सख्त हो हमारी पाकिस्तान नीति

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पुलवामा का बदला बालाकोट में लिए जाने के बाद की परिस्थिति विचारणीय है। चीन के द्वारा सुरक्षा परिषद् में पाकिस्तान का बचाव और मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने में रुकावट डालने से भारत सुरक्षा व्यवस्था के बारे में नये सिरे से सोच रहा है। वैसे लोगों की भावनाएं एक मजबूत धारणा में तब्दील होती हुई दिखाई दे रही हैं। ‘न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।’ न होगा पाकिस्तान और न बनेगी चीन-पाकिस्तान गठबंधन की भारत विरोधी मुहिम। भारत ने पाकिस्तान को वे सभी सुविधाएं और सह अस्तित्व दिया, जो एक पड़ोसी देश दे सकता है। बंटवारे के बाद गांधी जी की इच्छा पर 80 करोड़ की मोटी रकम पाकिस्तान को दिए जाने के बाद भी भारत ने उदारता की कई मिसालें पेश की है। 1948 में भारत ने युद्ध विराम की पहल की। 1965 में हाजी पीर धर्म स्थल को पाकिस्तान को लौटा दिया। 1971 के युद्ध में तकरीबन 93 हजार बंधक पाकिस्तान सैनिकों की रिहाई शिमला समझौते के अंतर्गत की गई। भारत के द्वारा पाकिस्तान को 1996 में ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा दिया गया। 1999 में बस कूटनीति की शुरुआत की गई। नेहरू, गुजराल और वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा शुरू किए ‘प्रथम पड़ोसी देश’ की नीति के तहत पाकिस्तान को विशेष सुविधाएं मुहैया करवाई गईं। बदले में पाकिस्तान बिच्छू की तरह डंक मारता रहा। 1947 के कबिलाई आक्रमण की आड़ में पाकिस्तानी सेना के द्वारा किए गए हमले से लेकर पुलवामा आक्रमण तक पाकिस्तान निरंतर भारत विरोधी गतिविधियों को हवा देता रहा।  रण आॅफ कच्छ में 1965 में पाकिस्तान ने आक्रमण किए। 1999 में कारगिल में खूनी जंग की शुरुआत की।

संसद भवन पर हमला, मुंबई हमला, उरी और पुलवामा जैसे दर्जनों आतंकी हमले को पाकिस्तान अंजाम देता रहा है। हर घटना के बाद वह झूठ के पुलिंदों के द्वारा अपनी बेबसी का गीत गाता रहा। भारत की सोच का एक ही आधार था। एक सम्पन्न और मजबूत पाकिस्तान भारत और दक्षिण एशिया के लिए जरूरी है। अब इस सोच को बदलना भारत की मजबूरी है।

चीन की पाकिस्तान नीति
पाकिस्तान का विखण्डन भारत की सोच और नीति होनी चाहिए। यह एक आवश्यक शर्त बन चुकी है। इसके कई कारण हैं। पहला, चीन-पाकिस्तान गठबंधन भारत विरोध की नींव पर टिका हुआ है। चीन के लिए पाकिस्तान से बेहतर कोई देश नहीं हो सकता, जो उसकी शर्तों का एक नियामक की तरह अनुसरण करे। यही कारण था कि चीन ने जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के प्रस्ताव को चौथी बार बड़ी चालाकी से टाल दिया। अब इसमें समय लग सकता है। सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव 1267 बेकार हो गया। अगर मसूद आतंकी घोषित होता तो इसके कई फायदे भारत को मिलते। मसूद की सारी संपत्ति और हथियार जब्त हो जाते। चीन और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के बीच एक समझौता 1989 में हुआ था। इसमें इस बात की चर्चा थी कि यह आतंकी संगठन चीन के मुस्लिम बहुल इलाके में अपनी टांग नहीं फैलाएगा। उसी समझौते के तहत चीन, पाकिस्तान की शह पर पल रहे संगठनों की मदद कर रहा है।

