भूमाफियाओं के खेल में केजरीवाल सरकार

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उपलब्ध दस्तावेजों की मानें तो केजरीवाल सरकार गांव की जमीन हथियाने में लगी है। इसके लिए वह सरकारी तंत्र का दुरुपयोग कर रही है। खेती योग्य जमीन को जबरदस्ती ग्राम सभा की जमीन घोषित करने में लगी है और ग्राम सभा की जमीन भूमाफिया को सुपुर्द कर रही है। उन लोगों ने जमीन के चारों ओर चारदीवारी खड़ी कर रखी है।

मजदूरों को लूटने वाली ‘ईमानदार’ सरकार किसानों के साथ ‘बेईमानी’ कर रही है। उसकी नजर करोड़ों रुपये की जमीन पर है जो ग्राम सभा और खेतिहर किसानों की है। सरकार उसे हथियाने के लिए हर नाजायज हथकंडे अपना रही है। सुनने में एकबारगी अटपटा लगेगा। पर आरोप यही है। दस्तावेज खुद बोल रहे हैं कि केजरीवाल सरकार गांव की जमीन हथियाने में लगी है। इसके लिए वह सरकारी तंत्र का दुरुपयोग कर रही है। खेती योग्य जमीन को जबरदस्ती ग्राम सभा की जमीन घोषित करने में लगी है और ग्राम सभा की जमीन भूमाफियाओं के सुपुर्द कर रही है। उन लोगों ने जमीन के चारों ओर चारदीवारी खड़ी कर रखी हैं। सेंट जेवियर स्कूल और महावीर चौक के आसपास इस तरह का कब्जा देखा जा सकता है। महादेव चौक के पास तो जमीन को बेचने का काम भी चल रहा है।

उसके लिए एजेंटों ने दुकान भी खोल रखी है। यह खेल साहबाद दौलतपुर और प्रहलादपुर गांव में चल रहा है जो रिठाला और बादली मेट्रो स्टेशन के बीच में हैं। इलाका बवाना विधान सभा में आता है। इसके एक ओर रोहिणी और दिल्ली विकास प्राधिकरण के आवासीय परिसर हैं तो दूसरी ओर दिल्ली तकनीकी विश्वविद्यालय और बवाना औद्योगिक क्षेत्र है। इस वजह से इलाके का विकास बहुत तेजी से हो रहा है। जमीन के नाम पर यहां या तो ग्राम सभा की जमीन है या फिर खेतिहर भूमि। उसी पर यहां आवासीय परिसर और अन्य गतिविधियां हो रही है। यही कारण है कि जमीन की मांग बढ़ रही है। इसलिए यहां सर्किल रेट भी काफी बढ़ गया है। मौजूदा समय में यह तकरीबन 20 हजार रुपये वर्ग फीट है। यहां चल रहे विकास की वजह से कीमत तेजी से बढ़ने की संभावना है।

पहली तस्वीर साहबाद दौलतपुर गांव की है। जमीन ग्राम सभा की है। इस पर जो निर्माण का काम चल रहा है वह ग्राम सभा नहीं कर रही है। यह काम तो भूमाफिया कर रहे हैं। सरकार की सहमति से। ताज्जुब होगा। पर सच यही है। जो लोग इसमें बाधा पैदा कर रहे हैं, उन्हें परेशान किया जा रहा है।

जमीन भी सैकड़ों एकड़ के आसपास है। इसलिए भूमाफिया उस पर कब्जा कर रहे हैं। सरकार उन्हें संरक्षण दे रही है। यह सब बहुत संगठित तरीके से चल रहा है। पहला काम कब्जे को वैध बनाने का है। उसके लिए मूलभूत सुविधा मसलन सीवर, पानी और बिजली की व्यवस्था केजरीवाल सरकार कर रही है। दूसरा किसी भी तरह से तीन साल बिताना है। इन दोनों को लेकर सरकार बहुत गंभीर है। इसलिए कोई आवाज न उठा पाए, उसकी पूरी व्यवस्था की गई है। अगर कोई अधिकारी सरकारी कब्जा अभियान में अड़ंगा डालने की कोशिश करता है तो उसका तबादला कर दिया जाता है। इसलिए अधिकारी खामोश हैं। कुछ एक सामाजिक कार्यकर्ता सक्रिय हैं। पर उन्हें भी चुप कराने का बंदोबस्त किया गया है। यदि किसी कार्यकर्ता के पास खेती योग्य जमीन है तो उसे जबरदस्ती ग्राम सभा की जमीन घोषित कर दिया जाता है।

