आया ‘ऊंट’ पहाड़ के नीचे

रॉबर्ट वाड्रा से पूछताछ के कारण कांग्रेस परेशान है। जो पिछले कई महीने से, वह जाहिर भी कर रही है। जब उसे कुछ नहीं सूझा तो प्रियंका को मैदान में उतार दिया। रॉबर्ट का अब वे बचाव करेंगी। कैसे करेंगी? यह उनके बयान से जाहिर है। वे कहती हैं कि पूरी दुनिया जानती है कि राबर्ट से पूछताछ क्यों हो रही है? पर जो दुनिया जानती है, उसे प्रियंका नहीं मानती हैं। संभव है कि प्रियंका वाड्रा को बेईमानी और ईमानदारी का फर्क न पता हो। इस वजह से वह ऐसा मानती हों। लेकिन यह लगता नहीं कि उन्हें सही और गलत का फर्क न पता हो। वह बखूबी अंतर समझती हैं। इसलिए जांच को राजनीतिक उत्पीड़न का जामा पहनाने आई।

 

रॉबर्ट वाड्रा से पूछताछ क्यों हो रही, यह पूरी दुनिया जानती है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा ने यही जवाब दिया था, जब पत्रकारों ने रॉबर्ट वाड्रा को लेकर उनसे सवाल पूछा था। उस दिन वे अपने पति को प्रवर्तन निदेशालय छोड़कर, कांग्रेस मुख्यालय लौटी। उनके पति को एजेंसी ने पूछताछ के लिए बुलाया था। उन पर हेराफेरी और हवाला का आरोप है। पर प्रियंका नहीं मानती कि रॉबर्ट ने कुछ गलत किया है। मतलब जो पूरी दुनिया जानती है, उसे प्रियंका नहीं मानती है। संभव है कि प्रियंका वाड्रा को बेईमानी और ईमानदारी का फर्क न पता हो। इस वजह से वह ऐसा मानती हों। लेकिन यह लगता नहीं कि उन्हें सही और गलत का फर्क न पता हो। उन्हें दोनों का फर्क पता है। वे जानती हैं कि रॉबर्ट वाड्रा ने धोखाधड़ी की है। कानून को ठेगा दिखाया है और बेनामी संपत्ति बनाई है। दलाली के पैसे से लंदन में बंगला खरीदा है। एजेंसियां उसी की सफाई मांग रही है। सालों से उन्हें बुलाया जा रहा है। पर वे जाने को तैयार नहीं हुए। तो मजबूर होकर गैर-जमानती वारंट जारी करना पड़ा। तब कहीं जाकर राबर्ड वाड्रा हाजिर हुए। वे पहले भी हाजिर हो सकते थे। मामला रफा दफा हो जाता। लेकिन वह जिस परिवार से संबंध रखते हैं, उसकी शान के खिलाफ था। तभी तो जब रॉबर्ट वाड्रा के ठिकानों पर एजेंसी ने छापेमारी की तो कांग्रेस तिलमिला गई। कायदे से राजनीतिक दल होने की वजह से उसे सरकारी कार्रवाई का समर्थन करना चाहिए था। आखिर वह भ्रष्टाचार के उस नासूर को खत्म करने की मुहिम चला रही हैं, जिसे लेकर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी दुखी थे। इस लिहाज से प्रियंका वाड्रा को सरकार का हाथ बटाना चाहिए। पर वह ऐसा करने के बजाए, रॉबर्ट वाड्रा को सही साबित करने में लगी है। इसकी वजह गांधी परिवार का अहम है। उन्हें लगता है कि उनका परिवार कानून से ऊपर है। इसलिए जो वे करते हैं या बोलते हैं, वही कानून है। इसी वजह से प्रियंका वाड्रा मानने को तैयार नहीं है कि रॉबर्ट वाड्रा ने कुछ गलत किया है। वे तो खुद ही कानून हैं, तो गैर-कानूनी काम कैसे कर सकते हैं।

