बांग्लादेशी नासूर

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ठकुछ समय पहले असम के पूर्व राज्यपाल अजय सिंह ने केंद्र सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया था कि हर दिन छह हजार बांग्लादेशी भारत में घुसपैठ करते हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछली जनगणना में बांग्लादेश से एक करोड़ लोग गायब हैं।आखिर बांग्लादेश से गायब ये लोग कहां गए?

गायक, गीतकार एवं हाल ही में भारत रत्न से सम्मानित भूपेन हजारिका ने दशकों पहले एक गीत लिखा था। जिसका भावार्थ है, ‘असमी अपने और अपनी भूमि को बचायें, अन्यथा अपनी भूमि (असम) में ही वे बेगाने हो जाएंगे।’ यह गीत उन्होंने असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों की लगातार बढ़ती संख्या से चिंतित होकर लिखा था। वे रहते बेशक मुंबई में थे लेकिन उनकी जन्मभूमि असम थी। इसलिए उनका दिल असम के लिए धड़कता था। वर्षों पहले लिखे उनके गीत आज भी आम असमिया समाज महसूस करता है। आज अवैध बांग्लादेशियों के कारण असम सहित देश के कई राज्यों की जनसांख्यिकीय स्थिति गड़बड़ाने लगी है। खासकर पूर्वोत्तर के राज्यों और जम्मू-कश्मीर की स्थिति भयावह रूप ले रही है।

बांग्लादेश से लगे पूर्वोत्तर राज्यों की सीमाओं पर पर्याप्त चौकसी नहीं है। बांग्लादेश से आने वाले घुसपैठिए असम, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और बिहार से लेकर राजधानी दिल्ली सहित कई अन्य प्रमुख शहरों तक पहुंच गए हैं। राजधानी के हालात को इससे ही समझा जा सकता है कि दिल्ली पुलिस को हर थाने में अलग बांग्लादेशी सेल बनाना पड़ा। दिल्ली पुलिस हर साल अवैध बांग्लादेशियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजती है। किसी साल संख्या ज्यादा होती है तो कभी कम। एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) में कई आपराधिक गतिविधियों में अवैध बांग्लादेशियों की संलिप्तता पाई गई है। वे चोरी, झपटमारी से लेकर हत्या, बलात्कार जैसी घटनाओं में पकड़े गए हैं। इन सबके बावजूद दिल्ली और उसके आस-पास बांग्लादेशियों की कई कॉलोनियां बसाई गई हैं। पहले कांग्रेस और अब आम आदमी पार्टी इनका इस्तेमाल वोट बैंक के लिए करती है। सत्ता की कुर्सी पाने के लिए इन राजनीतिक दलों ने देश की सुरक्षा को भी खतरे में डाल दिया है।
पूरे देश में बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या तीन करोड़ को पार कर चुकी है। भारत-नेपाल के बीच खुली सीमा है लेकिन बांग्लादेश सीमा से बांग्लादेशियों की बे-रोकटोक घुसपैठ हो रही है। परिणामस्वरूप सीमावर्ती जिले मुस्लिम बहुल हो गए हैं। सीमावर्ती राज्यों का जनसंख्या संतुलन बिगड़ गया है। कुछ समय पहले असम के पूर्व राज्यपाल अजय सिंह ने केंद्र सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी। उन्होंने अपने रिपोर्ट में स्पष्ट किया था कि हर दिन छह हजार बांग्लादेशी देश में घुसपैठ करते हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछली जनगणना में बांग्लादेश से एक करोड़ लोग गायब हैं।
आखिर बांग्लादेश से गायब ये लोग कहां गए? इसका सीधा सा अर्थ है कि ये सभी भारत में अवैध रूप से घुसपैठ कर गये हैं। कई राज्यों की पुलिस ने भी अपनी-अपनी रिपोर्टों में माना है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों के चोरी, लूटपाट, डकैती, हथियार, जाली नोट, पशु तस्करी और नशीली पदार्थों जैसी आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने के कारण उनके राज्यों में कानून व्यवस्था पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है। इन आपराधिक गतिविधियों के अलावा ये घुसपैठिये आतंकी संगठनों एवं पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी (आईएसआई) की गतिविधियों के लिए भी काम कर रहे हैं। यह देश की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर रही है।

