कमल या कमलनाथ?

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मध्य प्रदेश में चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। समर में भिड़ने को तैयार पार्टियों की कसमसाहट और बेचैनी साफ दिखाई देने लगी है। ‘वर्गों, जातियों, समुदायों, धर्मों, संप्रदायों के राजनीतिक घटाटोप में लोकहित और विकास के मुद्दे तिरोहित हो गए हैं। क्षेत्रीय दलों से कांग्रेस के गठबंधन की धूमिल हो चुकी संभावनाओं और कयासों के बावजूद वह पिछले डेढ़ दशक में पहली बार भाजपा को कड़ी टक्कर देती दिखाई दे रही है। हालांकि पिछले 14 साल से निरंतर सत्ता में बने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान का ‘साμट चेहरा’ कांग्रेस के लिए दुर्धर्ष चुनौती बना हुआ है। गठबंधनों का भरम टूटने के बाद बहुजन समाज पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, आम आदमी पार्टी और नवगठित सपाक्स पार्टी ने सभी 230 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। पिछले दो साल से आदिवासी इलाकों में सक्रिय ‘जयस’ ने भी 80 सीटों पर प्रत्याशी उतारने की बात कही है। इन सबके बावजूद इस बात की संभावना जरा भी नहीं है कि पिछले दशकों से चले आ रहे कांग्रेस-भाजपा के दो दलीय ध्रुवीकरण को दलों का यह दलदल किसी तरह की चुनौती भी दे पाएगा। लेकिन बसपा, गोंगपा, सपा, सपाक्स, आप और जयस जैसे दलों द्वारा मचाई गई कीचड़ में भाजपा का ‘कमल’ खिलेगा या कांग्रेस के कमलनाथ मुस्कराएंगे।

क्षेत्रीय दलों से कांग्रेस के गठबंधन की धूमिल हो चुकी संभावनाओं के बावजूद वह पिछले डेढ़ दशक में पहली बार भाजपा को कड़ी टक्कर देती दिखाई दे रही है। हालांकि पिछले 14 साल से निरंतर सत्ता में बने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का ‘सॉफ्ट चेहरा’ कांग्रेस के लिए दुर्धर्ष चुनौती बना हुआ है। गठबंधनों का भरम टूटने के बाद बहुजन समाज पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, आम आदमी पार्टी और नवगठित सपाक्स पार्टी ने सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है।

यह बता पाना फिलहाल बेहद मुश्किल होगा। कांग्रेस को इन चुनावों में बसपा और सपा से जैसी चुनौतियां मिलती रही हैं लगभग वैसी ही चुनौती भाजपा के लिए दलित एक्ट में बदलाव और आरक्षण से नाराज अगड़ी और पिछड़ी जातियों की ओर से खड़ी होती दिखाई दे रही है। हालांकि सवर्ण और पिछड़ी जातियों के संगठन भाजपा के अलावा कहीं और भी जा सकते हैं। इससे पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर और जनसंपर्क मंत्री नरोत्तम मिश्रा जरा भी इत्तेफाक नहीं रखते। बाबूलाल गौर मानते हैं कि अगड़ी जातियों के पास भाजपा के अलावा कोई अन्य विकल्प ही नहीं है। नरोत्तम मिश्रा सवर्णों को अपना प्रतिबद्ध वोटर बताते हैं। लेकिन राज्य के 52 फीसद ओबीसी यानी पिछड़ा वर्ग किसके साथ है? फिलहाल ‘सपाक्स’ इन्हें अपने साथ बता रही है।

सपाक्स के राज्य अध्यक्ष डॉ. केएल साहू के अनुसार दलित एक्ट के तहत दर्ज 80 फीसद मामले इन्हीं वर्गों के खिलाफ हैं लिहाजा वे ‘सपाक्स’ के साथ हैं। लेकिन ओबीसी, एससी-एसटी एकता मंच के प्रदेशाध्यक्ष लोकेंद्र गुर्जर के मुताबिक यह दुष्प्रचार है। पिछली 23 सितंबर को भोपाल में पिछड़ा, एससी-एसटी संयुक्त मोर्चा के 65 संगठनों का जो जुटान हुआ था उसमें सभी 60 वक्ताओं ने एक सुर से यही कहा था कि इस बार किसी भी सवर्ण को वोट नहीं देंगे। दूसरी तरफ सपाक्स पार्टी बनाने वाले हीरालाल त्रिवेदी दलित एक्ट के लिए कांग्रेस-भाजपा दोनों को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। पिछड़ा, सवर्ण, एससी-एसटी के इस सामाजिक और जातीय गणित ने राज्य में सारे चुनावी समीकरण बुरी तरह उलझा कर रख दिए हैं। सवर्ण वोटरों का यह 15 फीसद तबका ग्वालियर-चम्बल विन्ध्य और मध्य भारत में नतीजे बदल सकता है। संभवत: इन्हीं समीकरणों के मद्देनजर आखिरी क्षणों में मायावती और अखिलेश यादव ने कांग्रेस का हाथ झटक देने में अपनी भलाई समझी होगी क्योंकि एसटी-एससी मायावती और पिछड़ों को अखिलेश यादव अपना वोट बैंक मानते रहे हैं।