पाकिस्तान विखंडन के मुहाने पर

प्रश्न महत्वपूर्ण यह है कि पाकिस्तान का विखंडन होगा कैसे? भारत अमेरिका संबंध इसमें कैसे सहायक होगा? इन प्रश्नों की जांच पड़ताल जरूरी है। पाकिस्तान आज पूरी तरह से दलदल में फंसा हुआ दिख रहा है। पाकिस्तान की कपोल कल्पना करने वाले मशहूर शायर इकबाल और कायदे-आजम-जिन्ना ने अपने जीवन काल में ही दीमक लगते हुए देख लिया था। पाकिस्तान की एक लेखिका ने 1945 से लेकर 2019 तक की यात्रा को चार खंडों में बांटा है जो पाकिस्तान का सही चित्रांकन करता है। पहले खंड में 1945 से 1951 के बीच को मुस्लिमवाद को सजाने की कोशिश की गई। मालूम है कि 1971 में बांग्लादेश के अलग होने के बाद पाकिस्तान का मुस्लिम ढांचा पूरी तरह से टूट गया। जैश-ए-मोहम्मद जैसे दर्जनों संगठन सेना और सरकार के पथ प्रदर्शक बन गए। उनकी विषाद की एक ही पहचान थी- भारत विरोध। 1974 के बाद पाकिस्तान के टेक्सबुक में मुस्लिम आक्रमणों की वीर गाथा लिखी गई, जिन्होंने भारत पर आक्रमण किए थे। इस व्यवस्था में भी पाकिस्तान एक नहीं बन पाया। वहां शियाओं पर आक्रमण तेज हो गए। अहमदिया को मुस्लिम का दर्जा नहीं दिया गया। क्षेत्रीय घटक अलग होने लगे।

पाकिस्तान के अस्तित्व को खत्म करना बहुत सरल हो गया है। पाकिस्तान के भीतर चार प्रांत हैं- पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और फाटा। पहला बलूचिस्तान 1948 से ही पाकिस्तान से अलग होना चाहता है। यह पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है। करीब पूरे पाकिस्तान का 42प्रतिशत हिस्सा इसमें शामिल है। यह एरिया आर्थिक रूप से सबसे पिछड़ा हुआ है। इसकी सीमाएं अफगानिस्तान और ईरान से मिलती हैं। सबसे लंबी पाकिस्तान की समुद्री सीमा भी यहां से जुड़ा हुआ है। खनिज संपदा भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। भाषा और संस्कृति भी पाकिस्तान की संस्कृति से भिन्न है। 1948 के रिफरेन्डम में केवल 50.5 प्रतिशत लोगों ने ही पाकिस्तान में विलय की सहमति जताई थी। शेष लोग पाकिस्तान से अलग होना चाहते थे। चीन के अरबों डॉलर के प्रोजेक्ट का केंद्र भी वही है। बलूच लोगों के बीच चीन के प्रति गंभीर आक्रोश है। वहां के अलगाववादी तत्वों से निपटने के लिए पाकिस्तान की सरकार ने एक लाख 65 हजार सैनिकों की एक अलग फोर्स तैयार की है, जिसके तहत बलूच लोगों पर अत्याचार किया जा सके।

दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र जो पाकिस्तान के क्षेत्राधिकार से बाहर का था, वह गिलगित बालटिस्तान है। यह क्षेत्र जम्मू कश्मीर का हिस्सा हुआ करता था। इसे अंग्रेजों ने पाकिस्तान में मिलाने की व्यूह रचना रची। चीन की सीपेक परियोजना इसी क्षेत्र से होकर गुजरती है। पाकिस्तान ने इसी खंड के मुख्य भाग चीन को देकर भारत के लिए सुरक्षा व्यवस्था गंभीर बना दिया है। पिछले कुछ वर्षों से इस क्षेत्र में भी पाकिस्तान विरोधी मुहिम शुरू हो चुकी है।

सिंध में भी विद्रोह की हवा तेज है। भारत से गए हुए मुसलमान ज्यादातर सिंध के कराची में स्थित हैं। वे पाकिस्तान की पंजाबी संस्कृति से घृणा करते हैं। शिया समुदाय भी तंग है। हिंदुओं और क्रिश्चियन लोगों की हालत तो बदतर है। चूंकि इन लोगों की संस्कृति एक नहीं है। भाषा और बोल- चाल अलग अलग है। पंजाब की तानाशाही अन्य समुदाय को तोड़ चुकी है। लोग एक अलग राज्य की मांग दशकों से कर रहे हैं। पाकिस्तान की आर्थिक पंगुता ने उसे और बेहाल बना दिया है। स्थिति गंभीर है। भारत वर्षों से एक मजबूत पाकिस्तान का ताना-बाना बुनता रहा। आज एक विखंडन की नींव की शुरुआत की जरूरत है। पाकिस्तान से इस्लामिक आतंकवाद को खत्म करना है तो यही एक रास्ता ज्यादा सटीक दिखता है। संभव है आणविक हथियारों की चुनौती सामने आएगी लेकिन उसका दमखम और चीन का डमरू तो नष्ट हो ही जाएगा।

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