बहानेबाज ‘बहनजी’

कौन ऐसी पार्टी है, जिसका अध्यक्ष चुनाव मैदान में सेनापति की भूमिका निभाने के लिए स्वयं उम्मीदवार नहीं है? जिसे प्रधानमंत्री की दावेदारी में दिखना है वह स्वयं चुनाव न लड़े, यह तो चुनावी ‘महाभारत’ के कुरूक्षेत्र से भाग खड़े होने जैसा है।

कांशीराम के जीवनकाल में मायावती को दलित अपना समाधान मानते थे। आज वे उन्हें बड़ा सवाल समझने लगे हैं। 2012 से ही मायावती पर सवाल उठने लगे। दलितों को अब तक उनका जवाब नहीं मिल पाया है। इसलिए मायावती का नाम ही एक बड़ा सवाल हो गया है। ऐसा नहीं है कि उन पर कभी कोई सवाल नहीं था। वह था। लेकिन तब कांशीराम का ‘कल्पवृक्ष’ दलितों को एक आश्वासन देता था। जो चाहो, वह मिलेगा। कांशीराम की छत्रछाया हटने से मायावती बसपा की सुप्रीमो तो हो गईं लेकिन वे सवालों के घेरे में भी आ गईं।
कांशीराम के निधन से ही मायावती पर हमेशा कोई न कोई सवाल बना ही रहता है। कभी पुराने सवाल होते हैं तो कभी नए। इस समय वे स्वयं गंभीर और बड़ा सवाल बन गई हैं। क्यों? सपा-बसपा से गठजोड़ का जिस दिन एलान हुआ, उस दिन मायावती ने संकेत दिया कि वे स्वयं लोकसभा का चुनाव लड़ेंगी। एक पत्रकार ने उनसे पूछा था कि वे कहां से इस बार चुनाव लड़ेंगी? उनका जवाब था कि जल्दी ही आपको पता चल जाएगा। इसे सकारात्मक सूचना समझ कर मायावती के समर्थकों ने यह अर्थ निकाला कि वे अपने लिए एक क्षेत्र चुनेंगी। खबरें चलने लगीं। अटकलें लगाई जाने लगीं। ज्यादातर खबरें जो छपीं, उनमें अटकल थी कि वे अपनी पुरानी सीट से चुनाव लड़ने की जल्दी ही घोषणा कर देंगी। ऐसा हो जाता तो सवाल यह होता कि क्या मायावती चुनाव जीतेंगी? अगर जीतेंगी तो क्या रिकार्ड बनाएंगी? अगर नहीं जीततीं या कम वोटों से जीत पातीं तो उसका संदेश क्या जाएगा? ये सवाल अपनी जगह तब होते, जब वे अपने लिए अकबरपुर लोकसभा क्षेत्र या दूसरा कोई क्षेत्र चुनतीं।

सिर्फ बसपा समर्थकों की ही बात नहीं है। जो भी इस चुनाव का दर्र्शक और भागीदार है, वह मानता है कि मायावती का फैसला बहानेबाजी है। 23 मार्च को हिन्दू अखबार ने एक संपादकीय लिखा। उसका शीर्षक है-‘मायावती का नानुकर’। अखबार ने उनके परस्पर विरोधी बयानों के आधार पर अनेक सवाल उठाए।

अब बिल्कुल नया सवाल खड़ा हो गया है। जो मायावती की उस घोषणा से पैदा हुआ है, जिसे उन्होंने 20 मार्च को की। उन्होंने अचानक यह घोषणा कर दी कि वे 2019 के लोकसभा चुनाव में स्वयं कहीं से भी चुनाव नहीं लड़ने जा रही हैं। इससे बसपा में मायूसी छा गई। क्या ‘बहनजी’ इससे अनजान हैं? ऐसा लगता नहीं है। अगर ऐसा होता तो उन्हें बहानेबाजी या सफाई नहीं देनी पड़ती। बसपा में जो मनोवैज्ञानिक पराजय का भाव पैदा हुआ, उसकी शीतलहर चुनावी गर्मी के बावजूद ‘बहनजी’ को भी छू गई। उनमें भी कंपकंपी आई। मजबूरन उन्हें सफाई देनी पड़ी। अपने समर्थकों को संदेश दिया कि वे बड़े लक्ष्य के लिए ‘त्याग’ कर रहीं हैं।