रॉबर्ट वाड्रा को लेकर कांग्रेस का यही रवैया हमेशा से रहा है। तभी तो कोर्ट के कहने पर भी दामादश्री की जांच सप्रंग सरकार ने नहीं होने दी। अधिकारियों ने रॉबर्ट को रंगे हाथ हेराफेरी करते पकड़ लिया, पर कांग्रेसी सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। वह हाथ पर हाथ धरे बैठी रही और वाड्रा कानून से आंख मिचौली करते रहे। दस जनपथ यह सब देख कर मगन था और न्याय बिलख रहा था। कानून के समक्ष समानता का अधिकार दम तोड़ रहा था। पर राजमहल में बैठी महारानी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। उनके दरबारी रॉबर्ट वाड्रा की हेराफेरी को व्यापार का नाम देने लेगे। पूरी सप्रंग सरकार उनके बचाव में उतर आई। सभी वाड्रा को क्लीन चिट देने लगे। कहने लगे कि वाड्रा ने कोई गड़बड़ी नहीं की है। पी.चिदंबरम तो वाड्रा का आयकर रिटर्न लेकर मीडिया के सामने आ गए थे। बताने लगे कि प्राइवेट सिटीजन यानी सोनिया गांधी के दामाद बेकसूर है। उन्होंने कोई हेराफेरी नहीं की है।

रॉबर्ट के लिए प्रियंका मैदान में
सच कहूं तो मैं राजनीति में नहीं जाना चाहती हूं। मैं अपनी जिंदगी में खुश हूं। राजनीति के कई पहलू ऐसे हैं जो मुझे सूट नहीं करते हैं। मेरे दो बच्चे भी हैं। मैं उन्हें बेहतर बचपन देना चाहता हूं। कारण, मेरा बचपन बहुत अस्वाभाविक ढंग से बिता है। हमने बचपन में ही बेहद मुश्किल हालात देखे हैं। मैं नहीं चाहती कि मेरे बच्चे वैसा बचपन देंखे। इस वजह से राजनीति में जाने का कोई इरादा नहीं है। जहां तक बात मेरे भाई की है तो वह सक्षम हैं। उन्हें राजनीति में मेरे सहयोग की जरूरत नहीं है। 2009 में आउटलुक को दिए गए साक्षात्कार में प्रियंका वाड्रा ने यही कहा था। जाहिर है कि वे राजनीति के खेल में बच्चों का बचपन कुर्बान नहीं करना चाहती थी। इसी वजह से दूर रहने का निर्णय लिया। 25 जनवरी को राहुल गांधी ने प्रियंका की बात को दोहराया। तो सवाल है कि राजनीति जिन्हें नहीं सुहाती थी, वे राजनीति में क्यों आर्इं? कयास तो कई लगाए जा रहे हैं। विश्लेषकों की अपनी-अपनी राय है। पर असल बात न तो पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति है और न जाति विशेष को अपने पाले में करने की कावायद। मसला रॉबर्ट वाड्रा का है। उन पर हेराफेरी और हवाला का आरोप है। जांच एजेंसियां उसकी जांच कर रही हैं। कांग्रेस इसे लेकर परेशान थी। वह इस मामले का राजनीतिकरण करना चाहती है। इरादा यह है कि जांच को राजनीतिक उत्पीड़न का रंग दिया। कांग्रेस इस कोशिश में पिछले कई सालों से लगी है। पर उसे सफलता नहीं मिल पाई। कारण, रॉबर्ट वाड्रा भ्रष्टाचार के दलदल में इतने गहरे तक धंसे हैं कि कांग्रेस की घर उन्हें और अंदर धकेल देती है। इससे जनता को भ्रमित करने स्वांग अधूरा रह जाता है। वह कैसे पूरा हो? प्रियंका वाड्रा उसका जबाव है। यही वह नाकाब है जिससे रॉबर्ट वाड्रा के भ्रष्टाचार को ढका जा सकता है और उस पर राजनीतिक उत्पीड़न की राजनीतिक रोटी सेंकी जा सकती है। चुनावी दंगल में यह बहुत जरूरी होता है। कांग्रेस ने वही चाल चली और प्रियंका वाड्रा को राजनीति में उतार दिया। वे अब घूम-घूम कर बताएगी कि रॉबर्ट वाड्रा को गांधी परिवार से जुड़ा होने के कारण उत्पीडि़त किया जा रहा है।