अगर फिर भी वह नहीं मानता तो उसे पद और पैसे का प्रलोभन दिया जाता है। जो इस पर भी चुप नहीं बैठता है उसे सरकारी गुंडे डराते-धमकाते हैं। कोशिश बस इतनी भर होती है कि सरकारी कब्जा अभियान पर कोई मुंह न खोले और सरकार अपना काम करती रहे। यही हो भी रहा है। इस सरकारी कब्जे के बारे में किसी को कानोंकान खबर तक नहीं है।
एक दैनिक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक दिल्ली देहात की 1000 एकड़ जमीन पर भूमाफियाओं का कब्जा है। यह दिल्ली सरकार का आंकड़ा है जो उसने एक आरटीआई के जवाब में दिया था। उस 1000 एकड़ में साहबाद दौलतपुर और प्रहलादपुर गांव की जमीन का जिक्र नहीं है। वह भी तब जबकि तकरीबन 100 एकड़ जमीन पर कब्जा है। इसमें ज्यादातर वे जमीने हैं जिन पर ग्राम सभा का अधिकार है। इन पर कब्जा करना संगीन जुर्म है।

इस बाबत सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में आदेश भी दिया था। बावजूद इसके केजरीवाल सरकार यहां हुए अवैध कब्जे को अवैध नहीं मानती है। यही वजह है कि दिल्ली देहात के अन्य इलाकों के विपरीत, यहां पर अवैध कब्जे को लेकर कोई सरकारी अभियान नहीं चल रहा है। खबर के मुताबिक दक्षिणी दिल्ली देहात में अगस्त और सितंबर में सरकार ने अवैध कब्जे को लेकर मुहिम छेड़ी थी। उस दौरान कई सौ एकड़ जमीन को कब्जे से मुक्त कराया गया था। पर उस अभियान से साहबाद दौलतपुर और प्रहलादपुर गांव अछूता रहा। जाहिर है कि केजरीवाल सरकार यहां के अवैध कब्जे को हटाने के पक्ष में नहीं है। वह इसे संरक्षण दे रही है। यही वजह है कि अधिकारी भी कान में तेल डालकर और आंख पर पट्टी बांध कर बैठे हैं। वे न तो कुछ सुन रहे हैं और न देख रहे हैं। इसका कारण केजरीवाल सरकार का फरमान है जिसमें कहा गया है कि इस इलाके के भूमाफिया को कोई हाथ नहीं लगाएगा। यह फरमान लिखित नहीं है। लेकिन जिस तरह के दस्तावेज मौजूद हैं, यही बताते हैं।

दूसरी तस्वीर प्रहलादपुर गांव की है। यहां पर भूमाफिया का कब्जा जारी है। जैसा तस्वीर से साफ है कि चारदीवारी खड़ी की जा रही है। यह कब्जा बनाए रखने के लिए हो रहा है।

तीसरी तस्वीर साहबाद दौलतपुर गांव के तलाब की है। यह महादेव चौक से तकरीबन 100 मीटर की दूरी पर मौजूद है। इसके चारों ओर कब्जा अभियान चल रहा है।

यह किस्सा 2016 में शुरू हुआ है। इस इलाके में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता मीना डबास ने दोनों गांवों में चल रहे अवैध कब्जे के खिलाफ आवाज उठाई। वे भूख हड़ताल पर बैठ गर्इं। जगह थी उपायुक्त का कार्यालय। उनके इस आंदोलन को काफी समर्थन मिला। खुद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने समर्थन किया। मीना डबास कहती हैं कि इससे मेरा उत्साह काफी बढ़ गया। मैंने आंदोलन को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। लिहाजा उन्होंने इस बाबत 8 सितंबर 2016 को जिलाधिकारी के पास शिकायत भेजी। इसका संज्ञान लिया गया।

