पारदर्शी हो न्यायपालिका

0
13

र्वोच्च न्यायालय अभी भी देश में न्याय चाहने वालों के लिए उम्मीद की एक किरण है। देश की इन आशाओं को पूरा करने में न्यायपालिका कितना सफल होगी, यह किसी और पर नहीं बल्कि उसी पर निर्भर है। न्यायपालिका के बारे में देश की एक बड़ी आबादी जिसमें पिछड़ी जातियां, अनुसूचित, व जनजातियों के लोग शाामिल हैं, इस आधार पर अविश्वास प्रकट करते हैं कि न्यायपालिका में इन तबकों की हिस्सेदारी नगण्य है। कॉलेजियम सिस्टम के माध्यम से पिछले लगभग 30 वर्षो से सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट के जजों के चयन का अंतिम अधिकार न्यायपालिका ने अपने हाथ में ही ले रखा है। इसलिए भी इन वर्गों के मन में एक प्रकार का संशय व्याप्त है और वे न्यायपालिका को उच्च जातियों के हितों के रक्षक के रूप में देखते हैं।

अमूमन जजों या बड़े वकीलों के बेटे या परिजन या उनके जूनियर जज बन रहे हैं। इसलिए इन आरोपों का प्रत्यक्ष आधार न होते हुए भी आरोप लोगों को विश्वसनीय लगते हैं।

ठीक है कि अगर कोई न्यायाधीश किसी सुनवाई या मामले में पहले से सम्बन्धित रहा है, तो सुनवाई से अलग हो जाय। यहीं प्रश्न है कि क्या मुख्य न्यायाधीश किसी पीठ का गठन करते समय सम्बन्धित न्यायाधीशों से कोई मशवरा करते हैं। पिछले दिनों तो सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायाधीशों ने पत्रकार सम्मेलन बुलाकर सुप्रीम कोर्ट के भीतर विचार विमर्श की कमी पर ऊंगली उठाई थी। कुछ ने बाद में भी न्यायपालिका में परस्पर संवादहीनता की कमी का जिक्र किया है। कॉलेजियम सिस्टम से न्यायाधीशों की नियुक्ति के पक्ष में होते हुए भी वे कॉलेजियम के गठन और उसमें अपनाई जा रही प्रक्रिया से सहमत नहीं हैं। फिर भी जो व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के योग्य पात्र माना गया, क्या वह अपनी ईमानदारी व निष्पक्षता के प्रति स्वत: आश्वस्त नहीं है।

अभी हाल में रामजन्म भूमि पर देश को उम्मीद थी कि अब सुप्रीम कोर्ट निर्णय देकर पिछले लगभग 21 वर्षो से चल रहे गम्भीर विवाद और लगभग 60 वर्षो से चल रहे मुकदमे का फैसला कर देगा। उम्मीद इसलिए भी बढ़ी थी कि कुछ दिनों पूर्व ही सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद को केवल सम्पति का विवाद माना था तथा पीठ गठित कर लगातार सुनवाई की घोषणा की थी। रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद ने पिछले 30 वर्षो में न केवल भारतीय राजनीति को दूषित और साम्प्रदायिकता आधारित बना दिया है, बल्कि आज भी देश में यह तनाव और साम्प्रदायिकता का एक बड़ा कारण है। चूंकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को मन या बेमन से स्वीकार करने को सभी पक्ष बाध्य हैं, अत: न्यायपालिका के निर्णय का सभी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे। परन्तु पीठ के बैठते ही एक-एक कर कई न्यायाधीशों ने अपने आपको किसी न किसी आधार पर पीठ से अलग कर लिया और परिणामस्वरूप फिर मामला टल गया। अब यह देश के आगामी चुनाव में मुद्दे के रूप में सामने है।

जजों की नियुक्ति पर परिवारवाद और चेम्बरवाद के आरोप भी लगते रहे हंै जिन्हें स्वत: न्यायपालिका के सदस्यो के द्वारा ‘‘अंकल सिंड्रोम’’ कहा गया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के लिए सेवानिवृत्ति के बाद पुन: नियुक्ति के कई वैधानिक रास्ते बने हंै। अब तो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्ति हुए न्यायाधीश राज्यपाल बनने लगे हैं। इन राजनीतिक नियुक्तियों से न्यायपालिका की विश्वसनीयता कठघरे में है। इसे कायम रखने के लिए ‘अंकल सिन्ड्रोम’ से मुक्ति जरूरी है। फिर पीठ के गठन के पहले ही संबंधित न्यायाधीश से उसके लगाव आदि की जानकारी लेना, बिना आधार याचिका दायर करने वाले वकीलों को भी फटकार अथवा जुर्माना लगाने में रियायत नहीं देने आदि पर भी विचार आवश्यक है। चतुर वकील अपने मामले को अनुकूल बेंच में ले जाना चाहते हैं। इस प्रक्रिया से दूषित आदेश जन्म लेते हैं। बेहतर चयन और संवाद के तरीकों पर भी न्यायपालिका को विचार करना चाहिये। सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की पुन: नियुक्ति पर रोक लगाना चाहिए। लंबित प्रकरणों के निपटान में योगदान के लिए उन्हें अलग से वेतन व सुविधायें दी जा सकती हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here