बड़े लक्ष्य को पाने के लिए उनका यह ‘त्याग’ ही नया सवाल पैदा करता है। पहला यह कि क्या उनके स्पष्टीकरण से भरोसा पैदा हुआ है? क्या उनमें वह आत्मविश्वास नहीं बचा है जो उन्हें लोकसभा का चुनाव लड़ने का बल दे? ऐसे सवालों की लंबी शृंखला है। सच यह है कि चुनाव मैदान से मायावती ने मुंह चुरा लिया है। वे हीलाहवाली कर रही हैं। पहले यह समझ लेना चाहिए कि मायावती ने जो स्पष्टीकरण दिया वह क्या है? उन्होंने दूसरे नेताओं की शैैली अपनाई। ट्वीट का सहारा लिया। जो ट्वीट किया वह यह है-‘मैं जब उत्तर प्रदेश की 1995 में पहली बार मुख्यमंत्री बनी, उस समय न तो मैं एमएलए थी और न एमएलसी। उसी तरह केंद्र में भी कोई व्यक्ति अगर प्रधानमंत्री बनता है तो उसे छह महीने में लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य बनना होता है।’ उनके इस संदेश का सीधा मतलब है कि वे अपने समर्थकों की निराशा को दूर कर कहना चाहती हैं कि प्रधानमंत्री पद पाने पर वे कहीं से भी चुनाव जीत सकती हैं। उनके लिए बसपा का कोई भी सदस्य अपनी सीट छोड़ देगा। उनका यह तर्क किसी के भी गले नहीं उतर रहा है। इसके कई कारण हैं। जिन दिनों का वे जिक्र कर रही हैं, उन दिनों कांशीराम बसपा के सुप्रीमो होते थे। अपने परिश्रम और सूझबूझ से उन्होंने अंबेडकर की डगर को राजमार्ग बनाया। दलित संगठनों को सांस्कृतिक स्वभाव देकर राजनीति के लिए बहुजन की राह चुनी। जिसका परिणाम भी दिखने लगा।

 

कांशीराम के निधन से ही मायावती पर हमेशाा कोई न कोई सवाल बना ही रहता है। कभी पुराने सवाल होते हैं तो कभी नए। इस समय वे स्वयं गंभीर और बड़ा सवाल बन गई हैं। क्यों? सपा-बसपा से गठजोड़ का जिस दिन एलान हुआ, उस दिन मायावती ने संकेत दिया कि वे स्वयं लोकसभा का चुनाव लड़ेंगी।

