न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम

मुझे खुशी है कि राज्यसभा ने संविधान संशोधन विधेयक, 2019 पारित किया है। इस विधेयक को व्यापक समर्थन मिला। सदन ने एक जीवंत बहस भी देखी, जहां कई सदस्यों ने अपनी राय व्यक्त की। यह सामाजिक न्याय की जीत है। यह हमारे युवा शक्ति के लिए एक व्यापक कैनवास सुनिश्चित करता है ताकि वे अपने कौशल का प्रदर्शन कर सकें और भारत के परिवर्तन में योगदान कर सकें। हम अपने संविधान के निर्माताओं और महान स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जिन्होंने एक ऐसे भारत की कल्पना की, जो मजबूत और समावेशी हो।

संसद द्वारा पारित संविधान संशोधन (124वां) विधेयक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। इसके दूरगामी परिणाम होंगें जिन पर सामान्यत: अभी लोगों का ध्यान नहीं जा रहा है परंतु संपूर्ण राष्ट्र के प्रति सजग और चिंतित प्रबुद्ध जन इसके महत्व को भली-भांति समझ सकते हैं।
इसके एक महत्व का अंदाजा तो इस बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस की ओर से उसके एक प्रमुख प्रवक्ता आनंद शर्मा ने कहा कि ‘देश की 98 प्रतिशत आबादी के लिए 10 प्रतिशत का आरक्षण है’। इसमें थोड़ा आंकड़े की चूक है परंतु यह तथ्य है कि यह 10 प्रतिशत आरक्षण देश की 42.5 प्रतिशत आबादी में से 40 प्रतिशत लोगों के लिए है। इस दृष्टि से बहुत कम है।

वस्तुत: जातिवार जनगणना के आंकड़े अभी तक किन्ही कारणों से शासन ने प्रकाशित नहीं किये हैं। परन्तु राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (नेशनल सैंपल सर्वे और राष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सांख्यिकी विभाग (एनएचएफएस) जैसी सरकारी एजेंसियों ने एक राष्ट्रीय सर्वे द्वारा जातिवार जनगणना के आंकड़े प्रकाशित किये हैं जिनसे वर्गवार जनगणना का एक अनुमान संभव है। उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि वस्तुत: भारत में अनुसूचित जाति के लोगों की जनसंख्या लगभग 15 प्रतिशत है और अनुसूचित जनजाति के लोगों की जनसंख्या 7.50 प्रतिशत है जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जातियों की वास्तविक जनसंख्या अधिकतम 35 प्रतिशत है। इसका योग 57.50 प्रतिशत हुआ। अत: 42.5 प्रतिशत लोग अभी सब प्रकार के आरक्षण के दायरे से बाहर हैं। इनमें से वस्तुत: केवल ढाई प्रतिशत लोग रुपये 8,00,000/ वार्षिक आमदनी से अधिक की आय कर पाते हैं। इस प्रकार 40 प्रतिशत लोगों के लिए यह 10 प्रतिशत का आरक्षण है। यह निस्संदेह बहुत कम है तब भी इसका विशेष महत्त्व है।

इसका एक दूसरा महत्व इस बात से प्रकट होता है कि यह राष्ट्रीय सहमति से पारित संभवतया पहला ऐसा विधेयक है जो दो ही दिनों में पारित हो गया। राष्ट्र की सुरक्षा से संबंधित प्रस्ताव आदि तो ऐसे पारित होते हैं परंतु कोई भी संविधान संशोधन विधेयक इतनी शीघ्रता और ऐसी व्यापक सर्वानुमति से आज तक पास नहीं हुआ है। आपातकाल में जो हुआ, उसका सर्वानुमति से कोई संबंध नहीं था, वह तानाशाही का नतीजा था।
इससे स्पष्ट होता है कि यह वस्तुत: संपूर्ण राष्ट्र की आवश्यकता थी और अभी तक के राजनीतिक दल इस विषय में क्यों सहमें हुए थे या क्यों संकोच कर रहे थे, इसकी समीक्षा आवश्यक है।
यहां यह बात ध्यान देने की है कि मूल संविधान में केवल अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए प्रारूप में केवल 10 वर्ष के लिए आरक्षण का विधान था जिसे बाद में उदारता के उत्साह में ‘श्रेष्ठ’ लोगों ने आगे जब तक जरूरत हो, तब तक जारी रखने के लिए कहा।

