कांग्रेस के लिए वजूद का सवाल

0
23

छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी लगातार चौथी बार सरकार बनाने की रणनीति के तहत सक्रिय है। 15 वर्षों से वनवास झेल रही कांग्रेस अपनी सरकार बनाने के लिए जी-जान से जुटी है। प्रचार के मोर्चे पर भाजपा बढ़त बनाए हुए दिख रही है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने गत डेढ़ वर्ष से प्रदेश में व्यापक संपर्क अभियान चलाए रखा है। उनका ध्यान मुख्य रूप से आदिवासी क्षेत्रों पर केन्द्रित है। 2013 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने आदिवासी प्रभुत्व वाले बस्तर संभाग में अच्छा प्रदर्शन किया था। बस्तर की 12 में से 8 सीटों पर कांग्रेस कब्जा करने में सफल हो गई थी। भाजपा के हिस्से केवल 4 सीटें आई थीं। आदिवासी दबदबे वाले दूसरे संभाग सरगुजा में दोनों पार्टियों को सात-सात सीटें हासिल हुई थीं। भाजपा की नाक बचाने में कारगर हुई थी जशपुर के पूर्व नरेश दिलीप सिंह जूदेव की पुण्याई। जूदेव को सरगुजा का ‘शेर’ माना जाता था। उन्होंने मिशनरियों द्वारा धर्मांतरित आदिवासियों की स्वधर्म में वापसी के लिए अपने बलबूते व्यापक अभियान चलाया था। ये वही दिलीप सिंह जूदेव हैं, जिन्होंने प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी के खिलाफ प्रथम चुनाव में अपनी मूछें दांव पर लगा दी थीं। भाजपा की सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सरगुजा की राजनीति की एक दिलचस्प अतंर्कथा है। कांग्रेस विधायक दल के नेता टीएस सिंहदेव ने हाल ही में एक बयान में कहा कि वह राजनीति में दिलीप सिंह जूदेव के कारण ही स्थापित हो पाए। भाजपा के चुनाव अभियान की कमान डॉ. रमन सिंह ने संभाल रखी है। पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व का समर्थन भी उन्हें प्राप्त हैं। उनके पास पर्याप्त संसाधन भी हैं। यही कारण है कि 2018 के चुनावों की आचार संहिता लागू होने से पहले डॉ. रमन सिंह प्रदेश के कुल 90 विधानसभा क्षेत्रों में से 86 में अटल विकास यात्रा पूरी कर चुके हैं। चुनावी तिथियों की घोषणा की पूर्व संध्या को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल के गढ़ में एक बड़ी रैली को संबोधित किया। भाजपा सभी वर्गों के मतदाताओं को लुभाने के लिए अब तक अनेक सौगातें बांट चुकी है। विद्यार्थियों को 55 लाख स्मार्ट फोन सितम्बर में ही बांटे जा चुके थे। आर्थिक दृष्टि से कमजोर ग्रामीण और शहरी परिवारों में गैस सिलेंडर पहुंचाए जाने की भी खासी चर्चा रही। संसाधनों के अभाव में जूझ रही कांग्रेस में उत्साह तो काफी है, परंतु तालमेल कायम होना शेष है। प्रदेश भाजपा के एक मंत्री की जिस सेक्स सीडी को कांग्रेस ने एक मारक शस्त्र के रूप में इस्तेमाल कर हंगामा खड़ा किया था,

सतनामी समाज में अजीत जोगी का खासा प्रभाव है। जोगी को निष्कासित कराने में निर्णायक भूमिका कांग्रेस के राज्य अध्यक्ष भूपेश बघेल की थी। बघेल का आरोप था कि जोगी कांग्रेस में रहते हुए सतनामी मतदाताओं को भाजपा के समर्थन में लामबंद करते रहे हैं। इस बार जोगी स्वयं गठबंधन बनाकर चुनाव मैदान में हैं। इससे भाजपा को फायदा होता दिेख रहा है।

