राफेल विवाद सबसे अलग

राफेल सीधा-सपाट सौदा था। कांग्रेस ने उसके खिलाफ अभियान चलाया। बताया कि राफेल सौदा मोदी सरकार का ‘बोफोर्स’ है। उस पर खबर होने लगी और साफ-सुथरा सौदा घोटाले में तब्दील कर दिया गया। मतलब इसमें घोटाले जैसा कुछ था नहीं, राजनीतिक लाभ के लिए भ्रम पैदा किया गया। यही बात राफेल को अन्य रक्षा घोटालों से अलग करती है।
कैसे? उसे जानने-समझने के लिए बात बोफोर्स की करते हैं। बोफोर्स सौदे में घोटाला हुआ है, इसका भ्रम विपक्ष ने नहीं फैलाया था। उन्हें तो पता भी नहीं था कि बोफोर्स सौदे में कोई घोटाला हुआ है। घोटाले का पता तो स्वीडन रेडियो की खबर से चला था। उसके बाद भारत से कई पत्रकार मामले की जांच- पड़ताल करने स्वीडन गए। मामले से जुड़े उन्हें कई दस्तावेज मिले। फिर बोफोर्स घोटाले को लेकर सरकार के खिलाफ अखबारों ने अभियान चलाया। तब जाकर राजनीतिक दलों ने इस मसले को उठाया और तत्कालीन राजीव गांधी सरकार को घेरा। ऐसा ही हेलीकॉप्टर घोटाले में हुआ। इसकी खबर भी जनता को अखबार से मिली। उसके बाद इटली की कोर्ट ने घोटाले के आरोपियों को सजा सुनाई। तब कहीं जाकर यह मामला खुला। उसके बाद विपक्ष ने सरकार को आड़े हाथ लिया। महज राजनीतिक लाभ के लिए अन्य किसी रक्षा सौदे के खिलाफ विपक्ष ने कभी अभियान नहीं चलाया।

दूसरा बुनियादी अतंर यह है कि राफेल सौदा दो सरकारों यानी फ्रांस और भारत के बीच हुआ है। जबकि आमतौर पर हथियार खरीदने के लिए सरकार पहले निविदा मंगाती है। फिर उनमें से कंपनी का चुनाव करती है। इस प्रक्रिया में भ्रष्टाचार की संभावना सबसे ज्यादा होती है। बोफोर्स, अगस्ता वेस्टलैंड, पिलाटस जैसे मामलों में यही हुआ था। इसके विपरीत जब सौदा दो सरकारों के बीच होता है तो उसमें भ्रष्टाचार की संभावना रहती ही नहीं। इससे शायद सब परिचित थे। यही वजह रही कि राफेल विवाद को लेकर समूचा विपक्ष कांग्रेस के साथ खड़ा नहीं हुआ। उन्हें पता था कि राफेल सौदे में कुछ हुआ नहीं है, राहुल गांधी बेवजह शोर मचा रहे हैं। अगर कुछ हुआ होता तो खोजी पत्रकारों को उसके सुराग मिलते। पर किसी को कुछ मिला नहीं। फिर भी महीनों कांग्रेस अभियान चलाती रही और सरकार को घेरती रही।

इसी बीच राफेल विवाद की जांच के लिए कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। शायद ही ऐसा किसी रक्षा सौदे में हुआ हो जब सौदे की जांच के लिए जनहित याचिका पड़ी हो। पर राफेल विवाद में यह भी हुआ। मनोहर लाल शर्मा और प्रशांत भूषण समेत दो अन्य लोगों ने याचिका डाली। कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा। सरकार ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा की वजह से राफेल सौदे को सार्वजनिक नहीं कर सकते। तो कोर्ट ने सौदे से जुड़ी सारी जानकारी सीलबंद लिफाफे में मांगी। सरकार ने मूल्य, निर्णय की प्रक्रिया और आॅफसेट (साझीदार) से संबंधित सूचना कोर्ट को मुहैया करा दी। कोर्ट ने दस्तावेजों को जांचा-परखा। उसे कहीं कोई गड़बड़ी नहीं दिखी। कोर्ट ने कह दिया, राफेल सौदे सही है। उसमें कोई घोटाला नहीं हुआ है।
इससे कांग्रेस खिन्न है। जो 12 दिसंबर को शाम में हुई राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेस में दिखा। वह कुल साढ़े बारह मिनट चली। उस कांफ्रेस में राहुल गांधी, यह मानने के लिए तैयार नहीं थे कि राफेल सौदे में घोटाला नहीं हुआ है। उस रोज वे अपना आपा खो बैठे थे। उन्होंने झुझला कर कहा ‘ हम साबित कर देंगे कि चौकीदार चोर है’।

