उल्टा पड़ा राहुल का दांव

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राफेल मामले में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने झूठ का पहाड़ खड़ा किया। कांग्रेस देश में अराजकता का माहौल पैदा करना चाहती थी। निशाने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी थे। लेकिन कांग्रेस का यह झूठ उजागर हो गया।

राहुल गांधी का राफेल दांव उल्टा पड़ गया है। वे इस पर बैठ कर 2019 का चुनाव लड़ना चाहते थे। इसलिए राफेल को एक राजनीतिक मुद्दा बनाने की मुहिम कांग्रेस ने शुरू की। उसके लिए झूठ को हथियार बनाया गया। निशाने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी थे। बहाना राफेल था और जरिया अनिल अंबानी को बनाया गया। इसके जरिए कांग्रेस दो बातें प्रचारित करना चाहती थी। पहला- प्रधानमंत्री भ्रष्ट हैं और दूसरा, सरकार गरीबों की नहीं, अमीरों की पैरोकार है।
कोशिश यह थी कि सीबीआई को इस झूठ में शामिल किया जाए ताकि देश में अराजकता का माहौल पैदा हो सके। यह स्थिति सरकार के लिए बेहद शर्मनाक होती। मजबूरन उसे इस्तीफा देना पड़ता। इसी तानेबाने के तहत कांग्रेस राजनीतिक षड्यंत्र रच रही थी। राहुल गांधी को इसका जिम्मा सौंपा गया। वे स्टार प्रचारक की तरह राफेल घोटाले का झूठ फैलाने लगे। उनके पीछे सलाहकार हो लिए। उन्हें लिखा-पढ़ा कर इसके लिए तैयार किया गया था। बताया गया था कि राफेल को ‘बोफोर्स’ में तब्दील किया जा सकता है। इसी बोफोर्स तोप पर सवार होकर वीपी सिंह ने राजीव गांधी को सत्ता से बेदखल किया था। वही सपना सलाहकारों ने राहुल गांधी को दिखाया। राहुल गांधी को सलाह अच्छी लग गयी। अच्छी भी क्यों न लगे? वे तो गुजरात चुनाव से ही प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार हैं। इसे कई बार राहुल गांधी अपने बयानों में दोहरा चुके हैं। पर बयानबाजी से तो कोई प्रधानमंत्री बन नहीं जाता। उसके लिए तो पहले उन्हें अपनी बचकाना छवि से निकलना पड़ता। कांग्रेस ने इसके लिए अभियान चलाया। कई प्रयोग किए। पर राहुल गांधी उसमें विफल रहे। वह बचकाना छवि तोड़ कर बाहर निकल नहीं पाए। फिर कांग्रेस के भीतर नया प्रयोग शुरू हुआ। उन्हें विदेशों में टहलाया जाने लगा। उनसे जगह- जगह भाषण कराया गया। यह प्रयोग सैम पित्रोदा ने शुरू करवाया था।

कोशिश यह थी कि राहुल गांधी की वैश्विक स्तर पर छवि गढ़ी जाए। माना जा रहा था कि इससे वे भारत में नैसर्गिक राजनेता बन जाएंगे। पर ऐसा हुआ नहीं। जब कांग्रेस कार्य समिति ने उन्हें प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किया तो महाकुटुम्ब ने ही राहुल को नेता मनाने से इनकार कर दिया। इससे राहुल गांधी को लेकर कांग्रेस ने जो महल तैयार किया था, वह ढह गया। रणनीतिकार नई रणनीति सोचने के लिए मजबूर हो गए। मजबूर इसलिए कि उनकी योजना विफल होती जा रही थी। राहुल को स्थापित करने और मोदी सरकार को घेरने की हर चाल उलटी पड़ रही थी। कारण यह था कि सरकार ने जो काम किया था, उसमें कोई मुद्दा कांग्रेस को मिल नहीं रहा था। मुद्दों का अकाल सा पड़ गया था। इसी बीच फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति का राफेल को लेकर विवादास्पद बयान आ जाता है। उसे आधार बनाकर कांग्रेस मैदान में कूद पड़ती है। मोदी पर सीधा हमला शुरू हो जाता है।