घुसपैठ के खिलाफ आक्रोश
बांग्लादेशी घुसपैठियों की सबसे बड़ी समस्या असम और पश्चिम बंगाल की है। इस कारण असम में इन घुसपैठियों को बाहर करने का बड़ा आंदोलन चला। इसमें वहां के आल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) ने सक्रिय भागीदारी की। घुसपैठियों को बाहर निकालने का आंदोलन सर्वप्रथम 1979 में असम गण परिषद और आॅल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने किया। इनका आंदोलन कई बार हिंसक भी हुआ। हिंसा में सैकड़ों लोगों की मौत हुई। हिंसा को रोकने के लिए 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी, असम गण परिषद और आल असम स्टूडेंट्स यूनियन के नेताओं की मुलाकात के बाद केंद्र सरकार और आंदोलनकारियों के बीच समझौता हुआ। तय हुआ कि 1951-71 के बीच बांग्लादेश से आए घुसपैठियों को नागरिकता दी जाएगी। 1971 के बाद आए लोगों को वापस भेजा जाएगा। लेकिन अंतिम समय में सरकार और आंदोलनकारियों में बात नहीं बनी। समझौता फेल हो गया। समझौता फेल होने के बाद असम में सामाजिक और राजनीतिक तनाव बढ़ता चला गया। साल 2005 में केंद्र और राज्य सरकार ने एनआरसी की सूची अपडेट करने के लिए समझौता किया। लेकिन दोनों स्थानों पर कांग्रेस की सरकार होने के कारण सूची अपडेट की रμतार बहुत धीमी थी। इस कारण मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। कांग्रेस जहां सुस्त थी। वहीं, भाजपा इस मुद्दे पर सक्रिय थी। 2014 में भाजपा ने इसे चुनावी मुद्दा भी बनाया। वर्तमान मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल उसकी अगुवाई कर रहे थे। नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान बांग्लादेशियों को वापस भेजने की बातें कहीं। 2015 में कोर्ट ने एनआरसी सूची अपडेट करने का आदेश दिया। साल 2016 के असम विधानसभा चुनाव के बाद राज्य में भाजपा की पहली बार बहुमत की सरकार बनी। सरकार बनने के बाद अवैध बांग्लादेशियों की पहचान करने के लिए एनआरसी की प्रक्रिया तेज की गई। अभी तक एनआरसी की दो सूची सार्वजनिक हो चुकी है। इसमें वैध नागरिकता के लिए 3 करोड़ 29 लाख 91 हजार 384 लोगों ने एनआरसी में आवेदन किया था, जिसमें से 40 लाख 7 हजार 707 लोग अवैध करार दे दिए गए हैं। दूसरी सूची आने के बाद बाहर रह गए लोगों को दो महीने का समय दिया गया है। इस दौरान उन्हें 25 मार्च 1971 से पहले के भारतीय नागरिकता का वैध प्रमाण पत्र जमा कराना होगा। पांच फरवरी 2019 को मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि एनआरसी प्रक्रिया पूरी करने की 31 जुलाई की समय सीमा नहीं बढ़ेगी।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने ऐसी आशंकाओं के बाद कुछ साल पहले उत्तर पूर्व के राज्य असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम से लगी बांग्लादेश की सीमा का अध्ययन शुरू किया था। उनके अध्ययन में सीमा की वास्तविक स्थिति, सुरक्षा प्रबंध की स्थिति, सीमा पर घुसपैठिये की गतिविधियों, सीमांत गांवों और वहां के लोगों की वास्तविक स्थिति और घुसपैठियों के कारण वहां की जनसंख्या असंतुलन को शामिल किया गया था। अध्ययन के बाद तैयार रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सीमांत राज्यों में घुसपैठियों की वजह से स्थिति गंभीर हो गई है।
तब उक्त छात्र संगठन ने घुसपैठियों की पहचान और उनकी नागरिकता समाप्त करने के लिए एक स्वतंत्र टास्क फोर्स के गठन की मांग प्रधानमंत्री से की थी। असम में चल रहे एनआरसी में मार्च 1971 की समय अवधि तय की गई है। जबकि इस छात्र संगठन ने 1951 की भारतीय नागरिक पंजीयन के आधार पर बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान करने और उनका नाम मतदाता सूची से हटाने की मांग भी की थी। उनके रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम बंगाल के 52 विधानसभा क्षेत्रों में 80 लाख और बिहार के 35 विधानसभा क्षेत्रों में 20 लाख बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं।
गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने भी माना कि बांग्लादेशी घुसपैठिये भारत के लिए खतरनाक हैं। वे कहते हैं, ‘अवैध बांग्लादेशी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का हथियार भी बन सकते हैं। हिंदुस्तान में रह रहे इन बांग्लादेशी घुसपैठियों का देश विरोधी ताकतें या फिर उग्रवाद, इस्लामिक कट्टरपंथ या फिर सांप्रदायिक हिंसा में इस्तेमाल हो सकता है।’ संसद में एक सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि अवैध तौर पर भारत में बसे हुए बांग्लादेशियों के चोरी, सेंधमारी, तस्करी, मानव तस्करी और नशे की तस्करी में शामिल होने के मामले सामने आएं हैं।
अवैध बांग्लादेशियों की समस्या केवल पूर्वोतर के राज्यों में ही नहीं है। जम्मू-कश्मीर में भी यह भयावह रूप धारण करने लगा है। जम्मू और लद्दाख के कई क्षेत्रों में हजारों की संख्या में इन्हें बसा दिया गया है। इस प्रांत की मुस्लिमपरस्त पार्टियां हिन्दू बहुल इलाकों में इन्हें बसाया है। इससे चुनाव में उन्हें हिन्दू क्षेत्रों में राजनीतिक लाभ मिल सके। इनकी भयावहता को देखते हुए ही म्यांमार और बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ जम्मू के लोगों को आंदोलन करना पड़ा। जम्मू में लोगों ने जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुμती से मांग की कि इन शरणार्थियों को फौरन वापस उनके देश भेजा जाए। प्रदर्शनकारियों ने यह भी कहा कि बांग्लादेशी देश के लिए खतरा हैं। जम्मू-कश्मीर भाजपा ने इनसे जम्मू और देश को होने वाले खतरों को लेकर आगाह किया है। पार्टी ने कहा कि जम्मू में हिंदुओं की आबादी कम करने की साजिश चल रही है।

