गठबंधन में पिछड़ा यूपीए

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मंचों पर सभाओं में एक साथ नजर आने वाले विपक्षी दल चुनाव में गठबंधन नहीं कर पाए। इसके विपरीत यूपीए की तुलना में एनडीए लगातार विभिन्न राज्यों में छोटे दलों को जोड़ रहा है।

20मई 2014 का दिन था। दिल्ली में गर्मी चरम पर थी। संसद के वातानुकूलित सेंट्रल हॉल में एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के नेता मौजूद थे। मंच पर नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे। सभी के चेहरे पर जीत की खुशी और निश्चिंतता साफ झलक रही थी। नरेन्द्र मोदी ने अपने संबोधन की शुरुआत इस लाइन से की ‘इस जीत के लिए सभी सहयोगियों का आभार।’ तब भाजपा ने अकेले संसद के जादुई आंकड़ें को पार कर लिया था। फिर भी पार्टी ने सहयोगी दलों का न केवल आभार व्यक्त किया बल्कि अपने मंत्रिमंडल में उचित भागीदारी भी दी। क्योंकि भाजपा छोटे-छोटे दलों के राजनीतिक महत्व को बखूबी जानती है। पिछले चुनाव की तुलना में इस बार एनडीए का कुनबा ज्यादा बड़ा है। वहीं एनडीए को चुनौती दे रही यूपीए सिमटती जा रही है।
एनडीए का आधिकारिक गठन 1998 में हुआ था। तब अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी ने 13 दलों को साथ लेकर एनडीए बनाया था। उस समय एनडीए की सरकार बनी मगर तेरह माह में ही एआईएडीएमके ने वाजपेयी सरकार से समर्थन वापस ले लिया। समर्थन वापस लेने से सरकार गिर गई।

1999 में चुनाव पूर्व एनडीए गठबंधन में और दलों को शामिल किया गया। तब एनडीए 24 दलों का गठबंधन था। चौबीस दलों के गठबंधन का नेतृत्व करते हुए वाजपेयी सरकार ने कार्यकाल पूरा किया। वह पहली गठबंधन सरकार थी, जिसका कार्यकाल पूरा हुआ था। इसका श्रेय गठबंधन का नेतृत्व कर रही भाजपा को जाता है। पार्टी को बहुत जल्द पता चल गया कि बिना गठबंधन केंद्र की सत्ता में आना मुश्किल है। इसलिए भाजपा के नेताओं ने क्षेत्रीय एवं छोटे दलों को तरजीह देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस वक्त पार्टी महासचिव थे। इसलिए उन्हें छोटे दलों का महत्व पता है। 2013 में पार्टी ने जैसे ही उन्हें पहले प्रचार समिति का अध्यक्ष और फिर प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया तो उन्होंने छोटे दलों को अपने साथ जोड़ना शुरू कर दिया। हालांकि उन्हें पहला झटका जदयू जैसे पुराने साथी ने एनडीए छोड़कर दिया। पर भाजपा ने हार नहीं मानी। उन्होंने बिहार में रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को अपने साथ जोड़ा और बिहार में बड़ी जीत दर्ज की। इसके बाद भाजपा ने सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश में अपना दल जैसे छोटे दल को एनडीए में लाकर वहां इतिहास रच दिया। 2014 के चुनाव में भाजपा ने कई बड़े राज्यों में वहां के छोटे-छोटे दलों को अपने साथ जोड़ा। तब एनडीए में दलों की संख्या 29 हो गई थी। उस चुनाव में एनडीए की 22 सहयोगी दलों ने कुल 54 लोकसभा सीटें जीतीं थीं और भाजपा की संख्या 282 पर पहुंच गई थी। इस तरह सहयोगियों की 54 सीटें मिलाकर एनडीए 335 के आंकड़ें पर पहुंच गया।