अप्रमाणित इतिहास बोध
सबसे महत्व की बात यह है कि आरक्षण का सारा ताना-बाना इतिहास के एक विशेष बोध से निगमित है परंतु इतिहास का वह विशेष बोध अंग्रेजों और यूरोपीय समूहों द्वारा भारत के विषय में प्रचारित एक एकांगी और अधिकांशत: असत्य प्रचार सामग्री पर आधारित है और इसलिए उसे इतिहास बोध के स्थान पर इतिहास संबंधी गप्प या कहानी या आख्यान ही कहा जा सकता है। तथ्य उसकी पुष्टि बिल्कुल भी नहीं करते और स्वयं यूरोप के लोगों ने ही और अधिकांश तो स्वयं अंग्रेज लोगों ने भिन्न और अभी प्रचारित गप्पों के विरोधी तथ्य उपस्थित किये हैं (देखें बॉक्स 3)
प्राचीन भारत की बात यदि छोड़ भी दें जिनमें कि लगभग प्रत्येक कुल समूह के पास पर्याप्त समृद्धि के विस्तृत आंकड़े हैं और साथ ही अनेक कारणों से किसी भी कुल में अचानक गरीबी आने के विवरण मिलते हैं, तो भी मध्यकाल के यदि केवल बौद्ध और जैन साहित्य को ही देखें तो, जिन्हें आज अनुसूचित जाति के लोग कहा जाता है, उनके पास भी उस समय अकूत संपत्ति मिलने के प्रमाण हैं और विशेषकर जिन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियां कहा जा रहा है, उनके पास तो राज्य और संपदा सभी कुछ बहुत अधिक रहा है। उनमें से अनेक जातियों के पास राज्य रहे हैं (देखें बॉक्स 4)
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वयं मूल आरक्षण जो केवल अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए केवल 10 वर्षों के लिए था, उसकी बात कहते हुए भी डॉ. भीमराव अंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू ने जो वक्तव्य दिए थे, वे इस विषय में आधारभूत तथ्य हैं, अत: उनका स्मरण अवश्य रखना चाहिए। नेहरू जी ने 25 फरवरी 1956 को संसदीय लोकतंत्र पर एक संगोष्ठी के उद्घाटन भाषण में कहा था :
‘अभी तक लोकतंत्र को एक व्यक्ति एक वोट वाले राजनीतिक अर्थ में देखा जाता रहा है परन्तु गरीब और भूखे व्यक्ति का प्रतिनिधित्व केवल वोट से नहीं हो जाता अत_: आर्थिक न्याय के द्वारा आर्थिक लोकतंत्र लाने पर ही वास्तविक लोकतंत्र होगा।’ हमारे संविधान के मूल में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा है, जो कि राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों से प्रगट है। साथ ही समता पर आधारित बंधुता और आर्थिक न्याय की बात संविधान में है इसलिए समाज में आर्थिक न्याय करना कल्याणकारी राज्य की आधारभूत प्रतिज्ञा है और आर्थिक न्याय के बिना कोई कल्याणकारी राज्य संभव नहीं है।
इस विषय में स्वयं संविधान सभा में अपने समापन भाषण में डॉ आंबेडकर ने कहा था, ‘बिना समता के स्वतंत्रता संभव नहीं है, बंधुता के बिना समता और स्वतंत्रत दोनों असंभव हैं।’अंग्रेजों द्वारा 19वीं शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में एकत्र आंकड़े प्रमाण हैं कि तब तक हर गांव में एक पाठशाला थी, बड़े गांव में एक से अधिक और कस्बों शहरों में अनेक थीं। इनमें हर एक जाति के विद्यार्थी पढ़ते थे और हर जाति के शिक्षक होते थे जो समस्त कक्षा और शाला की सब कक्षाओं में पढ़ाते थे। अत: जातियों के शोषण या दलन का कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है।

सामान्य वर्ग से क्रुद्ध क्यों रहे हैं राजनैतिक दल?