यह कांग्रेसी कहानी बोफोर्स के समय से चल रही है। तब राजीव गांधी बेगुनाह थे। उन्होंने स्वीडिश कंपनी से पैसा लिया था। उनकी सरकार ने उन्हें क्लीनचीट दे दिया था। कमोवेश यही रॉबर्ट वाड्रा के मामले में हुआ। जमीन घोटाले में फंसे दामाद को मनमोहन सरकार ने बरी कर दिया और उस अधिकारी के पीछे पड़ गई, जिसने रॉबर्ट वाड्रा के घोटाले का पदार्फाश किया था। उस अधिकारी का नाम अशोक खेमका है। किस्सा 2012 का है। मामला हरियाणा से जुड़ा है।
तब वहां कांग्रेस की सरकार थी और भूपेंद्र सिंह हुड्डा उसके मुखिया। केंद्र में सप्रंग सरकार थी जो 2004 से सत्ता में काबिज थी। 2007 में रॉबर्ट वाड्रा ने रियल इस्टेट के धंधे में कदम रखा। पांच कंपनियां बनाई। सब रियल इस्टेट के कारोबार में उतरी। पूंजी थी उनके पास 50 लाख रुपये। उससे पांच साल में वाड्रा में 300 करोड़ रुपये की संपत्ति बनाई। यह अपने आप में अजूबा था। लोगों की उम्र बीत जाती है तब भी इतनी पूंजी नहीं बना पाते हैं, जितनी वाड्रा ने पांच सालों में बनाई थी।

जाहिर है वे होनहार होंगे। तभी तो धंधे में आते ही कमाल करने लगे। डीएलएफ जैसी कंपनी उन्हें ब्याज मुक्त कर्ज देने लगी। खुद वह बैंक से साढ़े बारह फीसदी की दर पर कर्ज लेती थी। पर वाड्रा की साख ऐसी थी कि उन्हें ब्याज देने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। उनकी चार दिन पहले बनी कंपनी को कर्ज मिल जाता है। वह भी हजार दो हजार का नहीं करोड़ों का। उससे वे मानसेर में साढ़े तीन एकड़ जमीन खरीद लेते हैं। वह खेती के लिए खरीदी जाती है। कीमत तकरीबन 7.5 करोड़ रुपये अदा की जाती है। वे जमीन के लिए 12 फरवरी 2018 को आवेदन करते है। अगले ही दिन साढ़े तीन एकड़ जमीन उन्हें मिल जाती है। कायदे से इस काम में महीना भर लगता है। पर यह मामला दमाद का था तो कागजी कार्रवाई पूरा होने में 24 घंटा भी नहीं लगा। जमीन वाड्रा की कंपनी को मिल गई। वह खेतीहर जमीन थी तो उस पर खेती ही होनी थी। तब लोग यही जान रहे थे। यह उनका भ्रम था। महारानी का दमाद खेती करता। यह तो उनकी शान में गुस्ताखी होती। जो करने की कोई हिम्मत नहीं कर सकता था। कारण, कांग्रेस तो राजशाही में जी रही है। तो जाहिर है दमाद की व्यवस्था भी हरियाणा सरकार को करनी थी। उसने किया। महीने भर के अंदर हरियाणा सरकार ने साढे तीन एकड़ जमीन का भू-उपयोग ही बदल दिया। मतलब जिस जमीन पर खेती होती थी, वहां पर वाड्रा को रिहाइशी कॉलोनी बनाने का लाइसेंस दे दिया। लाइसेंस मिलते ही डीएलफ ने 58 करोड़ रुपये में जमीन खरीद लिया। यह वही जमीन है जिसे महीने भर पहले वाड्रा ने 7.5 करोड़ रुपये में खरीदा था। कर्ज भी डीएलएफ ने दिया। खरीदा भी डीएलएफ ने। वह भी सात गुना कीमत में। इस खरीद फरोख्त में हर स्तर पर कानून तोड़ा गया था।

