संसद में अभूतपूर्व सहमति

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संसद का शीतसत्र इस मायने में एतिहासिक और अभूतपूर्व रहा कि इसमें सामान्य वर्ग को 10% आरक्षण देने के मामले में करीब-करीब सभी राजनीतिक दलों ने सहमति दिखाई। विशेष रूप से कांग्रेस जैसी भाजपा की धुरविरोधी पार्टी ने ‘किंतु-परन्तु’ के साथ ही सही, लोकसभा और राज्यसभा में इसका समर्थन किया।

कांग्रेस जिसका वादा करती रही, नरेन्द्र मोदी सरकार ने उसे पूरा कर दिया। उसे कायदे से खुश होना चाहिए था। पर ऐसा लग रहा था कि वह आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग को मिलने वाले आरक्षण से ज्यादा खुश नहीं थी। संसद में 10 प्रतिशत आरक्षण वाले विधेयक को लेकर जो चर्चा हो रही थी उसमें यह दिख रहा था। मल्लिाकार्जुन खड़गे कह रहे थे कि यह चुनावी स्टंट है। कपिल सिब्बल का अपना राग था। चर्चा में उन्होंने कहा कि आरक्षण नहीं, नौकरी चाहिए। सिब्बल भूल गए कि आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था नौकरी के लिए ही की गई है। पर जब यह बात उन्हें याद आई तो कहने लगे कि कोर्ट के पचड़े में यह संशोधन फंस जाएगा।
चर्चा के दौरान वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा कि उच्चतम न्यायालय द्वारा आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत तय किया जाना गरीबों को 10 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के रास्ते में बाधक नहीं है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस के लिए यह परीक्षा की घड़ी है कि वह गरीबों को आरक्षण देने की मोदी सरकार की पहल पर क्या रवैया अपनाती है? उन्होंने विपक्ष पर कटाक्ष करते हुए कहा कि इस विधेयक का मन मारकर नहीं बल्कि खुले दिल से समर्थन करें। उन्होंने कांग्रेस के सदस्यों को उनके 2014 के चुनावी घोषणा पत्र की भी याद दिलाई जिसमें इस प्रकार के आरक्षण का वादा किया गया था।

इन्होंने कहा

Image result for ramvilasलोकजनशक्ति पार्टी (लोजपा) अध्यक्ष व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने कहा कि प्रस्तावित कानून को संविधान की 9वीं अनुसूची में डाल दिया जाना चाहिए ताकि इसे न्यायालय में चुनौती न दी जा सके। उन्होंने कहा है कि बहुत संभव है कि नए कानून का मामला कानूनी लड़ाई में उलझ जाए। इसलिए पहले से ही ऐहतियाती उपाय करने चाहिए।

अन्ना द्रमुक थम्बी दुराई ने आरक्षण की अधिकतम सीमा को बढ़ा कर 70 प्रतिशत करने के लिए संविधान संशोधन किये जाने की मांग की। उन्होंने कहा कि इस बात की संभावना है कि प्रस्तावित आरक्षण व्यंवस्था को उच्चतम न्यायालय गैर कानूनी घोषित कर दे।

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केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने गरीबों के लिए 10 प्रतिशत के आरक्षण को मोदी सरकार द्वारा मैच के अंतिम ओवरों में लगाया गया छक्का बताया है। उन्होंने कहा कि विकास की राजनीति के तहत सरकार अभी ऐसे कई और छक्के लगाएगी।

 

बीजद नेता भर्तृहरि महताब ने कहा कि कोई अपनी अपनी जाति नहीं बदल सकता है, हालांकि उस किसी भी व्यक्ति की वित्तीय स्थिति में परिवर्तन हो सकता है। इसलिए, कम से कम हर दस वर्ष पर पर्याप्त सूचना का संकलन किया जाना चाहिए और ये प्रस्तावित बिल में शामिल नहीं है।

तृणमूल कांग्रेस के सांसद सुदीप बंदोपाध्याय ने कहा कि सरकार इस आरक्षण बिल की तरह ही महिला आरक्षण बिल को प्राथमिकता के साथ क्यों नहीं लेती है? यह बिल केवल नौकरियों के बारे में ही नहीं है, बल्कि झूठी आशाओं और नकली सपनों के साथ युवाओं को गुमराह करने के बारे में
भी है।

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राजद के जयप्रकाश नारायण यादव ने कहा कि वे हमारे साथ विश्वासघात कर रहे हैं, यह राजनीतिक धोखा है। एससी/एसटी का आरक्षण बढ़ाकर 85 फीसदी करो और उसके बाद आर्थिक तौर पर पिछड़े सामान्य वर्ग के लोगों को 10 फीसदी आरक्षण दें।

 

सबका साथ-सबका विकास
अमित शाह
सामान्य श्रेणी के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को 10 फीसदी
आरक्षण देने वाला 124वां संविधान संसोधन विधेयक संसद
में पास होने पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय
अध्यक्ष अमित शाह ने कहा है कि यही ‘सबका साथस
बका विकास’ है। उन्होंने यह भी कहा, ”लोक-कल्याण
का निरंतर प्रयास है, जन-जन का साफ नियत में विश्वास
है, चरितार्थ होता ‘सबका साथ-सबका विकास’ है। शाह ने
आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग को आरक्षण देने वाले
विधेयक के राज्यसभा में पास होने पर प्रधानमंत्री मोदी जी
को हार्दिक बधाई देते हुए उसका समर्थन करने वाले सभी
सदस्यों का आभार भी जताया।

राज्यों से सहमति की जरूरत नहीं
सुभाष कश्यप
संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते है कि राष्ट्रपति के
हस्ताक्षर होने के बाद संविधान संशोधित हो जाएगा। वे
आगे कहते हैं कि इस विधेयक को राज्यों के पास भेजने
की जरूरत नहीं है। कारण, किस तरह के संशोधन के लिए
राज्यों की अनुमति जरूरी होती है, उसका जिक्र संविधान में
है। यह संविधान संशोधन उस श्रेणी में नहीं आता है।

 

सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने कहा कि सामान्य श्रेणी के गरीब लोगों को सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में 10 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए संविधान में आवश्यक संशोधन करने के लिए यह उपाय किया जा रहा है। गहलोत ने कहा कि पूर्व में प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के कार्यकाल में सामान्य श्रेणी के लोगों को आरक्षण देने की पहल की गई थी, लेकिन इसे संविधान सम्मत नहीं मानते हुए न्यायालय ने खारिज कर दिया था। यह सरकार संविधान में संशोधन कर सामान्य श्रेणी के लिए यह प्रावधान कर रही है, जो न्यायिक समीक्षा में खरा उतरेगा। विधेयक के पक्ष में 323 और विरोध में 3 मत पड़े। कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों ने भी विधेयक के पक्ष में मतदान किया और विधेयक में किसी तरह का संशोधन पेश नही किया गया। वहीं राज्यसभा से भी यह विधेयक भारी बहुमत से पास हुआ। विधेयक के पक्ष में 165 और विरोध में 7 मत पड़े। इस तरह भारी बहुत के साथ वह दोनों सदनों से पारित हो गया।

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