संविधान में जाति या जन्म स्थल या जन्मवंश ( नस्ल) या रिलिजन,मजहब,उपासना पंथ, लिंग आदि के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव स्पष्ट रूप से वर्जित है। कतिपय जातियों के विषय में इतिहास में अंग्रेजों के समय यह प्रचारित कर दिया गया कि वे शताब्दियों से उपेक्षित या वंचित हैं, जिसका उस समय गांधी जी सहित अनेक नेताओं और महापुरुषों तथा श्रेष्ठ विद्वानों ने तथ्य पूर्ण और प्रामाणिक खंडन किया परंतु जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में बौद्धिकों की एक टीम ने अंग्रेजों की ही बातों को ऐतिहासिक तथ्य की तरह प्रस्तुत करना किसी कारण उचित समझा।
स्थित यह है कि राजनीति में नेता यदि बहुत अधिक अध्ययनशील नहीं हुए और देश में विद्या का प्रामाणिक वातावरण नहीं हुआ तो जो वातावरण रहता है, उससे प्रभावित होकर नेता तरह-तरह की राजनीतिक पदावली में बातें बोलते हैं और फिर स्वयं उसके बंदी बन जाते हैं यद्यपि एक व्यावहारिक राजनेता कार्यक्षेत्र में बड़ी चतुराई से समीकरण बैठा रहा होता है परंतु बौद्धिक स्तर पर प्राय: सभी नेता अध्ययन विमुख होते हैं इसलिए वे अपने समय में प्रतिष्ठित लोगों की बातें मान कर उन्हें ही दोहराते रहते हैं।
अभी भारत में जो राजनीति चली है,उस में सर्वाधिक पढ़े लिखे प्रभावी शासक नेता जवाहरलाल नेहरू थे जो पूरी तरह सोवियत संघ की राजनैतिक पदावली से सम्मोहित और मुग्ध थे। फिर भी एक संतुलन साधने का प्रयास करते रहते थे। उन्होंने एक बार यह कहा कि जातियां वर्ग हैं और जातियों को समाप्त होना है क्योंकि वर्गों को समाप्त होना है। वर्ग युद्ध के जरिए वर्ग विहीन समाज की स्थापना का नारा सोवियत संघ में अपने को कम्युनिस्ट कहने वाले नेताओं ने उछाला था। यह बात अलग है कि मार्क्स के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की किसी भी कसौटी के अनुसार कोई सोवियत नेता कम्युनिस्ट नहीं था।
किसी औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े समाज में कम्युनिस्ट क्रांति हो ही नहीं सकती थी और इससे सोवियत संघ और चीन में जो कुछ हुआ, वह सत्ता छीनने की चाल के सिवा और कुछ भी नहीं था। परंतु अंग्रेजों के द्वारा चारों ओर जो बौद्धिक वातावरण फैलाया गया था, उसके प्रभाव से नेहरू सहित अनेक नेता सोवियत पदावली बोलने लगे और उसे ही वैज्ञानिक कहने लगे और इस प्रकार वे भारत में वर्ग विहीन समाज बनाने के लिए जातिविहीन समाज बनाने और इसके लिए जाति संघर्ष को बढ़ावा देने की बातें करने लगे।
दूसरी ओर अनुसूचित जातियों, विशेषकर उनमें से जो मुस्लिम प्रभाव काल में अस्पृश्य कही जाने लगी थीं और बाद में भी कही जाने लगीं, उनके प्रति अपनी गलती से दुखी हिंदू समाज के बहुत से प्रबुद्ध लोग उनके प्रति अत्यंत करुणा और प्रेम का भाव रखते थे और इसलिए उन्होंने आगे बढ़कर उनको आरक्षण देने की बात 10 वर्षों के लिए सहर्ष मान ली। स्वयं डॉक्टर अंबेडकर ने कहा था कि समानता का जो मूल सिद्धांत है, यह आरक्षण का प्रावधान उसके विपरीत है क्योंकि यह वस्तुत: कतिपय जातियों के प्रति राज्य का पक्षपात है परंतु 10 वर्ष के लिए आवश्यकता है क्योंकि अतीत में कभी उन जातियों के विरुद्ध पक्षपात किया गया था
राजनैतिक मुहावरे और संचार माध्यमों में छाए हुए तथाकथित बौद्धिकों के प्रभाव में आकर वर्ग विनाश और वर्ग युद्ध के उन्माद की भाषा फैलती गयी और अनुसूचित जातियों – जनजातियों के लिए जो आरक्षण करुणा और प्रेम की भावना से दिया गया था, उसे राज्य की विवशता की तरह प्रचारित किया गया और ईसाई मिशनरियों के सहयोग से राज्य का लाभ पाने वाले समूहों को राज्य के विरुद्ध और विशेषत: हिंदू समाज के विरुद्ध युद्ध करने के लिए तैयार किया जाने लगा। इस से सामाजिक दुर्भावना चरम शिखर छूने लगी।
इसमें सोवियत संघ और चीन की नारेबाजी की नकल में स्वयं को बौद्धिक मानने और प्रचारित करने वाले तथा समाज में आपसी कलह से लाभ उठाने का अवसर अपने सामने उपस्थित देखने वाले कतिपय समूहों को कुछ प्रशासकों ने भी सहयोग दिया और संचार माध्यमों ने भी इसमें योगदान दिया।
इस तरह वातावरण ऐसा बना कि जिन जातियों को आरक्षण नहीं मिल रहा है, उन जातियों के लोग शोषक हैं और जिन जातियों को आरक्षण दिया गया है, वह सब जातियां शताब्दियों से शोषित हैं और इस प्रकार आरक्षण को अधिकारकी तरह से प्रस्तुत किया गया। मानो कि आरक्षण पा रही जातियां लम्बे समय से अन्याय सहकर उठ खड़ी हुई जातियां हैं जो अब अपना राज्य पाना चाहती है और इसके लिए उन्हें पूरा अधिकार है कि वह सामान्य वर्ग के समाज को सब तरह से उत्पीड़ित करें, अपमानित करें, लांछित करें, उनके विरुद्ध अपशब्दों और झूठ का प्रयोग करें, उनके देवताओं और तीर्थों को गालियां दें, उनकी उपासना पद्धति को अंधविश्वास बताएं और सब प्रकार से उन्हें लांछित करें।
इस तरह एक भयंकर वर्ग युद्ध की दशा जातियों के बीच बनाने की कोशिश स्वयं को कम्युनिस्ट मानने वाले किंतु विश्व राजनीति और विश्व इतिहास के गैर जानकार और अनपढ़ किस्म के बौद्धिकों और नेताओं ने की जो कि सामाजिक वास्तविकता से पूरी तरह दूर थी, इसीलिए कार्यक्षेत्र में ऐन मौके पर सभी जातियों का सहयोग लेना हर दल की विवशता हो गई परंतु वाणी के स्तर पर लगातार सामान्य वर्ग के लोगों को, विशेषकर ब्राह्मणों को गालियां दी जाती रही और उन्हें शताब्दियों से खलनायक रहे समूह की तरह प्रस्तुत किया जाता रहा और उनकी पूजा पद्धति,उनके देवताओं और शास्त्रों को, जिनको वर्तमान परिदृश्य में भारत के संविधान में कोई भी अधिकृत और विधिक अधिकार प्राप्त नहीं है और जो केवल एक पठन-पाठन के ग्रंथ मात्र हैं तथा जिन्हें लेकर कोई भी शासक या कोई भी संपन्न समूह आक्रामक नहीं है, यहां तक कि आत्म गौरव से भी संपन्न नही नजर आता है, उन कमजोर स्थिति में पड़ गए समूहों और लोगों तथा उनके शास्त्रों को गालियां देना राजनीतिक फैशन हो गया है जिससे कि सामान्य वर्ग स्वयं को निरंतर उपेक्षित और पीड़ित अनुभव कर रहा था और ऊपर से आरक्षण के द्वारा नौकरियों के अवसर भी छीने जा रहे थे।
इस तरह सामान्य वर्ग के साथ भावनात्मक और बौद्धिक दोनों ही स्तरों पर भयंकर अन्याय हो रहा है। 124 में संविधान संशोधन विधेयक से भावनात्मक वातावरण में परिवर्तन आएगा। बौद्धिक झूठ का जाल तो यथावत है।

