अखिलेश की चुनौती शिवपाल!

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पा-बसपा गठबंधन तो बन गया। दोनों दल 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा भी कर चुके हैं। लेकिन गठबंधन की गांठें अभी तक सुलझ नहीं पायी हैं। उच्च नेतृत्व की बात करें तो समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव और बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती तो काफी खुश दिख रहे हैं। कारण, 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधान सभा चुनाव के बाद दोनों दलों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। लोकसभा में मायावती की बसपा का खाता भी नहीं खुला था। सपा को पांच सीटें, वह भी मुलायम परिवार के सदस्यों को मिली थीं। विधानसभा चुनाव में सपा को 47 तो बसपा को 19 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। हां, दोनों को वोट प्रतिशत मिला दें तो 42 फीसद से अधिक रहा। जबकि अकेले भाजपा का वोट 42 फीसद से अधिक रहा। इसी अंकगणित को ध्यान में रखकर दोनों ने समझौता किया है।

आजमगढ़ से अखिलेश!
समाजवादी पार्टी के सबसे मजबूत गढ़ माने-जाने वाले आजमगढ़ से पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के लोकसभा चुनाव लड़ने की संभावना है। वर्तमान सांसद मुलायम सिंह का आजमगढ़ से गहरा वास्ता रहा है। मुलायम ने सभी संभावनाओं को दरकिनार करते हुए, आजमगढ़ को मण्डल का दर्जा दिया। आजमगढ़ को नई पहचान देने का प्रयास किया। वहां के लोगों से आत्मीय रिश्ते बनाये। अखिलेश यादव कन्नौज में कमजोर महसूस कर रहे हैं। लिहाजा आजमगढ़ से लड़ना चाहते हैं।

सवाल यह है कि उन दोनों चुनावों में बसपा और सपा में बिखराव नहीं हुआ था। अब बसपा में स्वामी प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक, नसीमुद्दीन जैसे कद्दावर नेता नहीं हैं। उधर सपा से मुलायम सिंह का मोहभंग हो चुका है। वह उपेक्षित हैं। शिवपाल जैसे खांटी सपाई ने अपना अलग दल बना लिया है। माना जा सकता है कि दोनों के जनाधार में दरकन आ गई है। खासकर इस गठबंधन के सामने शिवपाल के रूप में बड़ी चुनौती खड़ी है।
कांग्रेस की परंपरागत सीटों पर रायबरेली और अमेठी की पिछले लोकसभा चुनाव में भी सपा-बसपा ने प्रत्याशी नहीं उतारा था। लेकिन 78 सीटें ऐसी हैं जिन पर तीन-चार चुनावों से सपा-बसपा के प्रत्याशी लड़ते रहे हैं। माना जा सकता है कि इस समझौते से कम से कम 78 कद्दावर सपा-बसपा नेता चुनाव मौदान से सीधे बाहर हो सकते हैं। माना जा सकता है कि दोनों में विद्रोह के हालात हैं।

फिरोजाबाद से शिवपाल!
प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव फिरोजाबाद से चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। उन्होंने सपा के ‘थिंक-टैंक’ माने जाने वाले प्रोफेसर रामगोपाल यादव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने वहां रैली करके अपना इरादा स्पष्ट कर दिया। फिरोजाबाद सीट से वर्तमान में अक्षय प्रताप यादव सांसद हैं। अक्षय प्रोफेसर रामगोपाल यादव के पुत्र हैं। गत 2014 के लोक सभा चुनाव में प्रोफेसर रामगोपाल पर बूथ कैप्चरिंग करने का आरोप भी विपक्ष ने लगाया था। उस समय अखिलेश यादव की सरकार थी।

इसी विद्रोह का इंतजार शिवपाल यादव को है। सूत्रों की मानें तो शिवपाल यादव की नजर सपा के उस मजबूत गढ़ पर जहां सपा की बजाय मायावती की पार्टी को सीटें मिलेंगी। वहां शिवपाल कद्दावर उम्मीदवार खड़ा कर अपने को मजबूत बनाने की जुगत में लगे हैं। गठबंधन को स्वाभाविक नहीं माना जा रहा है। इसके पर्याप्त कारण भी हैं। बसपा का मूल काडर एवं सपा के मूल काडर में हमेशा टकराव होता रहा है। मुस्लिम समाज बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती को भारतीय जनता पार्टी का करीबी मानता है। इसके पर्याप्त कारण भी हैं। पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के पहले वह तीन बार भाजपा के ही सहयोग से मुख्यमंत्री बनी हैं। कई वरिष्ठ मुस्लिम धर्म गुरुओं का मानना है कि कांग्रेस के बिना राष्ट्रीय स्तर पर कोई विकल्प सफल नहीं हो सकता। माया पर पत्थर घोटाले में ईडी का छापा अखिलेश सरकार द्वारा दिये गये शिकायत का परिणाम था। सपा के जमीनी कार्यकर्ता हतोत्साहित हैं। उनसे बातचीत करने पर ऐसा लगता है। इस गठबंधन से उत्साहित सपा कार्यकर्ताओं को लखनऊ के ताज होटल में 12 जनवरी को हुए प्रेस कांफ्रेस ने भी हतोत्साहित किया। अल्पसंख्यक नेताओं को मलाल था कि अखिलेश यादव ने अपने संबोधन में एक बार भी अल्पसंख्यकों का जिक्र नहीं किया। बसपा प्रमुख मायावती और उनके करीबी सतीश चन्द्र मिश्रा ही इसमें छाये रहे।