यह बात बतौर अधिकारी अशोक खेमका ने पकड़ ली। उन्होंने वाड्रा से जमीन की खरीद के कागजात मांगे। उसे जमा किया गया। उसमें वाड्रा के खेल की पोल खुल गई। खेमका ने जमीन का सौदा रद्द कर दिया। कांग्रेस को उनका रवैया पसंद नहीं आया। उन्होंने महारानी के दमाद का सौदा रद्द किया था। यही उनकी गलती थी। वे भूल गए थे कि गांधी परिवार के अलग कानून चलता है और बाकी नागरिकों के लिए अलग। यही खेमका से चूक हो गई। उन्होंने देश का कानून वाड्रा पर लागू कर दिया। उसकी कीमत अशोक खमेका को चुकानी पड़ी। उन्हें डराया धमकाया जाने लगा। जान से मारने की धमकी दी जाने लगी। उनका अपराध बस इतना था कि उन्होंने रॉबर्ट वाड्रा की हेराफेरी उजागर कर दी थी।
आयकर विभाग ने यह अपराध नहीं किया। वहां मोर्चे पर खुद वित्तमंत्री पी. चिदंबरम थे। उन्हें इस खरीद में कोई कमी नजर नहीं आ रही थी। वह भी जबकि इस खरीद-फरोख्त में वाड्रा को 50 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा हुआ था। तो कायदे से उसे कर लगाना था। उसकी वसूली होनी थी। पर उस मुनाफे को तत्कालीन वित्तमंत्री ने नजर अंदाज कर दिया। यह कैसे संभव है कि कोई 50 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाए और कर भी न दे। उस पर भी सरकार मेहरबान रहे और कहे कि, फला व्यक्ति ने कोई चोरी नहीं की। अगर रॉबर्ट वाड्रा के अलावा कोई और ऐसा करता तो क्या सप्रंग सरकार उसे छोड़ देती। जाहिर है नहीं छोड़ती। करूणानिधि की पुत्री कनीमोझी इसका प्रमाण है। रॉबर्ट वाड्रा ने भी सरकारी खजाने को चूना लगाया था और कनीमोझी ने भी। लेकिन कनीमोझी को सजा हुई और रॉबर्ट वाड्रा को दमाद होने का फायदा मिला। मगर यही फायदा जगन मोहन रेड्डी को नहीं मिला। उनके और वाड्रा के अपराध में कोई अंतर नहीं है। पर सप्रंग सरकार जगन के पीछे पड़ गई थी। सीबीआई उनकी संपत्ति की जांच करने लगी। उनसे पूछताछ की गई। आरोप हवाला और हेराफेरी का लगा। यही आरोप रॉबर्ट वाड्रा पर है। लेकिन तब उनसे न तो आयकर विभाग ने सवाल किया और न ही सीबीआई ने। उसे राबर्ट वाड्रा से सवाल करना चाहिए था। लेकिन उनसे सवाल पूछने के बजाए जांच एजेंसियां उनकी मदद करने में लगी थी। वजह बस एक ही थी, वे गांधी परिवार के दामाद है। इस लिहाज से कुछ भी करें, वे कानून के दायरे में नहीं आते। तभी तो उन्होंने हरियाणा से लेकर राजस्थान तक जमीन खरीदी। पर किसी कानून का पालन नहीं किया। बीकानेर में तो वाड्रा ने सारी हदें तोड़ दी थी। अशोक गहलोत की सरकार उसमें साथ खड़ी थी। किसानों की जमीन पर कब्जा हो रहा था और गहलोत देख रहे थे। प्रियंका भी तब चुप थीं। किसानों के मसीहा राहुल गांधी भी खामोश थे।

कुछ लोग यह बात लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट चले गए। कोर्ट ने सप्रंग सरकार से पूछा कि वह रॉबर्ट वाड्रा वाले मामले की जांच क्यों कर रही है? तो सरकार ने कहा कि मामला राजनीति से प्रेरित है। इसमें कोई दम नहीं है। बिना वजह लोग इसे तूल दे रहे हैं। जब यही बात सुप्रीम कोर्ट पहुंची तो सरकार ने फिर रटा-रटाया जवाब दिया। हद तो तब हो गई जब संसद में राबर्ट वाड्रा का मामला उठाया गया तो सदस्यों को बोलने नहीं दिया गया। स्पीकर मीरा कुमार ने चुप करा दिया। लेकिन सच कहां छुपता है। हुआ भी वहीं। जमीन घोटाले में फंसे राबर्ट वाड्रा का नाम पिलाटस में भी आने लगा। कहा जाने लगा कि उनके मित्र संजय भंडारी इस सौदे में दलाली कर रहे थे। रॉबर्ट वाड्रा उनकी मदद करने में लगे थे। वे दबाव बना रहे थे कि प्रशिक्षण विमान का ठेका पिलाटस को दिया जाए। पर हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड का जोर था कि ठेका उसे मिले। यह वही कंपनी है जिसे लेकर राहुल गांधी अभियान चला रहे हैं और कह रहे है कि सरकार हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड को डूबाने में लगी है। पर वे यह नहीं बता रहे हैं कि रॉबर्ट वाड्रा के लिए हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड को बलि का बकरा सप्रंग सरकार ने बनाया था।