महारों के साथ महाराष्ट्र के एक भाग में कुछ समूहों ने कोई व्यवहार किया, वह समस्त भारत के लिए सभी उच्च जातियों के आचरण का प्रमाण संसार की किस कसौटी पर हो गया? उत्तर प्रदेश में तो ऐसी कोई घटना कभी हुयी नहीं। जहां तक आपस में वैर विरोध की बात है, सगे भाई एक दूसरे को अत्यंत उत्पीड़ित करते देखे जाते हैं। यह आये दिन का सत्य है। अधिकांश मुकदमे भारतीय न्यायालयों में पारिवारिक झगड़ों के ही हैं।
दूसरी बात यह है कि हजारों साल के शोषण से समाज की दशा क्या हो जाती है, यह अरब, अफ्रीका और अमेरिका में स्पष्ट है। सभी अरब लोग अपने पूर्वजों की स्मृति त्याग चुके हैं, लगभग अधिकांश अफ्रीकी अपने को गुलाम बनाने वाले समूहों की नकल में स्वयं को धन्य मानते हैं और अमेरिका के अधिकांश मूल निवासी यूरोपीय अपराधियों द्वारा फैलाई गयी संस्कृति को ही अपना चुके हैं।
जबकि महाराष्ट्र के स्वयं को दलित कहने वाले समूह भीमा कोरेगांव की ‘विजय’ का जश्न मना रहे हैं और समस्त महाराष्ट्र में पेशवाओं और अन्य महान ब्राह्मणों का सार्वजानिक अपमान करने वाला लेखन और भाषण आज वहां का मुख्य सामाजिक तथ्य है। इससे प्रमाणित है कि इन लोगों में कोई दैन्य भाव होना तो दूर, असंतुलित दर्प है और ब्राह्मणों को गालियां देने का उत्साह है। यह बताता है कि ये किसी भी तरह शताब्दियों से दबे समूह नहीं हैं। अंग्रेजों द्वारा एकत्र आंकड़े, जो 19वीं शताब्दी में इनके शिक्षा प्राप्त कर रहे होने के और शिक्षा दे रहे होने के प्रमाण देते हैं, उनसे ही इनका यह राजनैतिक दर्प और उन्माद समझ में आ सकता है और अंग्रेजों के प्रति इनकी उत्कट भक्ति के सूत्र इनकी राजनीति में खोजे जा सकते हैं।
वस्तुत: संविधान में आपातकाल में जोड़े गए समाजवाद और सेकुलरिज्म विशेषण से पूर्व तक भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य था जिसमें समता, स्वतंत्रता और बंधुता आधारभूत तत्व थे। समाजवाद और सेकुलरिज्म शब्दों के साथ समस्या यह है कि वह आज तक अपरिभाषित हैं और उनकी चाहे जो परिभाषा हो जाती है और समाजवाद का उदारीकरण से या खुली अर्थ नीति से सीधा विरोध है, यह एक विश्व भर में मान्य तथ्य है
परंतु भारत में बहुत ही विडंबना पूर्ण ढंग से समाजवाद विशेषण को स्वीकार करने के कुछ ही वर्षों के भीतर वैश्वीकरण और उदारीकरण की बात की जाने लगी जिससे इन दो विशेषणों का जोड़ा जाना हास्यास्पद हो गया। इसे सुसंगत बनाने के लिए आवश्यक है कि माननीय संसद इन दोनों शब्दों की कोई भी उचित परिभाषा दे। कोई भी परिभाषा जो माननीय संसद स्वीकार करेगी, वह उचित होगी।