कोई दो महीने बाद खंड विकास अधिकारी ने एक नोटिस जारी किया। उसमें कब्जाधारियों से कहा गया कि वे सात दिनों के अंदर स्वयं हट जाएं। अगर वे नहीं हटेंगे तो सात दिन बाद प्रशासन कार्रवाई करेगा। यह आदेश जारी होने के बाद भी प्रशासन ने कोई कदम नहीं उठाया। कब्जा जस का तस बना रहा। मीना डबास कहती हैं ‘प्रशासन का यह रवैया हैरान करने वाला था।’ ताज्जुब हो रहा था कि जो लोग भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की उपज हैं, वे लोग भ्रष्टाचार को संरक्षण कैसे दे सकते हैं। मुझे यकीन नहीं हो रहा था। लिहाजा मैंने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पत्र लिखने का निर्णय लिया। उसी के तहत मीना डबास ने 3 फरवरी 2017 को पत्र लिखा। वे लिखती हैं…

उत्तरी दिल्ली के साहबाद दौलतपुर गांव की ग्राम सभा की खाली पड़ी जमीन पर पिछले करीब तीन चार महीने से खुलेआम अवैध कब्जा किया जा रहा है। मैंने एस.डी.एम, नरेला, एस.डी.एम, अलीपुर, उत्तरी जिला से कई बार इसकी शिकायत की है। करीब 3-4 माह पहले साहबाद दौलतपुर गांव की ग्राम सभा की बेशकीमती जमीन जो एक तरफ से रोहिणी सेक्टर -11 से तथा दूसरी तरफ से सैंट जेवियर्स स्कूल साहबाद दौलतपुर से सटी हुई है। पर क्षेत्र में काबिज भू-माफिया ने रातोंरात चारदीवारी कर कब्जा कर लिया। मैं इस संबंध में लगातार एस.डी.एम को लिखित व मौखिक शिकायत कर रही हूं कि इस अवैध कब्जे को तुरंत प्रभाव से हटाया जाए तथा दोषी लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया जाए। लेकिन 3-4 माह से एस.डी.एम और डी.एम सिर्फ आश्वासन दिये जा रहे हैं और कोई कार्यवाही नहीं कर रहे।…..

उन्होंने उनसे कार्रवाई करने की मांग की। पर केजरीवाल सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। 2017 से 2018 आ गया। लेकिन सरकार ने मसले को गंभीरता से नहीं लिया। वह टस से मस नहीं हुई। अगर केजरीवाल सरकार भूमाफियाओं को संरक्षण नहीं दे रही होती तो कार्रवाई करती। दिलचस्प बात यह है कि जिस अधिकारी ने कार्रवाई करने की कोशिश की, उसे सरकार ने सबक सिखाया। उसका तब्दाला कर दिया गया। लेकिन फिर भी मीना डबास ने कोई जल्दबाजी नहीं की। वे सालभर सरकारी कार्रवाई का इंतजार करती रहीं। वजह, वे भी ‘ईमानदार सरकार’ से खासा प्रभावित थी। तथाकथित ‘ईमानदारी’ का जो स्वांग रचा गया था उसके झांसे में वह भी आ गई थीं। वे कहती हैं ‘पत्र लिखते समय हमें पूरा भरोसा था कि अरविंद केजरीवाल इसका संज्ञान लेगे और उस पर कार्रवाई जरूर करेंगे।’ लेकिन जैसे-जैसे समय बीतने लगा और ग्राम सभा की जमीन पर कब्जा बढ़ने लगा, वैसे-वैसे मेरा धैर्य जवाब देने लगा। मीना आगे कहती हैं ‘यकीन नहीं हो रहा था कि लोकपाल आंदोलन से जन्मी सरकार भ्रष्टाचारियों को संरक्षण दे रही है।’ वे कहती हैं कि पर मैं इस सच से मुंह भी नहीं फेर पा रही थी। दुविधा में फंसी मीना डबास चुप नहीं बैठीं। केजरीवाल सरकार से हुई निराशा ने उन्हें और जुझारू बना दिया। उन्होंने तय कर लिया कि भूमाफिया को इलाके से उखाड़ फेंकना है। इसलिए वे न खुद चैन से बैठीं और न सरकार को बैठने दिया।