लेकिन कांशीराम की राह आसान नहीं थी। संघर्ष और संकट के उतार-चढ़ाव से वे गुजरे थे। बामसेफ और डीएस-4 के जरिए जब उन्होंने एक देशव्यापी मिशन बनाने में सफलता प्राप्त की, तब बहुजन समाज पार्टी बनाई। उन दिनों उन्होंने स्वयं भी और मायावती को भी लोकसभा के उपचुनाव और चुनाव को अवसर मान कर चुनाव लड़े। उनका कहना था कि इसी तरीके से मिशन आगे बढ़ेगा। पहली बार मायावती 1989 में लोकसभा पहुंचीं थीं। लेकिन उससे पहले अनेक उपचुनाव लड़ीं और हारीं। जैसे बिजनौर और हरिद्वार। आखिरी बार 2004 में वे अकबरपुर से चुनाव लड़ीं थीं और जीतीं थीं।
यहां यह याद करना चाहिए कि 2003 में कांशीराम बीमार पड़े। उससे दो साल पहले उन्होंने मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। जिससे 2003 में मायावती बसपा की अध्यक्ष बन सकीं। तब नारा लगा था- ‘कांशीराम का मिशन अधूरा, करेंगी बहन मायावती पूरा’। दूसरा नारा था-‘बहनजी तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं’। इन दो नारों में कांशीराम का मिशन आ गया है। बसपा के लोग इन्हीं दो नारों का वास्ता देकर मायावती से पूछ रहे हैं कि वह मिशन कहां गया? कौन ऐसी पार्टी है, जिसका अध्यक्ष चुनाव मैदान में सेनापति की भूमिका निभाने के लिए स्वयं उम्मीदवार नहीं है? जिसे प्रधानमंत्री की दावेदारी में दिखना है वह स्वयं चुनाव न लड़े, यह तो चुनावी ‘महाभारत’ के कुरूक्षेत्र से भाग खड़े होने जैसा है।
वैसे, मायावती की राजनीति में ऐसे अनेक मोड़ हैं, जहां उनके समर्थक हैरान होते रहे हैं। मायावती का दावा अगर सच है तो वे इसलिए चुनाव नहीं लड़ रहीं हैं, क्योंकि चुनाव अभियान प्रभावित होगा। उनके क्षेत्र में बसपा के कार्यकर्ता उन्हें जिताने के लिए जगह-जगह से आएंगे और इससे दूसरे क्षेत्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इसलिए उनका कहना है कि ‘उत्तर प्रदेश की हर सीट हमारे लिए महत्वपूर्ण है। उसकी जीत-हार से बसपा का आंदोलन प्रभावित होगा।’ उनका यह भी दावा है कि ‘लोकसभा का चुनाव न लड़ने का फैसला देशहित में है।’
मायावती के ये तर्क उनके समर्थक समझ नहीं पा रहे हैं। इसके दो बड़े कारण हैं। पहला कि सपा-बसपा के गठजोड़ से उनके समर्थकों ने यह अर्थ निकाला था कि ‘बहनजी’ प्रधानमंत्री पद की दावेदारी में आ गई हैं। इससे बसपा में उम्मीद की एक किरण फूटी थी। दूसरा कि उस उम्मीद को झुठलाते हुए मायावती ने लोकसभा चुनाव को पीठ दिखा दिया। इसलिए उनका निर्णय हर बसपाई को संदेह के गहरे गर्त में डाल चुका है। बसपा समर्थकों को याद है कि ऐसा ही फैसला उन्होंने 2014 में लिया था। जिसका परिणाम यह हुआ कि उत्तर प्रदेश में बसपा का खाता भी नहीं खुला। वैसे मायावती की महत्वाकांक्षा से सभी अवगत हैं। कौन नहीं जानता कि वे उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते 2009 के लोकसभा चुनाव से ही प्रधानमंत्री की दावेदारी में खुद को दिखाने के लिए लालायित रही हैं। राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखना एक बात है और यथार्थ का सामना करना बिल्कुल भिन्न और दूसरी बात है।
सिर्फ बसपा समर्थकों की ही बात नहीं है। जो भी इस चुनाव का दर्शक और भागीदार है, वह मानता है कि मायावती का फैसला बहानेबाजी है। 23 मार्च को हिन्दू अखबार ने एक संपादकीय लिखा। उसका शीर्षक है-‘मायावती का नानुकर’। अखबार ने उनके परस्पर विरोधी बयानों के आधार पर अनेक सवाल उठाए। जैसे यह कि मायावती कांग्रेस के मुकाबिल खुद को बता रही हैं, जबकि मुकाबला भाजपा से है। चुनौती भाजपा की है। मायावती को जो लोग इन दिनों देख-परख रहे हैं, वे मान रहे हैं कि दलित जनाधार उनसे दूर हो रहा है। बसपा को अपने जनाधार से नई चुनौतियां मिलने लगी हैं। मायावती के कांग्रेस संबंधी बयानों को भी इसी दृष्टि से देखा जा रहा है, क्योंकि प्रियंका गांधी वाड्रा ने उभरते दलित नेता चंद्रशेखर आजाद रावण से मुलाकात की। यह मामूली सी घटना मायावती पर मारक प्रहार है। इसे जितना मायावती जानती हैं, उससे ज्यादा वे लोग अनुभव कर रहे हैं, जिन्होंने कांशीराम के बनाए ‘मिशन नेताओं’ को बसपा से बिछुड़ते देखा है। ऐसे कांशीराम के मिशन वाले नेताओं की सूची बहुत लंबी है।