बदलते रहे हैं अगड़े पिछड़े होने के दावे

अंग्रेजों ने घोषित रूप से भारतीय जनगणना इस उद्देश्य से प्रारंभ की थी कि भारतीय समाज में विशेषकर हिंदू समाज में अधिक से अधिक भेदभाव दर्शा कर इनमें टकराव पैदा किया जाए परंतु इसमें कभी भी सफल नहीं हुए और परिणाम उल्टे ही निकले।
पहली जनगणना में अधिकारियों ने कहा कि जिन्हें एक इलाके में अथवा एक क्षेत्र में अस्पृश्य कह दिया जाता है,उन्हें ही दूसरे क्षेत्र में सम्मानित स्थान प्राप्त है और इसलिए जातियों का यह वर्गीकरण बड़ी कठिनाई में पड़ जाता है। अनेक अधिकारीयों ने टिप्पणी की कि चमड़े के पेशे से जुड़े समूहों के हाथ का पानी पीना और उन्हें घर के भीतर आने देना अगड़ी जातियों में सामान्य बात है और वे भी स्वयं को रविदास के वंशज कहकर गर्वित होते हैं। इसके साथ ही प्रत्येक जनगणना में यह देखा गया कि अधिकांश जातियां अपने को उच्च वर्ग का ही बताती हैं। उदाहरण के लिए सभी अहीर और आभीर तथा यादव लोग एवं गोप लोग अपने आपको यदुवंशी क्षत्रिय कह रहे थे और सभी कुर्मी, कुनबी और पटेल लोग कूर्म वंशी क्षत्रिय स्वयं को कह रहे थे और लोहार लोग स्वयं को किसी न किसी प्रकार का ब्राह्मण बता रहे थे। अपने नाम के आगे विश्वकर्मा ब्राह्मण का प्रयोग भी प्रारंभ कर दिए थे। नाई लोग स्वयं को शर्मा लिखने लगे थे और ब्राह्मण बता रहे थे।
1931 ईस्वी की जनगणना की रिपोर्ट देते हुए संयुक्त प्रांत के जनगणना अधीक्षक एसी टर्नर ने टिप्पणी की कि 1921 के बाद से हिंदू समाज में नए आंदोलन उभर रहे हैं। सभी जातियां एक संगठित समाज बन गई हैं तथा स्वयं को उच्चतर स्तर का बताती हैं। उन्होंने 63 जातियों के नाम दिए हैं जो उच्च जाति का दावा कर रही थीं जैसे अहीर यादव स्वयं को क्षत्रिय बता रहे थे और कई बंजारा लोग स्वयं को चौहान या राठौर राजपूत कह रहे थे। धीवर लोग स्वयं को धीमन ब्राह्मण या पांचाल ब्राह्मण और लोहार लोग स्वयं को विश्वकर्मा ब्राह्मण लिखा रहे थे, भोटिया लोग अपने को राजपूत लिखा रहे थे और मायावती की जाति के लोग उन दिनों स्वयं को जाटव राजपूत बता रहे थे। गड़रिया लोग स्वयं को पाली राजपूत बता रहे थे और गुर्जर लोग अपने को गुर्जर क्षत्रिय बता रहे थे, जाट लोगों ने यदुवंशी ठाकुर के रूप में नाम लिखाया और कायस्थों ने स्वयं को चित्रगुप्त वंशी क्षत्रिय होने का दावा किया। लोधी लोगों ने स्वयं को लोधी राजपूत लिखवाया और पटवा लोग स्वयं को पटवा ब्राह्मण कह रहे थे। तागा लोग स्वयं को त्यागी ब्राह्मण बता रहे थे। ऐसी 63 जातियों की सूची टर्नर ने दी है।
1964 तक देशभर में अनेक आज की पिछड़ी जातियां स्वयं को क्षत्रिय कह रही थीं। नित्य जाति सम्मलेन होते थे- कूर्म क्षत्रिय, यदुवंशी क्षत्रिय आदि। काका कालेलकर आयोग की नियुक्ति के बाद वातावरण धीरे-धीरे बदला और मंडल ने तो पिछड़ा होने की तूफानी दौड़ मचा दी

