहायता से जीवन तो चल सकता है लेकिन पति, पुत्र या फिर भाई खोने का दर्द भूलाना आसान न था।

समझ में नहीं आया कि क्या करें? फिर ऐसे कुछ परिवारों को आपस में जोड़ा क्योंकि अपना दुख सबको बड़ा लगता था लेकिन जब वह आपस में बातचीत करते तो उन्हें लगा कि इनका दुख हमसे बड़ा है।’ शहीद परिवारो से जुड़ने पर उनकी पहली वेदना क्या थी, के सवाल पर उन्होंने कहा ‘शहीद परिवार से जुड़ने के बाद पता चला कि कारगिल शहीदों के परिवार की इच्छा कारगिल और द्रास जैसे स्थानों को देखने की थी, वह उन दुर्गम स्थानों को देखना चाहते थे जहां देश की रक्षा करते हुये उनके अपने शहीद हुये थे। कई परिवारों ने तत्कालीन सरकार से अनुरोध भी किया लेकिन उनकी नही सुनी गयी थी, वर्ष 2007 में मैने एक पूरा प्लेन बुक किया लेकिन वह भी छोटा पड़ गया तो बचे हुये परिवार को सड़क मार्ग से द्रास तक ले गया।’ द्रास में ही शहीदों के लिये विशाल विष्णु महायज्ञ किया जिसमें सारे शहीद परिवारों ने आहुति डाली। शहीद अजय जसरोटिया की पत्नी बीना जसरोटिया कहती है कि ‘वहां जाकर हमें पता चला कि लड़ाई कितनी कठिन थी, हम तो सोच के सिहर गये, कैसे हमारे बच्चे दुश्मनों से मोर्चा लेने नीचे से ऊपर पहाड़ी पर गये होगें।’

शहीद परिवारों का इस संत से जुड़ने का सिलसिला 2003 से जो शुरू हुआ वह आज हजार परिवार का आंकड़ा छू रहा है। आखिर क्या है कि लोग इस संत के कुनबे से जुड़ते चले जा रहें हैं? इस प्रश्न के जवाब में शहीद पुलिस उपाधीक्षक प्रवीण शर्मा की पत्नी अनुराधा शर्मा कहती हैं कि ‘जब हम महराज जी के पास आते हैं तो लगता है जैसे हम अपने पिता के पास जा रहें हैं क्योंकि महराज जी के कारण हमें बहुत कुछ मिला जिसे हम पैसे से नही पाते।’ शहीद दलेर सिंह भाऊ की पत्नी शारदा भाऊ कहती है कि ‘महराज जी ने शहीद परिवारों को जोड़ कर हमें नया जीवन दिया है क्योंकि सरकार तो सैनिको के बलिदान को पैसे से तौलती है। उसे परिवार की भावनाओं का ख्याल नहीं है। शहीद घनश्याम की पत्नी कंचन बाला कहती हैं कि ‘महराज जी हर वर्ष जम्मू में शहीद परिवारों के लिये यज्ञ करतें हैं। हम यहां कुंभ मेला तक पहुंच सके हैं इसका श्रेय भी महाराज जी को ही जाता है। क्योंकि माहाराज जी ने यहां आने वाले शहीद परिवारों के रहने खाने का पूरा का खर्च स्वयं उठाया है।’
महाराज जी ने प्रयागराज कुंभ में शहीद परिवारों के लिए शत कुंडीय अति विष्णु महायज्ञ भी कराया है। प्रयागराज में सम्पन्न यह 34 वां अति विष्णु महा यज्ञ था। इसके पूर्व जम्मू तवी,उधमपुर, द्रास,अखनूर, कठुआ, हरिद्वार, प्रयागराज, नासिक, उज्जैन, जैसे स्थानों पर यज्ञ किये गये हैं। जम्मू में हर वर्ष नवम्बर में यह यज्ञ होतें है। सबसे खास बात यह है कि सभी यज्ञ शहीदों के परिवारों के लिये किये गये और इन परिवारों से कोई भी धनराशि किसी भी रूप में नहीं ली जाती है।

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