कैसे? यह बताए बिना, वे चले गए। पर आधार निर्णय के उस हिस्से को बनाया है जिसमें कहा गया है ‘ कैग के पास राफेल से जुड़ी सारी जानकारी सौंप दी गई है। उसने जांच करके रिपोर्ट लोक लेखा समिति को भेज दी है’। जबकि सच्चाई यह है कि लोक लेखा समिति के पास राफेल से जुड़ी कोई रिपोर्ट नहीं गई है। इसे लेकर सरकार ने अपना रुख साफ कर दिया। उसने निर्णय में हुई गड़बड़ी को सुधारने के लिए कोर्ट में हलफनामा डाल दिया है। लेकिन कांग्रेस मानने के लिए तैयार नहीं है। वह तो राफेल की राजनीतिक उड़ान जारी रखना चाहती है।

इस पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने तीखी टिप्पणी की है। वे कहते हैं, ‘अगर राफेल सौदे पर संदेह करने का आधार निर्णय में हुई टाइपिंग गलती है तो फिर राहुल गांधी पर लानत है’। मगर इससे न तो राहुल गांधी पर कोई असर पड़ा और न ही कांग्रेस पर। वह तो अब सेना को भी राजनीति में घसीटने पर आमदा है। वीरपा मोइली ने वायु सेना प्रमुख पर ही सच छुपाने का आरोप लगा दिया है। जो जाहिर तौर बेनकाब हुई कांग्रेस की बौखलाहट को दिखाता है। कोर्ट के निर्णय से परेशान बस राहुल गांधी ही नहीं हंै। इसमें वे भी है जो डीटीसी घोटाले की लपट में झुलस चुके हैं। और वे भी जो एक जमाने में एक औद्योगिक घराने के सरकारी एजेन्ट हुआ करते थे।

सब कोर्ट के निर्णय से दुखी हंै। दर्द इस बात का भी है कि नरेन्द्र मोदी काजल की कोठरी से बेदाग हो कर निकले। खुद सुप्रीम कोर्ट ने उनकी ईमानदारी पर मुहर लगाई। इससे उनको बदहजमी हो गई है। वे तो राफेल को बोफोर्स बनाने निकले थे। पर दांव उलटा पड़ा गया। सुप्रीम कोर्ट ने ही कह दिया कि राफेल सौदे में कोई घोटाला नहीं हुआ है।
किसी रक्षा सौदे में ऐसा दूसरी बार हुआ था। पहली बार 2015 में हुआ था। मामला ताबूत घोटाले का था। इसमें कोर्ट ने कहा था कि ताबूत घोटाला कभी हुआ ही नहीं था। यह वही तथाकथित घोटाला था जिस पर कांग्रेस ने वाजपेयी सरकार को घेरा था। रक्षामंत्री जार्ज फर्नांडीज को इस्तीफा तक देना पड़ा था। आरोप था कि ताबूत की खरीद में रिश्वतखोरी हुई है। बहुत शोर मचा था तब। गला फाड़ने वाले उस समय भी कांग्रेसी ‘वीर’ थे। इस मामले की सीबीआई जांच हुई। वह रिश्वतखोरी के सबूत ढूंढ़ती रहती। पर उसे मिला कुछ नहीं। लेकिन ऐसा हर रक्षा सौदे में नहीं हुआ। कांग्रेस शासन के दौरान हुए तकरीबन हर रक्षा सौदे में रिश्वत के सबूत मिले।

