नितिन के खिलाफ नाना

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पिछले लोकसभा चुनाव में नाना पटोले ने भाजपा प्रत्याशी के रूप में भंडारा गोंदिया क्षेत्र से राकांपा के दिग्गज नेता तथा राकांपा सुप्रीमो शरद पवार के बेहद करीबी प्रफुल्ल पटेल उर्फ भाई जी को पराजित किया था। इस बार वे भाजपा के दिग्गज नेता नितिन गडकरी के खिलाफ लोकसभा चुनावी जंग में उतरे हैं। कुछ राजनीतिक पंडित नाना को उतारने को कांग्रेस की मजबूरी बता रहे हैं, तो कुछ इसे नाना पटोले की हिम्मत बता रहे हैं।

नितिन गडकरी के खिलाफ चुनावी जंग में किसे उतारा जाए, इसेलेकर कांग्रेस में भरपूर खींचतान चली। जिस नागपुर को आज भाजपा का गढ़ माना जाता है, वहां कभी हालत ऐसे भी रहे कि कांग्रेस के मुकाबले किसे उतारा जाए, उसके लिए भाजपा नेतृत्व माथापच्ची करता था। आज हालत यह है कि नाना पटोले जैसे अति महत्वाकांक्षी नेता को गडकरी के मुकाबले खड़ा कर कांग्रेस ने पासा खेल दिया है। अब चाहे जीत हो या हार, कोई फर्क नहीं पड़ता।

विरोध में खैरलांजी का मुद्दा

बहुचर्चित खैरलांजी प्रकरण में नाना पटोले पर दलित विरोधी नीति अपनाने का आरोप लगाते हुए उनकी उम्मीदवारी रद्द करने की मांग की गई। इस बारे में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को ई मेल के माध्यम से भेजा गया पत्र भी सामने आया है। 13 वर्ष पहले भंडारा जिले के खैरलांजी में चार दलितों की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस हत्याकांड के आरोपियों को बचाने का आरोप नाना पटोले पर लगाया जा रहा है।

खबर है कि नागपुर संसदीय क्षेत्र से चार बार और कुल सात बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके विलास मुक्तेवार ने भी नितिन गडकरी के खिलाफ चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। फिर अविनाथ पांडे ने भी मैदान छोड़ दिया। पांडे के इंकार के बाद नागपुर कांग्रेस अध्यक्ष विलास ठाकरे और कांग्रेस प्रदेश सचिव प्रफुल्ल गुडधे के नाम सामने आए, लेकिन इनके नाम पर सहमति नहीं बन पायी। इसी दौर में नाना पटोले तथा आशीष देशमुख के नाम भी सामने आए। ये दोनों नेता कांग्रेस से भाजपा में गए थे लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नाराज होकर फिर से कांग्रेस का दामन थाम लिया। प्रफुल्ल पटेल जैसे नेता को उनके गढ़ में हराने वाले नाना पटोले के नाम पर विचार करने के संकेत मिले थे।

कांग्रेस का गढ़ रह चुके नागपुर में भाजपा की विजय का शुभारंभ करने वाले बनवारी लाल पुरोहित ने भी काफी समय कांग्रेस में ही व्यतीत किया है। सन 1996 भाजपा में शामिल हुए बनवारी लाल पुरोहित ने यहां भाजपा का परचम लहराया था। लेकिन अल्प काल में ही उन्होंने भाजपा को राम राम कह दिया। बाद में वे फिर भाजपा में आये और इन दिनों राज्यपाल हैं। पुरोहित के भाजपा छोड़ने के बाद नागपुर लोकसभा सीट एक बार फिर कांग्रेस के पास आ गई थी। 1998 से 2009 तक लगातार भाजपा को पराजय का मुंह दिखाने वाले विलास मुक्तेमवार के बाद कांग्रेस के पास ऐसा कोई दिग्गज नेता नहीं रहा जो भाजपा को कड़ी चुनौती दे सके। विलास मुक्तेमवार की राजनीति में सक्रियता कम होने के कारण भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने नितिन गडकरी को नागपुर के भावी नेता के रूप में देखा जाने लगा। महाराष्ट्र के सार्वजनिक निर्माण कार्य मंत्री रहते गडकरी ने कहा था कि अब नागपुर का तेजगति से विकास होगा।

तब नागपुर में पहली बार सीमेंट की सड़कें बनीं। अंदरखाने गडकरी को देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में भी देखा जा रहा है। ऐसे में यह कहना ही पड़ेगा कि नाना में एक दिग्गज नेता के खिलाफ लड़ने का माद्दा है। विदर्भ के किसानों की समस्याओं पर ध्यान न देने के आरोप लगाते हुए कांग्रेस छोड़ने वाले नाना पटोले ने पिछले लोकसभा चुनाव में भंडारा गोंदिया लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से जीत दर्ज की। फिर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हर बात पर हामी भरना नाना को रास नहीं आया। अब नागपुर की बिग फाइट में गडकरी के मुकाबले नाना किस हद तक सफल हो पाते हैं, यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं होगा।

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