राज्य में बहुत तेजी से मुसलमानों की आबादी बढ़ रही है। इसमें अवैध रूप से आए बांग्लादेशियोंं की भूमिका है। एनआरसी की सूची फाइनल होने पर अवैध लोगों के सही एवं आधिकारिक आंकड़ें आएंगे। यदि अवैध बांग्लादेशियों को देश से बाहर नहीं किया गया तो असमिया समाज अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक हो जाएगा।

डॉ. हेमंत बिश्वा सरमा (मंत्री, असम)

बॉर्डर मैनेजमेंट टास्क फोर्स ने साल 2,000 में एक रिपोर्ट दी थी। इसके अनुसार 1 .5 करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठ कर चुके हैं। लगभग तीन लाख प्रतिवर्ष घुसपैठ कर रहे हैं। हाल में एक अनुमान अनुसार देश में 4 करोड़ घुसपैठिये मौजूद हैं। बताया यह भी जा रहा है कि हाल के दिनों में बंगाल के कई इलाकों में हिंदुओं के ऊपर होने वाले सांप्रदायिक हमलों में बांग्लादेशी घुसपैठियें शामिल रहे हैं। असम में घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए करीब 40 साल पहले बड़ा आंदोलन चला था। वह आज भी छोटे स्तर पर चल रहा है। 1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्रता-संघर्ष के समय वहां से भागकर भारत आए लोग यहीं बस गए। स्थानीय लोगों और घुसपैठियों के बीच हिंसक झड़पें भी हुईं।
हालांकि असम में इसको लेकर साठ के दशक में ही सवाल उठने लगे थे। तब असम के मुख्यमंत्री बीपी चलिहा ने पंडित जवाहर लाल नेहरू को चेताया भी था। उन्होंने पाकिस्तानी (तब बांग्लादेश पाकिस्तान का हिस्सा था) घुसपैठियों के खिलाफ प्रिवेंशन आॅफ इनफिल्टरेशन फ्रॉम पाकिस्तान एक्ट-1964, कानून लाने की घोषणा की। उनकी घोषणा के बाद कांग्रेस पार्टी के 20 मुस्लिम विधायकों ने सरकार से बाहर जाने की धमकी दे डाली। मुस्लिम विधायकों ने कानून को वापस लेने का दबाव बनाया।
नेहरू ने भी चलिहा को प्रस्ताव लेने की नसीहत दे डाली। उसके बाद चलिहा ने प्रस्तावित विधेयक को ठंडे बस्ते में डाल दिया। उस विधेयक में कई कड़े प्रावधान थे। उसके लागू होने के बाद उस समय ही भारत-पाक सीमा पर तारबंदी हो जाती। घुसपैठियों पर सख्ती से रोक लगती। इसका सीधा अर्थ है, करोड़ों की संख्या में आज रह रहे अवैध बांग्लादेशी समस्या नहीं होती। लेकिन कहा जाता है कि नेहरू की कश्मीर की भूल वाली नीति यहां पूर्वोत्तर में भी दोहराई गई।
कांग्रेस ने नेहरू की गलती को कभी सुधारने की कोशिश भी नहीं की। बल्कि उसे और आगे बढ़ाया। 10 अप्रैल, 1992 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया ने राज्य में 30 लाख अवैध बांग्लादेशी मुस्लिम होने की बात कही।
