केसीआर के सामने कौन?

0
25

टीआरएस के गुलाबी झंडे पर भगवा छटा देखने वाले भी कम नहीं हैं। मोदी सरकार के खिलाफ लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान टीआरएस सांसदों की अनुपस्थिति और राज्यसभा में उप सभापति के लिए एनडीए उम्मीदवार के समर्थन से पार्टी को भाजपा का अघोषित सहयोगी माना जा रहा है।

तेलंगाना के चुनावी नतीजे इस बार ‘समय’ तय कर रहा है। टीआरएस (तेलंगाना राष्ट्र समिति) के मुखिया और राज्य के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) चुनावी बिसात पर अपनी ‘टाइमिंग’ के लिए जाने जाते हंै। यही वजह है कि अपनी सरकार का नियत कार्यकाल पूरा होने से ठीक नौ महीने पहले चुनाव की घोषणा कर कांग्रेस-भाजपा समेत अपने तमाम विरोधियों को आश्चर्य में डाल दिया।
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तो हैदराबाद में मीडिया के सामने अपनी नाराजगी नहीं छुपा पाए और सीधा केसीआर पर निशाना साध कर यह संकेत दिया कि भाजपा भी तेलंगाना विधानसभा चुनाव को लेकर थोड़ी परेशानी में है। जानकारों का मानना है कि राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के चुनावों में कांग्रेस की जीत से आशंकित केसीआर तेलंगाना में कांग्रेस को जोश में आने का कोई मौका नहीं देना चाहते थे। केसीआर के जल्दी चुनाव करने के दांव के सामने विरोधी भी एकजुट हो रहे हैं। कांग्रेस और तेलुगु देसम पार्टी जो आंध्र में एक दूसरे के सामने उतरते रहे हैं, अब तेलंगाना में कुछ छोटी पार्टियों के साथ मिलकर गठबंधन बना रहे हैं। इन पुराने विरोधियों का टीआरएस के खिलाफ एकजुट होना चुनावी नतीजों पर खासा असर डाल सकता है। टीआरएस 2014 के विधानसभा चुनाव में 119 में 63 सीट हासिल की थी वहीं कांग्रेस 25 और टीडीपी 15 पर थी। अब इस बार सत्ता विरोधी लहर के चलते इन आंकड़ों को टीआरएस दुबारा हासिल कर पाएगी कहना मुश्किल है।
2014 के चुनावों में कांग्रेस और तेदेपा का कुल वोट 40 फीसद था वहीं टीआरएस 34 फीसद वोट पायी थी। फिलहाल इस बार एक बड़ा मुद्दा नए राज्य के गठन के बाद केंद्र सरकार से विशेष आर्थिक पैकेज हासिल करने का है। अलग राज्य बनने के बाद से ही टीआरएस सरकार केंद्र से आर्थिक पैकेज हासिल करने में नाकाम रही। जनता को यह समझाना आसान नहीं है। केसीआर इस बार दो मुद्दों पर फोकस कर रहे हैं। उनका पहला मुद्दा सामाजिक क्षेत्र में उनकी योजनाओं को लोगों के सामने भुनाना है और कांग्रेस तेदेपा गठबंधन को तेलंगाना विरोधी बताने की रणनीति भी बना रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तय समय से पहले चुनाव कराने की सोची समझी रणनीति का फायदा केसीआर को हो सकता है। क्योंकि केसीआर इसके लिए पहले से तैयारी कर रहे थे।
टीआरएस की यह तैयारी तब साफ-साफ दिखी जब पार्टी ने लगभग सभी सीटों पर तुरंत अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। इसके बाद टीआरएस पार्टी के सभी उम्मीदवार, केसीआर और उनकी कैबिनेट में रहे तमाम मंत्री विधानसभा भंग होने के तुरंत बाद चुनाव प्रचार में जुट गए। वहीं राज्य के प्रमुख विपक्षी दलों में शामिल कांग्रेस-तेदेपा गठबंधन अभी तक अपने उम्मीदवारों पर आम सहमति कायम नहीं कर पाए हैं। ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सबसे पहले पूरे जोश के साथ चुनाव अभियान शुरू करने वाली टीआरएस चुनाव तक इस जोश और बढ़त को कायम रख पाती है कि नहीं? लेकिन टीआरएस के गुलाबी झंडे पर भगवा छटा भी कुछ लोगों को दिख रही है। मोदी सरकार के खिलाफ लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान टीआरएस सांसदों की अनुपस्थिति और राज्यसभा में उप सभापति के लिए एनडीए उम्मीदवार के समर्थन से पार्टी को बीजेपी का अघोषित सहयोगी माना जा रहा है।
विपक्ष राज्य सरकार के खिलाफ वादाखिलाफी से उपजे लोगों के गुस्से को हवा देना चाहता है। साथ ही भाजपा से नजदीकियों के आरोप टीआरएस के 14 फीसद अल्पसंख्यक वोट बैंक को भड़का सकता है। तेलंगाना में विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती है चेहरे की। खास तौर से कांग्रेस में ऐसा कोई नेता नहीं है जिसका राज्य भर में व्यापक प्रभाव हो। हालांकि कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष उत्तम कुमार रेड्डी और कार्यकारी अध्यक्ष रेवंत रेड्डी केसीआर के खिलाफ मोर्चा संभाल रहे हैं। लेकिन उनके बराबर लोकप्रियता हासिल करना किसी के लिए आसान नहीं है। ऐसे में विपक्ष केसीआर पर भ्रष्टाचार और परिवारवाद को बढ़ाने का आरोप लगा रहा है। लेकिन विपक्षी खेमे में बड़े नेता का अभाव आरोपों को धार नहीं दे पा रहा है।
  (लेखक तेलंगाना में टीवी5 न्यूज नेटवर्क के समूह संपादक हैं।)

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here