संविधान के दर्शन और दायरे से बाहर सोवियत संघ से प्रेरित अनेक कांग्रेसी नेताओं ने संविधान के विषय में भी और भारत राष्ट्र के लक्ष्य के विषय में भी और भारत राज्य के लक्ष्य और कर्तव्यों के विषय में भी भांतिभांति के भाषण दिए परंतु वे संविधान की मूल भावना और मूल दर्शन का अंग नहीं हैं। इनमें से अधिकांश वक्तव्य वर्ग संघर्ष और वर्ग युद्ध तथा वर्ग शत्रुता की धारणा से प्रेरित हैं, जिनमें वर्गों के बीच शत्रुता,संघर्ष और युद्ध को एक ऐतिहासिक तथ्य मान लिया गया है। अब सत्य यह है कि जैसा कि गांधी जी ने कहा था: वर्ग क्या है, यह कोई नहीं जानता। स्वयं मार्क्स ने वर्ग की कोई परिभाषा नहीं दी है और वर्ग युद्ध तो आज तक विश्व में कभी कहीं हुआ ही नहीं,सत्तारूढ़ और सत्ता स्पर्धी समूहों के मध्य ही संसार में सभी राजनैतिक संघर्ष और युद्ध होते हैं यानी युद्ध बल में समर्थ दो समूह ही राजनीतिक युद्ध करते हैं। संसार में आज तक कोई वर्ग संघर्ष नहीं हुआ है। सत्ता संघर्ष को वैध ठहराने के लिए सोवियत संघ और चीन में कुछ राज पुरुषों ने मार्क्स के नाम का सहारा लेकर इस तरह के टकराव का एक सिद्धांत लिखा और बोला, जो व्यवहार में झूठ प्रमाणित हुआ क्योंकि उसके पीछे कोई ऐतिहासिक तथ्य नहीं थे, न हैं। सोवियत संघ और चीन से प्रेरित राजनीतिक व्यक्तियों और उनके सेवक बौद्धिक व्यक्तियों ने भारत के लिए नई-नई स्थापनाएं कीं। इनमें से मूल बात यह मान ली गई कि जातियां वर्ग का ही रूप हैं और इस प्रकार विश्व में वर्ग संघर्ष और वर्ग युद्ध आवश्यक है इसलिए भारत में जाति संघर्ष और जातिगत युद्ध आवश्यक है। विश्व में वर्ग युद्ध वाली विचारधारा की असलियत खुलने के बाद उसका कोई भी ग्राहक बौद्धिक स्तर पर नहीं बचा है परंतु उनके अवशेष के रूप में भारत में जातियों के बीच टकराव को ऐतिहासिक तथ्य बताने वाली राजनीतिक बातें चारों ओर हवा में छाई रहती हैं इसलिए अनुसूचित जातियों को संरक्षण देने का जो मूल सिद्धांत था और जो उदारता और प्रेम की मूल भावना थी, उसके द्वारा समाज में विषमता को समाप्त करने की दिशा में कुछ प्रयास करना उद्देश्य था, पर राजसत्ता के नए सिपाहियों ने उसके स्थान पर जातीय संघर्ष और जाति युद्ध और जातियों के बीच शत्रुता को सिद्धांत का आवरण दिया तथा समाजवादी प्रगतिशीलता कहकर जातियों को परस्पर भड़काने का एक फार्मूला खुलकर अपना लिया गया। इतना खुलकर तो कभी अंग्रेजों ने यह दुस्साहस नहीं किया था। इस प्रकार भारतीय राजनीति में राजनीतिक व्याख्या जातियों के आधार पर होने लगी।

124 वां संविधान संशोधन विधेयक उन लोगों को राज्य के प्रति आत्मीयता की भावना पैदा करने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है। यह भारत को बांटने और आपसी जाति संघर्ष और जातीय शत्रुता बढ़ाने वाली राजनीति की काट की दिशा में एक छोटा सा कदम है और इसीलिए इस छोटे से कदम से ही जाति को वर्ग ठहराते हुए वर्ग शत्रुता और वर्गयुद्ध का उन्माद फैलाने वाले समूहों की नींव में आग लग गई है या कह सकते हैं कि उनकी जड़ों में मट्ठा पड़ना शुरू हो गया है।