लिहाजा जब उन्होंने देखा कि केजरीवाल सरकार हरकत में नहीं आ रही है तो एक पत्र और भेज दिया। वह 14 फरवरी 2018 को लिखा। यह पत्र उन्होंने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भेजा। वह ऐतिहासिक पत्र है। उसमें मीना डबास ने केजरीवाल और सरकार की कलई खोल कर रख दी। वे लिखती हैं… आपने बिजली के खंभे पर चढ़कर जो मिसाल कायम की थी, उससे हमें बड़ी प्ररेणा मिली थी। अब उसी का सहारा है। लगता है अवैध कब्जा उसी तर्ज पर हम लोगों को खुद हटाना पड़ेगा।… इतना कह कर मीना डबास चुप नहीं होतीं। वे आगे कहती हैं…. आप भ्रष्टाचार मिटाने का वादा करते हैं और किसानों के जीवन में खुशहाली लाने की बात करते हैं। पर असलियत में आपकी सरकार आंख मूंद कर सो रही है। दिल्ली देहात का किसान अपनी जमीन को लेकर संघर्ष कर रहा है। कानूनी पचड़ों में फंसाकर सरकार उनका शोषण कर रही है और आपकी सरकार खामोश है। वह अरविंद केजरीवाल से सवाल करती हैं कि क्या यही ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ’ सरकार की लड़ाई है?

इस पत्र के बाद भी केजरीवाल सरकार होश में नहीं आई। उसने शिकायत को एक बार फिर कूड़ेदान में फेंक दिया और किसानों को भूमाफिया की दया पर छोड़ दिया। मीना डबास को पता था कि सरकार यही करेगी। इसलिए वे अगले कदम के लिए तैयार थीं। उन्होंने शिकायत करने के बाद हμताभर इंतजार किया और उसके बाद राजस्व मंत्री कैलाश गहलोत के पास पहुंच गईं। उन्होंने कैलाश गहलोत को साहबाद दौलतपुर और प्रहलादपुर गांव में चल रहे, अवैध कब्जे के बारे में बताया। कैलाश गहलोत ने शिकायत का तुरंत संज्ञान लिया। प्रशासन को आदेश दिया कि वह 24 घंटे में शिकायत पर कार्रवाई करें। पर कैलाश गहलोत ने ‘खेल’ कर दिया।

शिकायत पर कार्रवाई करने के बजाए शिकायतकर्ता को ही प्रलोभन देने लगे। वे भ्रमवश यह समझते थे कि मीना डबास उस प्रलोभन में आ जाएंगी और भूमाफियाओं के खिलाफ आवाज उठाना बंद कर देंगी। पर मीना तैयार नहीं हुर्इं। वे अपनी शिकायत पर कायम रहीं। उन्होंने अरविंद केजरीवाल सरकार के सभी प्रलोभनों को ठुकरा दिया और भूमाफिया के खिलाफ संघर्ष को तेज कर दिया। लेकिन इस अभियान में उन्हें एक बात खटक रही थी, वह यह कि सरकार उनका मुंह क्यों बंद कराना चाहती है? वे तो जायज शिकायत कर रही हैं। वे इसका पता लगाने लगीं। पड़ताल में पता चला कि केजरीवाल सरकार खुद जमीन कब्जा करने में लगी है। उसे जो जमीन पसंद आती है, उस पर 20 सूत्री कार्यक्रम का बोर्ड खड़ा कर देती हैं। यह योजना ग्रामीण विकास के लिए चलाई जा रही है। अवैध कब्जे को वैध करने के लिए नहीं। पर केजरीवाल सरकार इस योजना का प्रयोग कब्जे को वैध करने में कर रही है। इसमें ग्राम सभा की जमीन और कृषि भूमि दोनों शामिल हैं। सरकार कब्जा करती है औरÞ उसे अपने एजेंटों को सौंप देती है। साहबाद दौलतपुर गांव में मौजूद सेंट जेवियर स्कूल के पास मौजूद ग्राम सभा की जमीन इसका प्रमाण है।