इसीलिए मायावती के ट्वीट पर बसपा में ही किसी को भरोसा नहीं हो रहा है। बसपा के सूत्र दूसरी बात बता रहे हैं। मायावती ने अकबरपुर सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ने का इरादा बनाया था। वहां खतरा दिखा। 15 साल पहले मायावती जहां से लोकसभा में पहुंची थीं, उस क्षेत्र का सामाजिक समीकरण पूरी तरह बदल गया है। वहां सपा-बसपा गठजोड़ के बावजूद जब मायावती ने सर्वे कराया तो पाया गया कि सपा का कोर वोट ‘बहनजी’ को शायद ही मिले। इसलिए मायावती ने दूसरी सीट के बारे में विचार किया। वह नगीना सुरक्षित सीट है। परिसीमन के बाद बिजनौर की नगीना सुरक्षित सीट हो गई है। इस प्रक्रिया में बिजनौर का आधा से ज्यादा हिस्सा नगीना में आ गया है। 15 लाख वोटर वाले नगीना लोकसभा क्षेत्र में अनुसूचित जातियों के अलावा चार लाख से ज्यादा मुस्लिम मतदाता हैं। जहां से 2014 में भाजपा का उम्मीदवार जीता था। मुस्लिम मतदाताओं पर मायावती को भरोसा नहीं है। इसलिए वे जहां से पहली बार लोकसभा का चुनाव जीत सकी थीं, वहां से भी चुनाव मैदान में उतरने का साहस नहीं दिखा सकीं। इस तरह दो लोकसभा क्षेत्रों की टोह लेने के बाद मायावती ने यही अधिक सुविधाजनक समझा कि चुनाव न लड़ने में ही भलाई है। कम से कम वे यह तो कह सकती हैं कि गठजोड़ को जिताने के लिए वे यह बड़ा ‘त्याग’ कर रही हैं।

बसपा के एक पूर्व कबीना मंत्री ने एक ऐसी बात बताई, जिसका राजनीतिक महत्व है लेकिन उसे समझा नहीं गया। उसकी अनदेखी की गई है। वह बात मायावती के एक बयान से जुड़ी हुई है। नगीना लोकसभा क्षेत्र की टोह लेने के ही दिनों में मायावती ने एक बयान दिया। उस बयान में कहा कि वे मुलायम सिंह के लोकसभा क्षेत्र में चुनाव प्रचार करने के लिए जाएंगी। इस बयान के दो निहितार्थ थे। एक कि मायावती ने अपने साथ 1995 में हुए हादसे को मन से निकाल दिया है। उसे भुला दिया है। दूसरा निहितार्थ यह था कि मुलायम सिंह उनके इस नए रूपांतरित भाव का बढ़-चढ़ कर स्वागत करेंगे। इससे मुस्लिम मतदाता नगीना लोकसभा क्षेत्र में उन्हें अपना लेंगे। राजनीति के धुरंधर मुलायम सिंह ने मायावती के बयान को वैसा महत्व नहीं दिया जैसा वह चाहती थीं। मुलायम सिंह ने चुप्पी साध ली। मानों मायावती के प्रचार का उनके लिए कोई खास अहमियत नहीं है। यह भी मायावती को भारी झटका था। इसका एक परिणाम तत्काल हुआ। उन्होंने नगीना लोकसभा क्षेत्र से भी चुनाव लड़ने का इरादा छोड़ दिया।