यह कहते ही कांग्रेसी नेता अब्दुल मुहिब मजुमदार के नेतृत्व में ‘मुस्लिम फोरम’ ने मुख्यमंत्री सैकिया को पांच मिनट के भीतर सरकार गिराने की धमकी दे दी। इस धमकी से कांग्रेस एक बार फिर भयभीत हो गई। पार्टी ने मामले को रफा-दफा कर दिया । राजीव गांधी को भी ‘असम समझौता’ करने का एक ऐतिहासिक मौका था। मगर वे भी पीछे हट गए। इंदिरा गांधी आईएमडीटी एक्ट बनाकर संदिग्ध विदेशी व्यक्ति को ट्रिब्यूनल के सामने पेश करने का प्रावधान कीं, लेकिन वह भी लागू नहीं हुआ। आश्चर्य तब हुआ जब 1971 को निर्धारक वर्ष मानकर 1951 से 1971 के बीच बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) से अवैध घुसपैठ कर आए लोगों को भारत का नागरिक मान लिया गया। वोट बैंक की राजनीति इतनी घातक हो गई है कि उसके सामने देश की सुरक्षा कोई मायने नहीं रखता। यही वजह है कि बांग्लादेशी घुसपैठ का आज तक समाधान नहीं हो पाया है। कई रिपोर्टों और आंकड़ों से साफ झलकता है कि हिंदू निचले असम से पलायन करने को मजबूर हैं। कमोबेश यही स्थिति राज्य के अन्य हिस्सों में भी जारी है। यहां तक कि बांग्लादेश सीमा से सटा भारत का पूर्वी हिस्सा 46 प्रतिशत मुस्लिम बहुलता वाला हो चुका है। समय-समय पर मीडिया और सरकार के जनसांख्यिकीय आंकड़े इस भयावहता को दर्शाते हंै। घुसपैठ से स्थानीय निवासियों में भारी बेचैनी है।
कहने को तो कांग्रेस की सरकारों ने घुसपैठियों के खिलाफ आईएमडीटी एक्ट बनाया। मगर इसमें ऐसे प्रावधान किए जिससे घुसपैठियों को रोकने के बजाय उन्हें बाहर निकालना ही मुश्किल हो जाए। मसलन, घुसपैठिए की सूचना देने पर आरोपी को भारतीय प्रमाण देने के बजाय शिकायतकर्ता को उसे विदेशी होने के सबूत लाने को कहा गया। यही वजह थी कि 27 जुलाई, 2005 को सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने आईएमडीटी एक्ट को निरस्त कर दिया।
इसके बदले केंद्र और राज्य सरकार को फॉरेन ट्रिब्यूनल आर्डर-1964 के तहत ट्रिब्यूनल स्थापित करने का आदेश दिया। इस पर भी तत्कालीन सरकारें टालमटोल की नीति अपनाती रहीं। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायाधीश आरएफ नरीमन की पीठ ने असम सरकार की ओर से घुसपैठ पर 1 अप्रैल, 2015 को दिए आधे-अधूरे शपथपत्र पर सख्त एतराज जताया। उस शपथ पत्र में न्यायालय के 17 दिसम्बर, 2014 के आदेश को लागू करने की बात कही गई थी। यह घिसा पिटा ढर्रा कांग्रेस सरकार की पुरानी रणनीति रही है।
यह भी कहा जाता है कि बांग्लादेश की सीमा से सटे राज्यों की तकदीर अवैध बांग्लादेशी ही तय कर रहे हैं। इसकी गंभीरता इससे भी समझी जा सकती है कि असम के 40 विधानसभा सीट और पश्चिम बंगाल में कुल 294 में से 53 विधानसभा की सीटें बांग्लादेशी मुस्लिम बहुलता वाली हैं। वोट बैंक की राजनीति के चलते ही इन घुसपैठियों की परोक्ष वकालत की जा रही है।

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