सांसत में सरकार

0
23

गुर्जर आंदोलन की आग फिर भड़क उठी है। उसकी आंच में राजस्थान फिर अलाव की तरह तपने लगा है। पांच प्रतिशत आरक्षण की मांग कर रहे गुर्जरों का आंदोलन हिंसक हो गया है। गुर्जरों का पारा चढ़ा हुआ है। आंदोलन के सूत्रधार कर्नल किरोड़ीमल बैंसला के चेहरे पर फिर से ‘पाटोली बलिदान’ की भाव-भंगिमा त्योरियों में बदल गई है। कर्नल बैंसला का शिकवा है कि,‘कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में गुर्जरों को आरक्षण देने का वादा किया था। अब इससे पीछे हट रही है। कर्नल बैंसला की हठधर्मिता उनके हर लμज में लिपटी हुई है कि, ‘हम पांच प्रतिशत आरक्षण पर कोई समझौता नहीं करेंगे। यही समाज का आखिरी फैसला है। यह कैसे मिले? इसकी गुत्थी सरकार को सुलझानी है हमें नहीं।’

आरक्षण संघर्ष समिति के संयोजक कर्नल किरोड़ी मल बैंसला के नेतृत्व में सवाई माधोपुर के मलारना और नीमोदा स्टेशन के बीच दिल्ली-मुंबई रेलवे ट्रैक पर पड़ाव डालकर बैठे गुर्जरों ने रेलों का आवागमन ठप्प कर दिया। आंदोलन का तीसरा दिन जनजीवन पर कहर बनकर टूटा, जब पुलिस और प्रदर्शनकारियों में जमकर झड़प हुई। आंदोलनकारियों ने पुलिस के तीन वाहन फूंक दिए। एक पुलिस चौकी को भी आग के हवाले कर दिया। आंदोलन के चलते गुर्जरों ने आगरा-मुंबई हाइवे समेत सड़क मार्ग भी जाम कर दिए। दस फरवरी को आंदोलन ने गंभीर रूप ले लिया। धौलपुर में आगरा-मुंबई मार्ग पर भीड़ को तितर-बितर करती पुलिस की हवाई फायरिंग उल्टी पड़ गई। नौबत यहां तक आई कि बारह पुलिस कर्मी घायल हो गए। हालात इस कदर बदतर हुए कि पुलिस और प्रशासनिक अफसरों को भागकर अपनी जान बचानी पड़ी। आंदोलनकारियों के हौसले को बढ़ना ही था।

राजस्थान में पांच प्रतिशत आरक्षण की मांग कर रहे गुर्जरों का आंदोलन हिंसक हो गया है। उनका पारा चढ़ा हुआ है। आंदोलन के सूत्रधार कर्नल बैंसला का शिकवा है कि ‘कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में गुर्जरों को आरक्षण देने का वादा किया था। अब इससे पीछे हट रही है। बैंसला की हठधर्मिता उनके हर लμज में लिपटी हुई है कि, ‘हम पांच प्रतिशत आरक्षण पर कोई समझौता नहीं करेंगे। यही समाज का आखिरी फैसला है। यह कैसे मिले? इसकी गुत्थी सरकार को सुलझानी है हमें नहीं।’

उन्होंने 11 फरवरी को सवाई माधोपुर के कुशालीपुरा और दौसा के सिकंदरा चौराहे पर आवागमन ठप्प कर दिया। सरकार इस मामले को लेकर कितनी गंभीर है? इसे समझें तो गुर्जरों से वार्ता के लिए सरकार ने पर्यटन मंत्री विश्वेन्द्र सिंह, चिकित्सा मंत्री डा. रघु शर्मा और सामाजिक न्याय मंत्री मास्टर भंवरलाल की कमेटी बनाई थी। लेकिन गुर्जर नेताओं से बात करने के लिए केवल विश्वेन्द्र सिंह ही पहुंचे। भवंरलाल और रघु शर्मा आंदोलन स्थल पर नहीं पहुंचे। संघर्ष समिति के संयोजक कर्नल बैंसला भी यही आरोप लगाते हैं कि ‘आरक्षण पर वार्ता के लिए सरकार गंभीर नहीं है। इससे लोगों का गुस्सा उबल रहा है। वार्ता के सारे रास्ते खुले हैं। लेकिन पहल तो सरकार को ही करनी पड़ेगी। उधर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का कहना है कि, ‘धोलपुर में पथराव और आगजनी असामाजिक तत्वों के कारण हुई। उन्होेंने कर्नल बैंसला से शांति बनाए रखने की अपील करते हुए उम्मीद जताई कि ‘बैंसला जल्दी ही बातचीत की मेज पर आएंगे। गुर्जर आंदोलन के चलते नुकसान की गाज रेलवे पर गिरी। आंदोलनकारियों ने अधिकांश टेÑनों का संचालन बंद कर दिया है। 21 टेÑनों का मार्ग बदलना पड़ा। सफर में अंदेशों के खौफ से यात्रियों की संख्या में 50 हजार की गिरावट आ चुकी है। रेलवे को हर रोज ढाई करोड़ से ज्यादा का नुकसान हो रहा है। अब तक नुकसान का दायरा 12 करोड़ तक पहुंच गया है। इस मुद्दे पर वार्ता में बाधा क्या है? सरकार की तरफ से बातचीत में क्या गतिरोघ है?