जहां से वे पहली बार लड़ीं। जीतकर लोकसभा पहुंचीं। जहां से आखिरी बार लड़ीं और जीत सकीं, वे दोनों क्षेत्र मायावती के लिए असुरक्षित या यह कहें कि खतरनाक हो गए हैं। ‘बहनजी’ जानती हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में उनका दलित वोट बैंक विखर गया है। इसी पूंजी पर उनकी राजनीति का ‘साम्राज्य’ खड़ा हो रहा था। वह अब ‘आजाद’ हैं। उसी में ‘चंद्रशेखर आजाद’ पैदा हो गया है। जो खुद को रावण कहता है। मायावती ने यह समझा था कि 2014 का चुनाव मोदी लहर से उनके खिलाफ चला गया। उस लहर में बसपा ऐसी बही और बर्बाद हुई कि उसका लोकसभा में नामो निशान मिट गया। मायावती उससे उबरने का मन बना रही थीं। उन्होंने 2014 के चुनाव परिणाम के दिन ही बसपा के दिल्ली दμतर में घोषणा की कि ‘अब मैं लखनऊ में रहूंगी’। उसके अनुसार वे 19 मई, 2014 को लखनऊ पहुंचीं।
अपने घर को संभालने में जुट गईं। घर उनका है बसपा। 2012 के विधान सभा चुनाव हारने के बाद लोकसभा के 2014 चुनाव में जो बसपा का सफाया हुआ, उसे वे 2017 के विधान सभा चुनाव में वापसी का सपना देख रही थीं। दांव बड़ा था। मायावती को 2017 के विधान सभा चुनाव में जो हासिल हुआ, वह उन्हें भारी सदमा दे गया। जिससे उन पर अस्तित्व का संकट मंडराने लगा है। 2017 के विधान सभा चुनाव ने बसपा के दलित-मुस्लिम गठजोड़ को ध्वस्त कर दिया है। यही है अस्तित्व का संकट। इस संकट से उबरने के लिए मायावती को यह सूझा और याद आया कि सपा-बसपा का गठजोड़ शायद उन्हें बचा लेगा। सपा में पीढ़ी का परिवर्तन हो गया है। अखिलेश यादव और मायावती दोनों के राजनीतिक अस्तित्व पर आ पड़ी है। इसलिए 2019 के चुनाव में इनमें गठजोड़ तो हो गया है लेकिन परस्पर भरोसा नहीं है। अगर होता तो मायावती भी लोकसभा का चुनाव लड़तीं।

मायावती के जीवनीकार और पत्रकार अजय बोस इसे दूसरे तरह से देखते हैं। उनका कहना है कि अकबरपुर और नगीना में से कहीं से भी मायावती जीत सकती हैं। लेकिन थोड़े वोटों से जीतने पर उनका राजनीतिक कद छोटा हो जाएगा। इस कारण भी चुनाव न लड़ने की घोषणा की होगी। मायावती मंत्रिमंडल में मंत्री रहे और काशीराम के करीबी सहयोगी रहे बसपा के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि मायावती ने डर कर मैदान छोड़ दिया। वे दोनों जगहों से चुनाव हार सकती हैं। इसी आशंका से उन्होंने चुनाव न लड़ने की घोषणा की। इससे बसपा में वह उत्साह नहीं बचा है जो गठजोड़ से पैदा हुआ था। इसके विपरीत अखिलेश यादव ने उस क्षेत्र को अपने लिए चुना है जो मोदी लहर में भी सपा का गढ़ बना रहा। वे आजमगढ़ से चुनाव लड़ रहे हैं। बसपा सुप्रीमो का मैदान छोड़ना वैसा ही माना जा रहा है जैसे कि सेनापति के भाग जाने पर सैनिकों का होता है।

 

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