वह फर्जी साबित होने के बाद उसी के गले की फांस बन गई है। उसके कारण प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल तथा उनके अंतरंग सहयोगी विनोद वर्मा को जमानत लेकर जेल से छूटना पड़ा। पार्टी के टिकट के लिए सौदेबाजी के कुछ स्टिंग आॅपरेशन भी कांग्रेस के चुनाव प्रभारी पीएल पुनिया सहित कुछ अन्य नेताओं के लिए झंझट खड़ा कर चुके हैं। इनके दृष्टिगत कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा बघेल, पुनिया और चरणदास महंत को दिल्ली तलब किया गया। 12 अक्टूबर से प्रदेश के प्रचार अभियान को गति देने के लिए राहुल गांधी के दौरों पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं को बड़ा भरोसा है। कांग्रेस को लगता है कि सतत 15 वर्षों की सत्ता से जनता में भाजपा से मोहभंग की जो स्थिति पनपी है उसका लाभ कांग्रेस को मिलेगा। भूपेश बघेल अपनी हर सभा में ‘भाजपा’ शासन-प्रशासन पर भ्रष्टाचार के आरोपों को प्रचार का मुख्य मुद्दा बनाते हैं। कांग्रेस का मानना है कि जनता बदलाव चाहती है। यह भी कि भाजपा का एकमात्र विकल्प कांग्रेस है। लगातार तीन कार्यकाल के कारण जनता में सरकार के प्रति होने वाली उकसाहट को भाजपा खुद भी महसूस करती है और उसके निदान के लिए कुछ कदम भी उठा रही हैं। फिर भी उसे अपने विकास कार्यों और लोककल्याणकारी योजनाओं के सुफल पर भरोसा है। पहले दो चुनाव भाजपा ने बहुत सस्ती दरों पर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को खाद्यान्न मुहैया करके जीते थे। जिस प्रदेश में डेढ़ सौ वर्षों से अकाल तथा सूखे से रह-रह कर लोगों के भूखे मरने का इतिहास रहा हो, वहां दूरस्थ स्थानों तक नाममात्र के मोल पर भरपेट खाद्यान्न उपलब्ध कराना एक क्रांतिकारी कदम था। उस योजना की सफलता के कारण डॉ. रमन सिंह ‘चाउर वाले बाबा’ के नाम से लोकप्रिय हो गये थे, उसका लाभ भाजपा को चुनावों में मिला। इस लोक कल्याणकारी योजना की चमक बीच-बीच में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में हुए घपलों और घोटालों के कारण फीकी भी पड़ती रही। नया आकर्षण पैदा करने के लिए प्रदेश में यातायात, चिकित्सा और शिक्षा की योजनाओं को अपनाया गया। इसके साक्ष्य स्पष्ट दिखाई देते हैं। बस्तर के अगम्य माने जाते रहे क्षेत्रों तक अच्छी सड़कों का निर्माण हुआ है। प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा के संस्थान बड़ी संख्या में खुले हैं। फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर प्रश्न रह-रहकर उठते रहे हैं। मंत्रियों, नेताओं तथा उनके कृपापात्र प्रशासनिक अधिकारियों में व्याप्त पक्षपात और अहंकार से जनसामान्य में खिन्नता और कहीं-कहीं आक्रोश भी अनुभव किया जाता रहा है। कांग्रेस और ‘तीसरा मोरचा’ इन्हीं बातों को भाजपा पर प्रहार का मुद्दा बना रहे हैं। यहां तीसरे मोरचे का आशय प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी की ‘जनता कांग्रेस छत्तीसगढ’Þ मायावती की बहुजन समाज पार्टी और करीब आधा दर्जन विधानसभा क्षेत्रों में आंशिक प्रभाव रखने वाली गोंडवाना गणतंत्र पार्टी से है। निवर्तमान विधानसभा में बसपा का एक और अन्य निर्दलीय विधायक था। सदन में भाजपा के 49 और कांग्रेस के 39 विधायक थे। श्री जोगी की जकांछÞ, बसपा और गोंगपा के तालमेल से ज्यादा नुकसान कांग्रेस को होना संभावित है। कारण यह है कि अनुसूचित जाति तथा जनजाति के जिन मतदाताओं को यह गठबंधन आकृष्ट कर सकता है, वे परंपरागत रूप से कांग्रेस के समर्थक माने जाते रहे हैं। परंतु 2013 के चुनावों में इनमें एक बड़ा उलटफेर तब हुआ था जब सर्वाधिक प्रभावशाली सतनामी मतदाताओं ने खुलकर भाजपा का साथ दिया। अनुसूचित जाति का जुझारू सतनामी समाज अजीत जोगी के निकट समझा जाता रहा है। श्री जोगी के पिता सतनामी और मातुश्री आदिवासी समाज से थीं। राज्य में 9-10 विधानसभा क्षेत्रों के परिणाम सतनामियों द्वारा तय किए जाते हैं। 2013 में इनमें से 8 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा के प्रत्याशी चुने गए थे। इस बार यक्ष प्रश्न यह है कि सतनामी मतदाता किस तरफ जाएंगे ? सतनामी समाज में अजीत जोगी का खासा प्रभाव है। जोगी को कांग्रेस से निष्कासित कराने में निर्णायक भूमिका भूपेश बघेल की रही थी। बघेल का आरोप था कि जोगी कांग्रेस में रहते हुए सतनामी मतदाताओं को भाजपा के समर्थन में लामबंद करते रहे हैं। इस बार जोगी स्वयं अपना एक गठबंधन बनाकर चुनाव मैदान में है। चुनावी ‘राजनीति’ के पंडितों की पैनी नजर जोगी के रुख पर टिकी है।

गत पांच वर्षों में भाजपा ने भी सतनामी समाज में अच्छी पैठ बना ली है। छत्तीसगढ़ में दो चरणों में मतदान होना तय हुआ है। चुनाव आयोग का यह निर्णय नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में सुदृढ़ बंदोबस्त के ध्येय से प्रेरित बताया गया है। पहले चरण का मतदान 12 नवंबर को 18 विधानसभा क्षेत्रों में तथा दूसरे का 20 नवंबर को 72 विधानसभा क्षेत्रों में होगा। स्थितियां स्पष्ट होने में कुछ समय की प्रतीक्षा करनी होगी। पहला बवंडर टिकटों के वितरण के समय होना लगभग तय है। ‘एन्टी इन्कम्बेंसी’ का मुद्दा भाजपा को अधिक विचलित कर सकता है। जानकार सूत्रों का मानना है कि भाजपा ने अनेक वर्तमान विधायकों की टिकट काटकर 30 से 40 नये उम्मीदवार उतारने का निर्णय करके काट तलाशी है।

 

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here