बसपा के कांग्रेस के साथ आने से 45 सीटों पर प्रभाव पड़ता। अखिलेश यादव की नजर उन मुस्लिम मतदाताओं पर भी हो सकती है जो कांग्रेस के ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ प्रेम से विचलित नजर आने लगे हैं और अवसर पड़ने पर सपा की झोली में गिर सकते हैं। कांग्रेस के सामने सपा-बसपा की बेरुखी के खतरे तो थे ही, जयस की मौजूदगी ने इसमें भरी इजाफा कर दिया है। प्रदेश में तीसरा बड़ा वोट बैंक आदिवासियों का माना जाता रहा है। प्रदेश में 21 फीसद आबादी आदिवासियों की है और 47सीटें एससी-एसटी के लिए सुरक्षित हैं। आप शायद हैरान रह जाएंगे कि जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन का जन्म फेसबुक पर हुआ था। इसके मौजूदा अध्यक्ष डॉ. हीरालाल हैं जो सन 2016 तक दिल्ली के एम्स में डॉक्टर थे। सन 2012 में उन्होंने फेसबुक पर आदिवासियों के लिए एक पेज बनाया। उनका दावा है कि 10 राज्यों के 15 लाख लोग आज इस पेज पर जुड़े हैं। सन 2016 में मनावर में पहली बार जयस को संगठन का रूप देकर सम्मेलन शुरू किया। इन आयोजनों में फिल्म एक्टर नाना पाटेकर और गोविंदा जैसी नामचीन हस्तियों की मौजूदगी चौंकाने वाली रही। जयस के संस्थापक डॉ. हीरालाल अलावा या उनका संगठन किसी से भी समझौता करने का इरादा नहीं रखता बल्कि इस चुनाव में राजनीति की दिशा बदलना चाहता है। जयस राज्य में सिर्फ कांगे्रस के लिए चिंता का विषय नही है बल्कि भाजपा भी उसके प्रादुर्भाव से परेशान है। मालवा-निमाड़ में 22 सुरक्षित और 6 सामान्य सीटों पर जयस कांग्रेस भाजपा दोनों के लिए चुनौती बन चुकी है। इस क्षेत्र में पिछले विधान सभा चुनाव में 22 सीटों में से भाजपा ने 16 सीटें जीती थीं और कांग्रेस ने 6 सीटें। जयस उन सीटों को फोकस कर रही है जहां 15 हजार से ज्यादा आदिवासी मतदाता हैं।

मध्य प्रदेश में कांग्रेस का ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की राह पकड़ लेना भी हैरान करने वाला कदम रहा है। दलित एक्ट से भड़की आग बुझाने के लिए यदि धर्म की राजनीति को भाजपा ने धार दी है तो कांग्रेस भी इस खेल में पीछे नहीं है। दोनों दलों के राष्ट्रीय अध्यक्ष धर्मस्थलों मे मत्था टेकना नहीं भूल रहे हैं। राज्य की 230 में 109 सीटें इन विख्यात धर्मस्थलों के दायरे में हैं। महाकाल, पीताम्बरा पीठ, ओंकारेश्वर, चित्रकूट, मैहर, मंदसौर का पशुपति नाथ, भोपाल के करीब सलकनपुर आदि पवित्र स्थानों पर अमित शाह, राहुल गांधी, शिवराज सिंह चौहान, कमलनाथ लगातार पहुंच रहे हैं।

कांग्रेस ने तो राम वन गमन यात्रा शुरू कर दी है जो चित्रकूट से चल कर सात जिलों में 27 सीटों से गुजरेगी। 820 किमी की यह यात्रा मध्य अक्टूबर में समाप्त होगी। धर्म और जातियों के इस खेल का बड़ा असर यह हुआ है कि भ्रष्टाचार, महंगाई जो आम जनता की राय में राज्य में चारों तरफ व्याप्त है मुद्दा नहीं बन सका। व्यापमं मुद्दे में पहले ही मात खाती रही कांग्रेस इसे पुनर्जीवित करने की कोशिश मे तो दिखाई दी लेकिन इस बार इस पर फोकस नहीं रहा। बेराजगारी और किसानों के मुद्दे राज्य में ज्वलंत रहे हैं। कांग्रेस चाहती तो इन मुद्दों को ज्यादा धार दे सकती थी लेकिन शिवराज सरकार की घोषणाओं की जबरदस्त बारिश ने तमाम ज्वलंत मुद्दों की जमीन खिसका कर रख दी। रही सही कसर जातिवाद-वर्गवाद ने पूरी कर दी।

 

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