इसमें सबसे बड़ी विडंबना की स्थिति यह है कि भारत का कोई भी बड़ा राजनेता अपने निजी व्यवहार में जाति पर केंद्रित नहीं रहता, रह ही नहीं सकता क्योंकि भारतीय समाज में यह व्यवहार संभव ही नहीं है। परंतु चुनाव के समय लगभग हर दल और हर नेता जातिवाद का सहारा लेता है और जातिवादी भावनाओं को उभारता है जो कि वस्तुत: मोबिलाइजेशन की तकनीक मात्र है जो इतनी सस्ती और सरलता से प्रभाव फैलाने वाली तकनीक हो गई है जिससे कि सामान्य नेता लोग बाहर आने की कल्पना ही नहीं कर पा रहे।
परिणाम यह हुआ कि कतिपय जातियों को अनिवार्य रूप से गरीबों का पर्याय मान लिया गया और कतिपय अन्य जातियों को अनिवार्य रूप से संपन्न वर्ग का पर्याय प्रचारित कर दिया गया परंतु आंकड़े तो कुछ और ही कहते हैं। इसलिए भारतीय समाज में निरंतर एक व्यापक असंतोष था और देश की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा स्वयं को राज्य के द्वारा ठगा जा रहा या वंचित और उत्पीड़ित महसूस कर रहा था और समाजवादी राजनीति के भक्त बौद्धिक लोग जिनमें लेखक, कलाकार, पत्रकार आदि शामिल हैं, इस भयंकर सचाई को छिपाने के लिए उन समूहों को कोसे जा रहे थे जो जातिवादी आरक्षण के कारण लगातार अधिकाधिक असुरक्षित और अधिकाधिक पीड़ित होते जा रहे थे और जिन्हें राज्य के द्वारा स्वयं को ठगा गया अनुभव होने लगा था। 124 वां संविधान संशोधन विधेयक उन लोगों को राज्य के प्रति आत्मीयता की भावना पैदा करने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है। यह भारत को बांटने और आपसी जाति संघर्ष और जातीय शत्रुता बढ़ाने वाली राजनीति की काट की दिशा में एक छोटा सा कदम है और इसीलिए इस छोटे से कदम से ही जाति को वर्ग ठहराते हुए वर्ग शत्रुता और वर्गयुद्ध का उन्माद फैलाने वाले समूहों की नींव में आग लग गई है या कह सकते हैं कि उनकी जड़ों में मट्ठा पड़ना शुरू हो गया है।