हुआ यूं कि वायुसेना को प्रशिक्षु विमान की जरूरत थी। उसने यह रक्षा मंत्रालय को बताया। मंत्रालय में विमान खरीदने की बात चली। निविदा निकाली गई। हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड बनाने के लिए तैयार हुआ। पर उसे बनाने नहीं दिया गया। उसके सुझाव को खारिज कर दिया गया। सवाल उठता है क्यों? आरोप है कि ऐसा राबर्ट वाड्रा की वजह से किया गया। उनके साथी भंडारी पिलाटस के लिए दलाली कर रहे थे। पिलाटस भी प्रशिक्षु विमान बनाना है। वे चाहते थे कि विमान पिलाटस से खरीदा जाए। वह तभी संभव था, जब सबको बाहर कर दिया। यही किया गया। पिलाटस की निविदा में तमाम कमी के बाद भी प्रशिक्षु विमान का ठेका, उसे दिया गया। दावा किया जा रहा है कि ऐसा सिर्फ राबर्ट की पैरवी से हुआ। इसकी एवज में उन्हें भी दलाली मिली। इसका खुलासा तब हुआ जब वह टिकट मिला जिसको संजय भंडारी ने रॉबर्ट वाड्रा के लिए कराया था। वह टिकट नीस से ज्यूरिख का था। टिकट की कीमत लाखों में थी। उसे संजय भंडारी ने यूं वाड्रा के लिए तो कराया नहीं होगा। कुछ तो सौदा हुआ होगा। वह क्या था? इससे जानने की कोशिश सप्रंग सरकार ने नहीं की। जब लंदन में बंगला मिला तो भी कोई सुगबुगाहट सरकार में नहीं हुई। जाहिर है सबको चुप रहने का फरमान जारी हुआ था। इसलिए हर कोई खामोश था।

मगर 2014 में जब सत्ता बदली तो कानून ने काम करना शुरू किया। जांच एजेंसियां पता करने लगी कि आखिर जमीन कैसे खरीदी गई। डीएलएफ क्या सभी को करोड़ो रुपये उधार यूं ही उधार देता है। इसे लेकर छानबीन चल ही रही थी कि सरकार ने बेनामी संपत्ति कानून बना दिया। तब यह रहस्य खुला कि लंदन में किसी का बंगला भी है जो बेनामी है। वह किसका है, इसे लेकर भी जांच पड़ताल चलने लगी। तभी संजय भंडारी के यहां छापा पड़ता है। उस छापे में कई सफेदपोश का नाम सामने आता है। उसी में पता चलता है कि वाड्रा राफेल की भी दलाली में लगे थे। बंगले का रहस्य भी तभी खुला। जांच आगे बढ़ी। आरोपियों से पूछताछ करने की बारी थी। सच को उजागर करना था। वह दो ही लोग बता सकते थे। एक, संजय भंडारी और दूसरे, खुद रॉबर्ट वाड्रा। भंडारी तो देश से भाग निकले। बचे रॉबर्ट वाड्रा। तो उन्हें एजेंसी ने पूछताछ के लिए बुलाया। पर वाड्रा तो खुमारी में थे। कानून को ठेंगे पर रखने वाली आदत गई नहीं थी। उसी के मुताबिक वे एजेंसी के बुलावे पर नहीं गए। प्रवर्तन निदेशलाय ने उन्हें दर्जनों बार अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया। लेकिन रॉबर्ट वाड्रा ने नहीं सुना। फिर उनके खिलाफ एजेंसी को गैर-जमानती वारंट जारी करना पड़ा। तब जा कर वाड्रा प्रवर्तन निदेशालय में हाजिर हुए। लेकिन वे जिस तरह निदेशालय गए, उसमें राजनीति थी। उन्हें छोड़ने प्रियंका गई। वह भी इस अंदाज में मानो रॉबर्ट वाड्रा को जबरदस्ती फंसाया जा रहा हो। उन्हें प्रताडि़त किया जा रहा हो।

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