अब आज की वर्तमान स्थिति पर नजर डालते हैं। आंध्र प्रदेश के सहयोगी दल तेलगु देशम पार्टी (टीडीपी) ने जब एनडीए छोड़ा तो विपक्षी दलों ने कहना शुरू कर दिया कि एनडीए डूबती नौका है। टीडीपी दक्षिण भारत का बड़ा सहयोगी दल था। उसके जाने से भाजपा को दक्षिण में झटका लगता दिखा। मगर पार्टी के रणनीतिकारों इस झटके को अपनी मजबूती बनाया। आज वह दक्षिण की सबसे बड़ी पार्टी एआईएडीएमके को एनडीए में ले आये हैं। तमिलनाडु में भाजपा ने एआईएडीएमके के अलावा डीएमडीके, पीएमके, एमडीएमके जैसे मंझोले दलों से गठबंधन कर लिया है। तमिलनाडु में डीएमके-कांग्रेस के सामने एनडीए का गठबंधन ज्यादा मजबूत नजर आ रहा है। इस गठबंधन से पहले तक वहां विपक्षी दल भाजपा का मजाक उड़ाया करते थे कि तमिलनाडु में भाजपा ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलती। इसका सटीक जवाब राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने दिया था। उन्होंने कहा था, तमिलनाडु में भाजपा को ढूंढ़ना है तो 2019 के लोकसभा चुनाव के ईवीएम में देख लें। भाजपा राज्य में बड़ी शक्ति बनेगी।

एनडीए: प्रमुख दल
भारतीय जनता पार्टी
शिवसेना
जनता दल यूनाइटेड
लोक जनशक्ति पार्टी
अकाली दल
एआईएडीएमके
डीएमडीके
एमडीएमके
अपना दल(एस)
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी
नागा पीपल्स फ्रंट
यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट
सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट
असम गण परिषद
नार्थ-ईस्ट रीजनल पॉलिटिकल फ्रंट
(इसमें पूर्वोतर के दस दल हैं)
गोरखा जनमुक्ति मोर्चा
गोरखा लिबरेशन फ्रंट
महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी
गोवा विकास पार्टी
जन सेना पार्टी
रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया
ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन
पट्टली मक्कल कटची
ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस
केरल कांग्रेस (थॉमस)
शिव संग्राम
केरल कांग्रेस (एन)
पीएसपी
पीएनपी
केवीसी
जेएसएस

इस गठबंधन के बाद अमित शाह की बात सही होती दिख रही है। भाजपा को आंध्र प्रदेश के बाद बिहार में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी से झटका मिला था। वह एनडीए का साथ छोड़ राजद (राष्ट्रीय जनता दल) के साथ चली गई। जबकि बिहार में भाजपा के पुराने साथी एवं मजबूत जनाधार वाले नेता नीतीश कुमार मिल गए हैं। यहां 2013 में एनडीए से अलग हुए जदयू नेता वापस लौट आये। इस तरह बिहार में कांग्रेस गठबंधन के मुकाबले एनडीए बहुत मजबूत स्थिति में है। विभिन्न राज्यों खासकर दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए पार्टी छोटे-छोटे दलों (पंजीकृत लेकिन गैर मान्यता प्राप्त) से गठजोड़ कर रही है। ऐसे कई दलों से अब तक गठबंधन हो चुका है। कई राज्यों में अब भी प्रयास जारी है। छोटे-छोटे दलों से गठबंधन की रणनीति शाह के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने इस चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत 50 फीसदी करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। आॅफ द रिकार्ड बातचीत में भाजपा के एक कद्दावर नेता बताते हैं, ‘पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तेलंगाना, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों के सत्ताधारी दल या मुख्यमंत्री का कद बड़ा है। इन राज्यों में सफलता हासिल करना पार्टी के लिए कठिन है।’ उत्तर प्रदेश और बिहार के अलावा उत्तर भारत के करीब आधा दर्जन ऐसे राज्य हैं, जहां भाजपा ने 2014 में शत प्रतिशत सीटें जीती थीं। इसके अलावा कई ऐसे राज्य हैं जहां का नतीजा 90 प्रतिशत के करीब रहा है। पार्टी ऐसे राज्यों में नुकसान मानकर चल रही है। उस नुकसान की भरपाई के लिए अमित शाह ने प्रदेश के नेताओं को दो साल पहले टास्क दे दिया था। उस टास्क में प्रदेश के छोटे दलों को जोड़ना भी था।