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के एक बयान से इसका खुलासा होता है। गहलोत का कहना है कि, ‘सरकार गुर्जर समाज से वार्ता को तैयार है। इसके लिए मंत्रिमंडलीय कमेटी भी बना दी गई है। लेकिन वार्ता के लिए पटरियों पर बैठने को सही नहीं कहा जा सकता। बैंसला को आगे आकर बातचीत का सिलसिला शुरू करना चाहिए। अब स्थिति ये है कि न सरकार आगे बढ़ रही है और न ही बैंसला। नतीजतन गुर्जरोें का हिंसक आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा।

गुर्जर आरक्षण के बेैताल से वसुंधरा और अशोक गहलोत को अपने-अपने शासनकाल में कई बार रूबरू होना पड़ा। यहां तक कि मुद्दा बातचीत के मुकाम पर भी पहुंचा। विधानसभा में भी गूंजा। नतीजतन विधानसभा में पांच प्रतिशत आरक्षण के रूप में पारित हुआ। यह मसौदा एक फीसद आरक्षण और देवनारायण विकास बोर्ड के रूप में भी सामने आया। आरक्षण का प्रस्ताव अदालत की चैखट पर तो आ गया। लेकिन पचास फीसदी वाले संवैधानिक दायरे पर अटक गया। दो माह पहले हुए विधानसभा चुनावों में गुर्जर आरक्षण पर किया गया वादा अब कांग्रेस को ही भारी पड़ गया। कांग्रेस ने इसे अपने घोषणापत्र में शामिल किया था। डेढ़ महीने की सरकार कुछ कर पाती। उससे पहले केन्द्र सरकार ने गरीब सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण की घोषणा कर दी। कर्नल बैंसला ने अपना दांव खेल दिया। 6 फरवरी को उन्होंने सरकार के पाले में चुनौती की गेंद फेंक दी कि, ‘केन्द्र सरकार ने दस दिनों में सवर्णों को आरक्षण दे दिया और वो भी बगैर मांगे? हम चौदह साल से आरक्षण मांग रहे हैं। उसकी अनसुनी कर दी गई। अब जो लोग हमारे वोट से विधायक और मंत्री बने, उनका फर्ज बनता है कि हमें आरक्षण दिलवाएं। कर्नल बैंसला के निशाने पर उनके ही समाज के उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट है। उन्होंने बैसला की नाराजगी पर ठंडे छींटे डालते हुए अपनी समस्या भी बताई। उनका कहना था कि, ‘हमने जो वादा किया था, वो पूरा करेंगे। अभी हमारी सरकार को बने हुए डेढ़ महीना ही हुआ है। हमें समस्या का सकारात्मक उपाय ढूंढने दीजिए।

बहरहाल ये भी सच है कि राज्य सरकार विधानसभा में प्रस्ताव पास कर केन्द्र सरकार को भेज चुकी है ताकि आरक्षण की कानूनी अड़चनों को दूर कर दिया जा सके। याद रहे कि इस मुद्दे पर वर्ष 2017 में भी ओबीसी आरक्षण देना तय हुआ। लेकिन लागू होने से पहले ही कोर्ट में याचिका लग गई। नतीजतन मामला फिर ठंडे बस्ते में चला गया। हालांकि यह भी सच है कि गुर्जर समुदाय को 16 अक्टूबर 2015 से पांच प्रतिशत आरक्षण मिलने लग गया था। यह चौदह महीने तक लागू रहा। इस दौरान 1252 लोगों को राज्य सेवा में नौकरी लगी। लेकिन 9 दिसम्बर 2016 को हाईकोर्ट ने 5 प्रतिशत आरक्षण को रद्द कर दिया। आग फिर सुलगी। अब तो बुझने के आसार भी नजर नहीं आ रहे हैं। मुख्यमंत्री गहलोत आरक्षण के उलझाव को वसुंधरा सरकार की देन मानते हैं। उनका कहना है कि, ‘वसुंधरा सरकार ने पांच प्रतिशत आरक्षण भी विशेष केटेगरी बनाकर उसे चौदह प्रतिशत से जोड़ दिया। जबकि उन्हें मालूम था कि इस पर हाईकोर्ट से स्थगन आ जाएगा।’ कर्नल बैंसला तो पांच प्रतिशत की रटंत के अलावा कुछ सुनने को तैयार ही नहीं हैं। उनका दो टूक कथन है कि, ‘इस बार कोई समझौता नहीं होगा। आरक्षण की चिट्ठी लेकर ही उठेंगे। उधर मुख्यमंत्री गहलोत का कहना है कि, ‘गुर्जर आरक्षण पर राज्य सरकार को कोई सार्थक प्रयास करना हो तो हम तैयार हैं।’

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here