महिलाओं को आजादी खोने का भय

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फगानिस्तान में अमन बहाली के लिए, कतर के दोहा में अमेरिका और तालिबान के बीच शांति वार्ता जारी है। इस बातचीत में अभी तक औपचारिक रूपसे अफगानिस्तान कि सरकार शामिल नहीं है, वहीं कुछ महिला उद्यमियों और महिला संगठनों ने, बातचीत में महिलाओं को शामिल नहीं करने पर सवाल उठाए हैं। महिलाओं का एक बड़ा समूह, शासन-प्रशासन, शिक्षा -व्यापार, तकनीकी के फील्ड में अच्छा कार्य कर रहा है और देश के पुनर्निर्माण में योगदान कर रहा है। यह समूह अमेरिका-तालिबान के बीच समझौते की खबरों के बीच भयभीत भी हैं। उनकी शंका निर्मूल नहीं है। वर्ष 1996 से 2001 के तालिबान शासन में महिलाओं की राजनीतिक-आर्थिक हसरतें दबा दी गईं थीं। आधुनिक पोशाक से लेकर मनोरंजन तक पर पाबंदी थी। फिर 2005 में महिलाओं की शिक्षा पर पाबंदी लगा दी गई थी। उनदिनों कुछ लोग भूमिगत रहकर, लड़कियों को घरों-मुहल्लों में शिक्षित कर रहे थे।

एक तरफ पूरी दुनिया में महिलाओं के अधिकारों को लेकर सकारात्मक बदलाव हो रहे हैं। ठीक इसी समय अफगानी महिलाओं को अपने अधिकार और आजादी को खो देने का भय सता रहा है।

अफगानिस्तान में आधुनिक शिक्षा की शुरुआत 1903 में काबुल में हबीबिया स्कूल की स्थापना से हुई। मजारे शरीफ में रजिया सुल्तान स्कूल ने कई दशक से लड़कियों की शिक्षा में खास मुकाम बनाया है। सामाजिक दबाव के बावजूद स्कूलों में, लड़कों के मुकाबले , लड़कियों का नामांकन 45 प्रतिशत तक हो गया है। 1960-70 के दशक में भी उच्च शिक्षा में महिलाओं का दखल रहा। कई हजार लड़कियां देश -विदेश में विश्वविद्यालय की शिक्षा ले रही हैं। पिछले 15-16 वर्षों में, महिलाओं की सामाजिक और राजनीतिक भागीदारी बढ़ी है। आज महिलाएं, डॉक्टर -नर्स -प्रोफेसर, न्यूज रीडर, सांसद और सरकार के अहम पदों पर कार्य कर रही हैं। अफगानिस्तान विमेंस नेटवर्क जैसे फोरम महिलाओं में जागरूकता और उनके अधिकारों के लिए काम कर रहे हैं।

बड़ी संख्या में महिलाएं नर्सिंग, आईटी की ट्रेनिंग ले रही हैं। कपड़े-कसीदाकारी, ब्यूटी पार्लर आदि के व्यापार को संचालित कर रही हैं। अफगानिस्तान में लोकप्रिय चैनल जन टीवी में सभी कर्मचारी महिलाएं हैं। इससे अलग तालिबान के सत्ता में आने से पूर्व ,पहले जहां अफगानिस्तान के काबुल, बामियान जैसे शहरों में महिलाएं कार चलाती दिखती थीं, अब वह ऐसा जोखिम नहीं लेती हैं। कुछ अलग तस्वीर भी है। लगभग 40 प्रतिशत लड़कियों की शादी आज भी 10 से 13 साल के बीच में हो जाती है। शादीशुदा लड़कियों को स्कूल जाने की मनाही है। पाठ्य-पुस्तकों में भी महिलाओं की परम्परागत भूमिका पर ही अधिक बल दिया गया है। आज जरूर सरकार और समाज में इन सब पूर्व धारणाओं को बदलने की बात होती है।

उधर तालिबान के असर वाले इलाकों में, लड़कियों के स्कूल जाने पर पाबन्दी, स्कूलों को बंद करने की धमकी और एनजीओ में काम करने वाली महिलाओं को घर बैठने की हिदायत आम बात है। ऐसे में कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की ओर से स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय बनवाने, उनको नियमित स्कूल लाने, शारीरिक साफ सफाई की ट्रेनिंग और सेनेट्री पैड उपलब्ध कराने जैसे काम पर तालिबान का रुख क्या होगा? लड़कियों की बॉक्सिंग-साइकिलिंग की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में चल रही भागीदारी क्या रोक दी जाएगी? लड़कियों के साईकिल चलाने पर दंड दिया जाएगा? गीत -संगीत में भविष्य संवारने वाली लड़कियों का क्या होगा? अफगानिस्तान की महिलाएं चाहती हैं कि उनके इन वाजिब सवालों को शांतिवार्ता में जगह मिले। पिछले वर्ष काबुल की एक पढ़ी-लिखी महिला से पूछने पर उसने मुझसे कहा था – ‘जितनी भी समस्याएं आप सोच सकते हैं, अफगानिस्तान की महिलाएं उन सबका सामना करती हैं।’

अमेरिकी सेना की अफगानिस्तान से वापसी जैसे अहम मुद्दों पर अमेरिका और तालिबान के बीच व्यापक सहमति बन चुकी है। वर्ष 2018 में देश में हिंसा चरम पर रही है। सेना -पुलिस के साथ ही हजारों की संख्या में आम लोग भी मारे गए। इनमे बच्चे और महिलाएं भी शामिल थीं। शांतिवार्ता के क्रम में महिलाओं के बारे में तालिबान अपना रुख बदलता है या नहीं, इस पर नजरें टिकी हुई हैं।

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