विविध जातियों की हिन्दू वैभव में समान सहभागिता के तथ्य

भारत में जिन्हें अनुसूचित जातियां कहा जाता है, उनमें से भी कई के पास राज्य रहे हैं और संपत्ति तो सबके पास थी। गरीबी का संबंध कभी भी जाति से नहीं रहा है क्योंकि जाति वस्तुत प्राचीन संस्कृत नाम नहीं है। प्राचीन काल में इन्हें कुल कहा जाता था और कुलों के समूह को ही फारसी के असर से जात कहा जाने लगा। किसी भी धर्म शास्त्र में कुल समूहों के लिए जाति शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है
जिन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग कहा गया है उनमें से अधिकांश के पास तो 17 वीं शताब्दी ईस्वी तक (300 वर्षों पूर्व तक ) राज्य थे। विषयों के विशाल राज्य तो सुविदित ही हैं और उनकी समृद्धि भी जग जाहिर है।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आई जे सिंह यादव ने एक पुस्तक छापी है (यादवाज थ्रू द एजेज)। यह दों खण्डों में है। इसमें यही इतिहास दर्शाया है कि वैदिक काल से 17 वीं शताब्दी ईस्वी तक देश के अधिकांश हिस्सों में यादवों के विशाल राज्य थे। लेखक की भूमिका के अनुसार इस पुस्तक को स्वर्गीय चंद्रजीत यादव, स्वर्गीय राम नरेश यादव सहित लालू यादव, शरद यादव, मुलायम सिंह यादव आदि सभी यादव नेताओं ने देखा है और इसके तथ्यों से सब अवगत हैं और इसको सराहा है। इस प्रकार एक ओर सब यादवों का दावा है कि उनके पास हजारों साल तक भारत वर्ष में बड़े-बड़े विशाल राज्य रहे हैं और दूसरी ओर वे सामाजिक दृष्टि से स्वयं को पिछड़ा वर्ग बताते हैं। यह परस्पर विरोधी बात है।
भारत में अन्य पिछड़ा वर्ग समूह में से तेलियों, कुर्मी,पटेलों, कुनबियों, सुनारों, लोहारों आदि के पास छोटे बड़े राज्य रहे। काशी में चांडाल का वैभव समस्त भारत में प्रसिद्ध हैइस बात के सर्वसम्मत ऐतिहासिक प्रमाण हंै कि भारत में नाइयों और केवट तथा कायस्थों के पास बंगाल,उड़ीसा और बिहार के अनेक हिस्सों में राज्य थे। पंजाब, गुजरात, कोंकण और महाराष्ट्र में आभीरों और अहीरों के राज्य शताब्दियों तक रहे। उत्तर पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बिहार में थारुओं ने दीर्घकाल तक राज किया और भरों और अन्य समूहों का भी इन इलाकों में लंबे समय राज्य रहा। बिहार में कुछ इलाकों में डोमों के पास भी रियासत थी।
दक्षिण में वोकलिग्गा, गौड़ा, वल्लाल, रेड्डी आदि जाति समूहों की रियासतें थीं। पंजाब में खत्रियों के पास राज्य थे। उड़ीसा के कई हिस्सों में खंडायतों का राज्य था। कुर्मी और पटेलों के राज्य मध्य प्रदेश,उत्तर प्रदेश से कर्नाटक तथा गुजरात से उड़ीसा बंगाल तक जगह-जगह थे। कई राज्य 1947 तक थे। पडरौना के नरेश सीपीएन सिंह कुर्मी ही हैं। सिंगरौली की गोंड महारानी के महल को कांग्रेस के राज्य में बांध के बीच में डूबा दिया गया।
दक्षिण के विजयनगर राज्य में सभी जातियों के लोग राजन्य थे जिनमे पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जाति में शामिल जातियां भी राजकन्य वर्ग में थी।
वनवासियों में संथाल ,भील, गोंड, मुंडा, उरांव, खरवार कोल, राजगोंड आदि के राज्य थे जिनमे कई तो 1947 तक थे, कांग्रेस ने नष्ट किया। नागा, मिज़ो, मैती ,खासी आदि वनवासियों का राज्य भारत के उत्तर और उत्तर पूर्वी भागों में रहा। उत्तर और उत्तर पूर्वी क्षेत्रों में वनवासियों के पास तो 1947 तक राज्य थे पर अनेक वनवासी समूहों के पास 18 वीं शताब्दी ईस्वी तक भारत में राज्य थे जिनको अंग्रेजों ने समाप्त किया। उनके राज्य छीन लिए। हिन्दू समाज ने तो सदा उन्हें समान राजकीय सहभागिता दी।

इस दृष्टि से यह वास्तविक न्याय, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है क्योंकि राज्य के प्रति लोगों की भावना का ही महत्व है। गरीबी राज्य कभी नहीं मिटाता, मिटा ही नहीं सकता। यह वस्तुत: राज्य का काम ही नहीं है क्योंकि राज्य स्वयं लोगों के दिए कर पर पलता है, उसके पास लोगों का ही धन है, राज्य का अपना स्वतंत्र कोई धन नहीं होता। वह लोगों से या तो प्यार से मांगता है, जिसे चाणक्य ने प्रणय कहा है या फिर उनसे धन छीनता है। हिन्दुओं को यह हजारों साल से पता है इसीलिए वे राज्य से व्यवस्था और सुरक्षा की ही अपेक्षा रखते रहे हैं, परन्तु दास समाजों में राज्य को मालिक मानने की परम्परा हो जाती है। ऐसा राज्य लोगों को कुछ बांटने के नाम पर राजकर्मियों की एक बड़ी फौज खड़ी कर उनका मुख्य पोषण करने लगता है और समाज की शक्ति को छीन लेता है। समाजवाद के नाम पर 70 वर्षों से भारत में यही किया गया। गरीबों की चिंता और सुरक्षा समाज का काम है, इसके लिए ही दान की विशाल और विराट व्यवस्था रही है जो अभी भी है। अभी भी 5 करोड़ से अधिक लोग भारत में भंडारा, लंगर,अन्न सत्र आदि में नित्य भोजन करते हैं। गरीबी दूर करने के नाम पर सरकारें क्या करती हैं, इसका सबसे बड़ा प्रमाण विघटित सोवियत संघ है जहां करोड़ों लोग डबल रोटी के टुकड़े कचरे से बीन-बीन खाने को विवश थे। सरकारी नौकरियां कितनी हैं, यह अलग चर्चा का विषय है। पर सामान्य वर्ग में राज्य के प्रति अनात्मीयता का और स्वयं के ठगे जाने का, धोखा दिए जाने का भयंकर अवसादकारी जो भाव फैल रहा था, वह समाप्त होगा। इसी दृष्टि से यह मोदी सरकार का ऐतिहासिक कदम है।

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