पार्टी सूत्र बताते हैं कि अमित शाह ने अपनी टीम को 150 ऐसी सीटों पर काम पर लगाया आंध्र प्रदेश के सहयोगी दल तेलगु देशम पार्टी (टीडीपी) ने जब एनडीए छोड़ा तो विपक्षी दलों ने कहना शुरू कर दिया कि एनडीए डूबती नौका है। टीडीपी दक्षिण भारत का बड़ा सहयोगी दल था। उसके जाने से भाजपा को दक्षिण में झटका लगता दिखा। मगर पार्टी के रणनीतिकारों ने इस झटके को अपनी मजबूती बनाया। आज वह दक्षिण की सबसे बड़ी पार्टी एआईएडीएमके को एनडीए में ले आये हैं।

मंच पर साथ, मैदान में अलगाव
एनडीए के विपरीत यूपीए मंचों पर या सभाओं में एक साथ दिखती है। कर्नाटक से लेकर पश्चिम बंगाल और दिल्ली तक में कई बार विपक्षी दलों के नेता एक-दूसरे का हाथ पकड़कर फोटो खिंचवाते रहे हैं लेकिन गठबंधन के तार इनके जुड़ नहीं पा रहे हैं। यूपीए गठबंधन की बात की जाए तो बिहार, झारखण्ड, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र को छोड़ किसी राज्य में गठबंधन मजबूत नहीं हो पाया है।

यूपीए
कांग्रेस
राष्ट्रीय जनता दल
राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी
हिंदुस्तान आवाम मोर्चा
लोकतांत्रिक जनता दल
नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी
जनता दल (सेक्यूलर)
डीएमके
केरल कांग्रेस (जेकब)
नेशनल कांफ्रेंस
झारखण्ड मुक्ति मोर्चा
झारखण्ड विकास मोर्चा

बिहार में राजद, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, हिंदुस्तान आवाम मोर्चा और शरद यादव की नई पार्टी लोकतांत्रिक जनता दल वाला गठबंधन हुआ है। वहां वह एनडीए को टक्कर देने की स्थिति में जरूर है। इसके अलावा तमिलनाडु में डीएमके के साथ उनका गठबंधन हुआ है। वहां यह गठबंधन एनडीए से मजबूत स्थिति में है। झारखण्ड में भी कांग्रेस ने झारखण्ड मुक्ति मोर्चा और झारखण्ड विकास मोर्चा के साथ गठबंधन किया है। लेकिन उस गठबंधन में राजद को शामिल नहीं किया गया है। जिस कारण बिहार में यूपीए गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी झारखण्ड में इसके खिलाफ लड़ेगी। इस तरह का मुकाबला यूपीए गठबंधन को नुकसान करेगा। महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से कांग्रेस का पुराना गठबंधन है। इस बार दोनों एक साथ चुनाव लड़ रहे हैं। कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी की पार्टी जेडीएस और कांग्रेस एक होकर चुनाव लड़ रही है। वहां दोनों के गठबंधन की सरकार भी है।
यूपीए गठबंधन को सबसे बड़ा झटका उत्तर प्रदेश में लगा। सपा-बसपा गठबंधन ने कांग्रेस को अपने साथ नहीं रखा। जबकि एनडीए को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने के लिए उत्तर प्रदेश में विपक्षी एकता की बात हो रही थी। मगर वहां एकता धाराशायी हो गई। अन्तर्विरोध ऐसा है कि राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में बसपा और सपा कांग्रेस को समर्थन दे रही है। मगर वहीं उत्तर प्रदेश में इनका साथ पसंद नहीं है। मायावती कुछ दिनों पहले स्पष्ट कर चुकी हैं कि कांग्रेस से देश में कहीं भी गठबंधन नहीं किया जाएगा। विपक्षी एकता की सबसे ज्यादा बात करने वाली तृणमूल कांग्रेस और तेलगू देशम पार्टी को भी कांग्रेस का साथ पसंद नहीं है। ऐसे में यूपीए चुनाव में एनडीए को कैसे टक्कर देगी। गठबंधन करने में ही कांग्रेस पिछड़ चुकी है। इसलिए कई राजनीतिक विश्लेषक अभी से चुनाव नतीजा में कांग्रेस का पिछड़ना तय मानकर चल रहे हैं।