सपा-बसपा गठजोड़ बेमेल – डॉ. सीपी राय
शिवपाल के नेतृत्व वाली प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के मुख्य प्रवक्ता डा. सीपी राय कहते हैं कि सपा-बसपा का समझौता अस्भाविक है। सपा के शासन काल में बसपा सरकार की जांच होती है। बसपा की सरकार में सपाइयों पर मुकदमे दर्ज हुए हैं। मुलायम सिंह एवं सपा के अन्य वरिष्ठ नेताओं पर आज भी स्टेट गेस्ट हाउस काण्ड को लेकर मुकदमा दर्ज है। क्या अखिलेश यादव ने मायावती से समझौते के समय यह शपथपत्र लिया है कि मुलायम पर गेस्ट हाउस काण्ड में दर्ज मुकदमा वापस ले लिया जाये। मायावती दिल्ली में रहती हैं। अखिलेश यादव लखनऊ से बाहर निकलते नहीं हैं। यह समझौता पूरी तरह बेमेल है। प्रसपा अध्यक्ष शिवपाल यादव सहारनपुर से लेकर बलिया तक लगातार दौरे कर रहे हैं। कार्यकर्ता उनके साथ हैं। विकल्प केवल शिवपाल हैं। यदि हमारा समझौता कांग्रेस के साथ हो जाता है तो हम सभी गठबन्धनों पर भारी पड़ेंगे।

सपा कार्यकर्ताओं और अखिलेश यादव के बीच संवाद की भारी कमी है। कार्यकर्ताओं को ऐसा लगता है कि उसके नेता कार्यकर्ता से सम्पर्क बनाने के इच्छुक नहीं हंै। सपा संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव मिलनसार रहे हैं। जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के सीधे सम्पर्क में रहते हैं। वहीं वर्तमान नेतृत्व केवल दरबारियों से घिरा हुआ है। मुलायम सिंह के पद चिन्हों पर चलने का प्रयास प्रगतिशील समाजवादी पार्टी अध्यक्ष शिवपाल यादव कर रहे हैं। सभी पुराने कार्यकर्ताओं से संवाद स्थापित करते रहते हैं।
बसपा ने 38 सीटों पर अपने प्रभारी भी घोषित कर दिये हैं। वे प्रभारी अपने अपने क्षेत्रों में चुनाव की तैयारी में लगे हुए हैं। सपा में प्रत्याशियों को लेकर अनिश्चितता है। इससे ज्यादातर योग्य प्रत्याशी क्षेत्र में संपर्क नहीं कर पा रहे हैं। वे केवल लखनऊ के ही चक्कर काट रहे हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता इस बात को संकोच के साथ स्वीकार करते हैं कि हम तैयारी में पिछड़े हुए हैं।
प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल यादव कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद कर पूरे प्रदेश का दौरा कर रहे हैं। पार्टी और कार्यकर्ताओं के हर छोटे बड़े समारोह में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। अपने बड़े भाई मुलायम सिंह यादव की तर्ज पर शिवपाल की यादव वोटों पर सीधी पकड़ है। कानपुर मण्डल और आगरा मण्डल की सभी लोकसभा सीटों पर शिवपाल की सीधी पकड़ है। इसके अतिरिक्त पूर्वांचल में भी सपा के सभी असंतुष्ट नेता उनके संपर्क में हैं।
वर्तमान समय में समझौते की दिख रही तस्वीर सपाइयों में संम्रम की स्ेिथति पैदा करने वाली है। सपा द्वारा लोकदल को मुजμफरनगर, बागपत और हाथरस सीटें इस गठबंधन द्वारा दी गई हैं। यद्यपि लोकदल द्वारा एक सीट और मांगी जा रही है। निषाद पार्टी को गोरखपुर संसदीय सीट दी जायेगी। इस प्रकार सपा मात्र 34 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी। प्रदेश की शेष 46 सीटों के कार्यकर्ता निराश और उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। वहां बगावत के आसार हैं। सगे चाचा शिवपाल यादव के द्वारा पार्टी बना लेने के बाद ‘सैफई परिवार’ में विभाजन की रेखा खिंच गई है। मुलायम सिंह की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता के पुत्र प्रतीक यादव एवं पुत्र वधु अर्पणा यादव प्राय: शिवपाल यादव के कार्यक्रमों में उपस्थिति दर्ज कराकर साथ रहने का संदेश भी देती रही हैं। सपा के वरिष्ठ नेता इस बात से असंतुष्ट हंै कि विधान सभा चुनाव के लगभग दो वर्ष बीतने के बाद भी आज-तक चुनाव के हार जीत की समीक्षा नहीं हुई। धरती पुत्र के नाम से मशहूर मुलायम सिंह यादव को जिस तरह उनके पुत्र अखिलेश यादव ने ‘धोबिया पाट’ लगा कर संगठन पर कब्जा किया, मुलायम सिंह की इच्छा के विपरीत मायावती से समझौता किया। शिवपाल यादव एवं पार्टी के पुराने सदस्यों को निष्कासित और उपेक्षित किया। मुलायम सिंह सपा के सपा सृजनकर्ता रहे हैं। आज भी अधिसंख्य पुराने कार्यकर्ता उनके सम्पर्क में हैं। इसलिए मुलायम की उपेक्षा, शिवपाल का निष्कासन का असर निश्चित रूप से आगामी चुनाव में पड़ेगा। यद्यपि इन सारे आरोपों को सपा के नेता खारिज करते हैं।

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