यहां पर एक सरकारी बोर्ड लगा हुआ है। जो यह बताता है कि जमीन पर कब्जा 20 सूत्री कार्यक्रम के तहत हुआ है। लेकिन जब केजरीवाल सरकार से आरटीआई के जरिए उस इलाके में 20 सूत्री कार्यक्रम के मातहत आने वाली जमीन का ब्यौरा मांगा गया तब उसकी पोल खुली। जवाब में लिखा है कि वह जमीन 20 सूत्री कार्यक्रम का हिस्सा नहीं है। तब सवाल उठता है कि फिर वहां बोर्ड कैसे लगा? जाहिर है सरकार की रजामंदी से लगा है ताकि उस पर कब्जा किया जा सके। अगर ऐसा नहीं होता तो शिकायत पर केजरीवाल सरकार गौर करती और उसे हटाने के लिए मुहिम चलाती। जैसा कि दक्षिणी दिल्ली के देहात में चलाया गया। पर यहां उस तरह की मुहिम चलाने से केजरीवाल सरकार परहेज कर रही है। जाहिर है कि सरकार भूमि घोटाले में लगी है।

 

 

 

राजस्व मंत्री कैलाश गहलोत को दी गई
शिकायत की कॉपी।

 

 

 

 

 

 

 

 

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भेजी गई
शिकायत की प्रति।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

वह नोटिस है जिसमें अवैध कब्जा हटाने का
आदेश जारी किया गया था। इससे जाहिर है कि
गांव में हुआ कब्जा अवैध है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

सूचना के अधिकार के तहत आया जवाब।

 

 

 

 

 

दिल्ली देहात की बनीं आवाज

दिल्ली देहात में किसानों और गरीबों की आवाज हैं, मीना डबास। उनकी वजह से ही केजरीवाल सरकार के भूमि घोटाले का पर्दाफाश हुआ। वे उसी अन्ना आंदोलन की उपज हैं जिससे केजरीवाल सरकार निकले हैं। इसलिए सरकार के रवैये से आहत भी हैं। उन्हें आशा थी कि दिल्ली देहात के साथ न्याय होगा। पर सरकार ऐसा कर नहीं रही। वह गांव वालों की जमीन हथियाने में लगी है। लिहाजा उन्होंने केजरीवाल सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया। यह स्वभाव, उन्हें विरासत में मिला है। उनके दादा चौधरी टेकचन्द डबास और पिता देवानंद डबास सामाजिक कार्यकर्ता रहे हैं। उनके पिता देवानंद डबास ने दिल्ली देहात की समस्या को दूर करने के लिए ‘दिल्ली देहात विकास मंच’ नामक संस्था भी बनाई थी। इसमें वह भी सक्रिय रहती थीं। पिता की तरह दिल्ली देहात की खासा चिंता करती थीं। यही वजह रही कि जब वे अदिति कॉलेज में पढ़ने के लिए गर्इं तो कॉलेज के छात्रसंघ को दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ से जोड़ने के लिए आंदोलन चलाया। वे इसमें सफल भी रहीं। इसी तरह उन्होंने भगनी निवेदिता कॉलेज को दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध कराने के लिए भी आंदोलन छेड़ा था। उनका आंदोलन रंग लाया। दिल्ली देहात के विकास को लेकर इस तरह का आंदोलन मीना चलाती रही हैं। मौजूदा समय उन्होंने भूमाफिया के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है।

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