रक्षा घोटालों का इतिहास
1 . जीप घोटाला (1948)
स्वतंत्र भारत का पहला घोटाला था। वीके.कृष्ण मेनन पर आरोप लगा था। उच्च स्तरीय जांच समिति ने उन्हें दोषी भी पाया। फिर भी उनके खिलाफ पंडति नेहरू ने कार्रवाही नहीं की।
2 . बोफोर्स घोटाला (1987)
1987 में ये बात सामने आयी थी कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारतीय सेना को तोपें सप्लाई करने का सौदा खुद लेने के लिए 80 लाख डालर की दलाली चुकायी थी। उस समय कांग्रेस की सरकार के दौरान राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। आरोप था कि राजीव गांधी परिवार के नजदीकी बताये जाने वाले इतालवी व्यापारी ओत्तावियो क्वात्रोची ने इस मामले में मिडिएटर का काम किया था ।
3 . बराक मिसाइल घोटाला
बराक मिसाइल रक्षा सौदे में भ्रष्टाचार का एक और नमूना बराक मिसाइल की खरीदारी में देखने को मिला। इंडिया ने इजरायल से मिसाइल खरीदने का प्लान बनाया। उसकी कीमत लगभग 270 मिलियन डॉलर थी। इस सौदे पर डीआरडीपी के तत्कालीन अध्यक्ष (उस समय प्रधानमंत्री के साइंटिफिक एडवाइजर) ए पी जे अब्दुल कलाम ने भी आपत्ति दर्ज कराई थी। फिर भी यह सौदा हुआ। इस मामले में सीबीआई ने 2006 में एफआईआर भी दर्ज की। एफआईआर में समता पार्टी के पूर्व कोषाध्यक्ष आर के जैन की गिरμतारी भी हुई।
4 . कॉफिन घोटाला (1999)
1999 में कारगिल वॉर के दौरान ये घोटाला सामने आया। भारत और पाकिस्तान के बीच 1999 में कारगिल युद्ध हुआ। इसके बाद एक बेहद संगीन मामला सामने आने से देशवासियों की भावनाएं बुरी तरह से आहत हुईं। युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के शव को सम्मानजनक तरीके से घर पहुंचाने के लिए जिन ताबूतों को खरीदा गया, उसमें भारी घोटाला हुआ। इस मामले में उन्हें क्लीन चिट दे दी गई थी।
5 . तहलका घोटाला (1999)
एक मीडिया हाउस तहलका डॉट कॉम के ंिस्टग आॅपरेशन ने इस बात का खुलासा किया कि कैसे कुछ आर्मी आॅफीसर्स और वरिष्ठ राजनेता रक्षा समझौते में गड़बड़ी करते हैं। वे हथियारों की खरीददारी में रिश्वत ले रहे हैं। स्टिंग आॅपरेशन में सामने आया कि बराक मिसाइल केस को मिलाकर कुल ऐसी 15 डील्स की गई हैं।
6 . सुदीप्ता घोष प्रकरण (2009)
2009 में पूर्व आॅर्डिनेंस फैक्टरी बोर्ड के डायरेक्टर जनरल सुदीप्त घोष को सीबीआई ने गिरμतार कर लिया। घोष पर आरोप था कि इन्होंने दो भारतीय और चार विदेशी कंपनियों से रिश्वत ली है। ये वो कंपनियां थीं जिन्हें रक्षामंत्री ए के अंटनी ब्लैक लिस्टेड कर चुके थे।
7 . टाट्रा ट्रक घोटाला (2012)
पूर्व आर्मी चीफ जनरल वीके सिंह ने आरोप लगाया कि एक सेवानिवृत्त अधिकारी ने 2010 में घटिया वाहनों की खरीद से संबंधित एक समझौते को मंजूरी देने के लिए उन्हें 14 करोड़ रिश्वत देने की पेशकश की थी। यहां पर ट्रकों की क्वालिटी पर भी कई सवाल खड़े हुए थे।

रक्षा घोटालों का इतिहास
आजाद भारत का पहला रक्षा घोटाला पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार के समय हुआ। उसी समय रक्षा घोटालों की नींव पड़ी। लोग उसे ‘जीप घोटाले’ के नाम से जानते हैं। यह 1948 की बात है। तब जवाहर लाल नेहरू अंतरिम प्रधानमंत्री थे और वीके. कृष्ण मेनन ब्रिटेन में उच्चायुक्त थे। उस समय सेना को 200 जीप की जरूरत थी। ब्रिटेन से उसे खरीदा जाना था। इसका जिम्मा कृष्ण मेनन को सौंपा गया। उन्होंने सारे नियम-कानून को दरकिनार करके सौदा किया। 200 के बजाए 155 जीप ही भारत आई। लिहाजा जांच की मांग उठी। सरकार ने उच्च स्तरीय समिति का गठन किया। समिति ने आरोपों को सही पाया। मतलब जीप की खरीद में घोटाला हुआ था। लेकिन सरकार ने इस मामले की जांच करने के बजाए केस को ही बंद कर दिया। हद तो तब हो गई जब भ्रष्टाचार के आरोप में फंसे कृष्ण मेनन को पंडित नेहरू ने रक्षा मंत्री बना दिया। यह जो परिपाटी पंडित नेहरू ने आरंभ की, कांग्रेस ने उसे आत्मसात कर लिया। इसी लीक पर आगे बढ़ी और ‘बोफोर्स’ हो गया।
‘बोफोर्स तोप’ बनाने वाली स्वीडन की कंपनी है। राजीव गांधी के शासन में बोफोर्स तोप खरीदने का निर्णय हुआ। बाद में पता चला कि इस सौदे में पैसा का लेन-देन हुआ है। आरोप राजीव गांधी पर लगा। पैसा राजीव गांधी के पारिवारिक क्वात्रोची ने खाया था। दावा किया जाता है कि उसका एक हिस्सा गांधी परिवार को मिला था। तब इसे लेकर स्वीडन सरकार ने भी जांच की थी। उसने पाया कि बोफोर्स सौदे में हेराफेरी हुई है। वह रिपोर्ट भारत सरकार को भी भेजी गई थी। पर राजीव गांधी ने उसे मानने से इनकार कर दिया। उन्हें सलाह दी गई कि वे सौदा रद्द कर दें, पर वे इसके लिए भी तैयार नहीं हुए। सीबीआई ने बोफोर्स घोटाले की जांच शुरू की।