कहा जाने लगा कि सरकार चोर है। उसने राफेल सौदे में पैसे खाए हैं। अपने उद्योगपति मित्रों की जेब भरने के लिए। वह मित्र अनिल अंबानी हैं। वे उसी रिलायंस समूह से आते हैं जिनके जहाज पर बैठ कर सोनिया गांधी रूस जाया करती थीं। लेकिन उन्होंने रिलायंस की पैरवी कभी नहीं की। राफेल सौदे में संप्रग सरकार के दौरान रिलायंस को साझीदार दसॉल्ट ने खुद बनाया था। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने रिलायंस के लिए दसॉल्ट पर कोई दबाव नहीं बनाया था। पर जब वही दसॉल्ट भाजपा सरकार के शासनकाल में रिलायंस के साथ काम करती है तो राहुल गांधी सरकार पर चोरी करने का आरोप लगाते हैं। यह कुछ और नहीं, कांग्रेस की बेबसी है। उसके पास 2019 के चुनाव में जाने के लिए कोई मुद्दा नहीं है। इसलिए खोजकर ऐसा मुद्दा निकाला गया जिससे प्रधानमंत्री की साख भी खत्म की जा सके और पूंजीपतियों का रहनुमा भी साबित किया जा सके। राफेल दोनों काम एक साथ साध रही था। फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति के बयान ने कांग्रेस को सुनहरा मौका दे दिया। जनता कांग्रेस के इस राजनीतिक षड्यंत्र से अनभिज्ञ थी। वह तो वही सुन और जान रही थी जो राहुल गांधी उसे बता रहे थे। उसे क्या पता था कि कांग्रेस उन्हें गुमराह कर रही है।

धीरे-धीरे इस खेल में खुद को नागरिक समाज का नुमांइदा बताने वाले लोग भी शामिल हो गए। सीबीआई से लेकर सीएजी तक राफेल सौदे की शिकायत की गई। बतौर दस्तावेज अखबारों की कतरनें पेश की गईं। इस बात का ध्यान रखा गया कि कोई भी कतरन उनकी राजनीतिक धार को कुंद न करे। उसी राजनीति के तहत आरोपी सीधे प्रधानमंत्री को बनाया गया। इरादा एकदम साफ था। सीबीआई प्रधानमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधी अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज करें। जो अपने आप में बहुत बड़ी राजनीतिक घटना होती। कांग्रेस को अपने दुष्प्रचार का एक आधार मिल जाता और सरकार से इस्तीफे की मांग करती। नैतिकता के आधार पर प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ता। कारण, इस झूठ का आरोपी तो कांग्रेस ने उन्हें ही बनाया था।

यह पहली बार नहीं है, जब कांग्रेस ने ऐसा राजनीतिक षड्यंत्र रचा हो। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान, वह ऐसा ही षड्यंत्र कर चुकी है। तब भी रक्षा सौदे में हेराफेरी का आरोप वाजपेयी सरकार पर लगा था। सरकार को ‘कफन चोर’ कहकर बदनाम किया गया।

यह पहली बार नहीं है, जब कांग्रेस ने ऐसा राजनीतिक षड्यंत्र रचा हो। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान, वह ऐसे षड्यंत्र का प्रयोग कर चुकी है। तब भी रक्षा सौदे में हेराफेरी का आरोप वाजपेयी सरकार पर लगा था। सरकार को ‘कफन चोर’ कहकर बदनाम किया गया। यह बात कारगिल युद्ध के समय की है। तब रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडीस का सदन में कांग्रेस बहिष्कार करने लगी। सोनिया गांधी ने दुष्प्रचार का ऐसा माहौल खड़ा किया था कि जार्ज साहब को सदन में अपना पक्ष रखने का मौका तक कांग्रेस ने नहीं दिया। जो न्याय के नियमों के खिलाफ था। आरोपी को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाता है। पर कांग्रेस ने जॉर्ज साहब को नैसर्गिक न्याय के नियमों से भी महरूम रखा। मजबूर होकर उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन कांग्रेस को हासिल कुछ नहीं हुआ था। 1999 के आम चुनाव में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी थी। मगर उससे कांग्रेस ने कोई सीख नहीं ली थी। वह दुष्प्रचार अभियान में लगी रही। 2001 में उसे तहलका टेप मिल गया। उसके सहारे एक बार फिर वह हमलावर हो गई। सरकार पर रक्षा सौदे में घोटाले का आरोप लगाया। जॉर्ज साहब फिर निशाने पर थे। लेकिन इस बार कांग्रेस जनता को यह बताने में सफल रही कि सरकार भ्रष्ट है। उसका खामियाजा वाजपेयी सरकार को भुगतना पड़ा। वह 2004 में सत्ता से बाहर हो गई। कांग्रेस दुष्प्रचार के सहारे सत्ता में आई और आते ही सोनिया गांधी ने तहलका टेप की जांच बंद करवा दी। यह स्वाभाविक था। कांग्रेस का हित सध चुका था। उसी से सीख लेते हुए, राहुल गांधी ने राफेल पर अभियान छेड़ रखा है। पर उनका अभियान सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर दम तोड़ चुका है। इस वजह से राहुल गांधी की राफेल राजनीति विफल हो गई।

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