यूपीए गठबंधन को सबसे बड़ा झटका उत्तर प्रदेश में लगा। सपा-बसपा गठबंधन ने कांग्रेस को अपने साथ नहीं रखा। जबकि एनडीए को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने के लिए उत्तर प्रदेश में विपक्षी एकता की बात हो रही थी। मगर वहां एकता धाराशायी हो गई। अन्तर्विरोध ऐसा है कि राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में बसपा और सपा कांग्रेस को समर्थन दे रही है। मगर वहीं उत्तर प्रदेश में इनका साथ पसंद नहीं है। मायावती कुछ दिनों पहले स्पष्ट कर चुकी हैं कि कांग्रेस से देश में कहीं भी गठबंधन नहीं किया जाएगा।

है, जहां भाजपा नाममात्र की है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल या तेलंगाना में पार्टी अकेले सीट जीतने की स्थिति में नहीं है। पार्टी इनमें से कुछ राज्यों में छोटे-छोटे सहयोगी दलों की तलाश कर गठबंधन कर चुकी है। जिसमें तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश है। इन्हें जोड़कर भाजपा वहां अच्छा करने की स्थिति में आ गई है।’
इस बार भाजपा ने ऐसे छोटे दलों पर फोकस किया है, जिन दलों के पास 50 हजार से लेकर 10 लाख तक वोट हैं। पार्टी के एक नेता उदाहरण देते हुए बताते हैं, ‘तमिलनाडु के तेनकासी में भाजपा के सहयोगी एमडीएमके ने 1,89,386 वोट हासिल किया था और पीटीपी ने 2,61,757 वोट। यदि दोनों के वोट जोड़ लिए जाए तो वहां से जीती एआईएडीएमके को मिले 4,24,586 वोट से 26,557 वोट अधिक हैं। जबकि आज तो एआईएडीएमके भी हमारे साथ है।

अमित शाह बहुत पहले कह चुके हैं कि 2019 में विपक्षी दलों से बड़ा कुनबा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का होगा। ऐसा उन्होंने अब कर के भी दिखाया है। आज एनडीए का कुनबा 40 दलों के करीब पहुंच चुका है। एनडीए की यह कारवां लगातार बढ़ता ही जा रहा है। भाजपा के राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी कहते हैं, ‘भाजपा अपने सहयोगी दलों का सम्मान करती है। इस चुनाव में हम पिछले चुनाव से बडेÞ गठबंधन के साथ उतर रहे हैं। कई राज्यों में छोटे दलों को हमने अपने साथ ले लिया है। वह एनडीए की जीत में अहम भूमिका निभाऐंगे।’ यूपीए का कुनबा बिखरता जा रहा है तो एनडीए का कारवां लगातार बढ़ता जा रहा है। चुनाव से पहले भाजपा ने गठबंधन में सहयोगी दलों की संख्या बढ़ाकर विपक्ष के मनोबल पर चोट कर दिया है। उसके अब सिर्फ चुनाव जीतना बाकी है।

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