राजीव गांधी, हिन्दुजा बंधु और क्वात्रोची समेत कई लोगों को आरोपी बनाया। क्वात्रोची के खिलाफ रेड कार्नर नोटिस जारी हुआ। सीबीआई ने उसके खिलाफ तथ्य जुटाए। पर सप्रंग सरकार ने सीबीआई के हाथ बांध दिए। क्वात्रोची भारत न आए, सरकार ने हर कोशिश की। सीबीआई को उसके खिलाफ मुकदमा तक दायर करने की इजाजत नहीं दी गई। अलबत्ता सरकार उसकी मदद करने लगी। क्वात्रोची के लंदन में सीज खातों को खुलवाने के लिए सरकार ने सरकारी वकील को ब्रिटेन तक भेजा। अर्जेंटाना से क्वात्रोची का प्रत्यपर्ण तक सप्रंग सरकार ने नहीं होने दिया। यह मामला अभी तक कोर्ट में लंबित है।

कमोवेश यही हाल ‘अगस्ता वेस्टलैंड’ को लेकर भी रहा। यह वीवीआईपी हेलीकॉप्टर है। 12 चॉपर खरीदने का सौदा 3600 करोड़ रुपये में हुआ था। इसके लिए क्रिश्चिन मिशेल ने बिचौलिए की भूमिका निभाई थी। यह रक्षा सौदे का बड़ा दलाल है। इसकी कोशिश से ही सौदा हुआ था। आरोप है कि मिशेल ने अगस्ता के पक्ष में सौदा कराने के लिए सेना के कई अधिकारियों और राजनेताओं को रिश्वत दी थी। दावा तो यह भी किया जाता है कि गांधी परिवार से इस दलाल के गहरे संबंध है। इसके पिता भी रक्षा सौदे में बिचौलिए का काम करते थे। इंदिरा गांधी के वे मित्र थे। गांधी से वह जान पहचान क्रिश्चिन को विरासत में मिली। संदेह है कि उसी संबंध की वजह से वह अगस्ता सौदा कराने में सफल रहा। जब सौदे की बात चल रही थी, तब और हेलीकॉप्टर निर्माता भी लगे थे।

पर बाजी क्रिश्चिन ने मारी और 3600 करोड़ रुपये का अगस्ता सौदा हो गया। बाद में यह बात सामने आई की, इसमें 362 करोड़ रुपये बतौर रिश्वत बंटा था। इस वजह से सौदा खटाई में पड़ गया। तत्कालीन रक्षामंत्री एके एंटनी ने अगस्ता सौदा रद्द कर दिया। हेलीकॉप्टर घोटाले की जांच होने लगी। कई राजनेताओं का नाम सामने आया। सौदे में बतौर बिचौलिया तीन लोगों की पहचान हुई। पता चला कि उनमें क्रिश्चिन मिशेल की भूमिका सबसे अहम है। बावजूद इसके सप्रंग सरकार जांच के नाम पर बस लीपापोती करती रही। इससे अलग किस्सा ‘पिलाटस घोटाले’ का का नहीं है। हुआ यह था कि वायुसेना के लिए प्रशिक्षण विमान की जरूरत थी। तय हुआ कि आधा विमान विदेश से खरीदा जाएगा और बाकी हिन्दुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड बनाएगा। निविदा मगांई गई। कई कंपनी ने निविदा भरी। उसमें स्वीट्जरलैंड की पिलाटस कंपनी भी शामिल थी। उसने निविदा भी ठीक से नहीं भरी थी। इसकी शिकायत दक्षिण कोरिया की कंपनी ने की थी। पर तत्कालीन सप्रंग सरकार ने उस शिकायत पर ध्यान नहीं दिया।

उसने तमाम प्रक्रियागत गड़बड़ी होने के बाद भी प्रशिक्षण विमान का सौदा पिलाटस से किया। आरोप है कि उसमें बिचौलिए की भूमिका में राबर्ट वाड्रा और संजय भंडारी थे। इसकी भी जांच चल रही है। इन सबके अलावा भी कई घोटाले हुए है। 2012 में तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वीके. सिंह ने टाट्रा ट्रक घोटाले का खुलासा किया। उनÞका दावा था कि 2010 में सेना के एक अधिकारी ने टाट्रा को मंजूरी दिलाने के लिए 14 करोड़ रुपये की रिश्वत ली थी। कुछ इसी तरह का नेवल वार रुम केस भी है।

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