कुछ हमलों से खत्म नहीं होगा आतंकवाद

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भा रत की सामरिक इच्छाशक्ति और कूटनीतिक प्रभाव के जरिये विश्व समुदाय में पाकिस्तान को अलग-थलग करने का प्रदर्शन जबरदस्त रहा। मुमकिन है किसी मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के प्रस्ताव से प्रतिबंधित कर दिया जाये, जैसा कि पहले अन्य आतंकी संगठनों को लेकर किया गया। लेकिन क्या पाकिस्तान से दुनिया में आतंक का निर्यात कहीं भी कम हुआ? हम भारत सरकार के बदलते तेवर से खुश हो सकते हैं पर यह समस्या का शाश्वत निदान कत्तई नहीं है। इस्लाम की कुछ हित-साधक लोगों द्वारा गलत परिभाषा, धर्म के व्यावहारिक पक्ष में बदलाव न होने देने की उनकी जिद, पाकिस्तानी समाज में अशिक्षा के कारण एक बड़े वर्ग का जड़वत रहना, जम्हूरियत का आवरण लेकिन भ्रष्ट और अय्याश सेना का अपने हित में आतंकवाद को राज्य-नीति का अघोषित रीढ़ बनाना और इसके लिए हर प्रजातांत्रिक संस्थाओं पर शिकंजा कसे रहना… क्या किसी सुरक्षा परिषद के 1267 समिति के फैसले से या भारत के एक बमबारी में करीब 300 आतंकियों को मारे जाने से खत्म हो सकता है?

समय यह समझने का है कि भू-राजनीतिक-आर्थिक-रणनीतिक स्थितियों का हमारे पक्ष में होने से क्या इस वायु हमले को यहीं रोक कर पाकिस्तान के अगले कदम का इन्तजार किया जाये। फिर आतंकवाद की खेती हमेशा के लिए खत्म करने के लिए विश्व समुदाय, जैसे इजरायल, ब्रिटेन और अमेरीका की सहमति और समर्थन से दुश्मन पर अगले हमले का भी आगाज किया जाये। पाकिस्तान हुक्मरान चाहें भी तो यह काम नहीं कर सकते जो भारत विश्व शांति के लिए आज कर सकता है।

दुनिया के 3500 साल के लिखित इतिहास में शायद पाकिस्तान और यहां से परमाणु शक्ति-संपन्न सेना द्वारा चलाये जा रहे इस्लामिक आतंकवाद ने इतनी गहरी जड़ें पकड़ रखी हैं कि अब अगर पाकिस्तान की सेना भी चाहे तो इसे खत्म नहीं कर सकती। वैसे अपने अस्तित्व के लिए भी खत्म करना नहीं चाहेगी जब तक पाकिस्तान का बड़ा समाज इसके लिए मर-मिटने के भाव में खड़ा न हो। 9/11 के हमले में भी अमेरीका को पाकिस्तान के आतंकियों खासकर बाद में वहीं शरण में रहे ओसामा बिन लादेन के प्रमाण मिले। ग्वांटेनामो में गिरμतार बंदियों में से कई पाकिस्तानी नागरिक थे और बालाकोट में प्रशिक्षित हुए थे। उनकी जानकारी अमेरिका ने पाकिस्तान सरकारों को दी। ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान की राजधानी से मात्र 50 किलोमीटर दूर ऐबोटाबाद में मारे जाने के बाद अति-उत्साह में अमेरीकी राष्ट्रपति ओबामा ने कहा ‘यह अमेरिका का अल कायदा को खत्म करने के अभियान में अप्रतिम सफलता है।’ हालांकि अल कायदा इसके बाद ज्यादा खतरनाक अयमान अल जवाहिरी के हाथों चला गया। अब ओसामा बिन लादेन के बेटे के युवा और खूंखार हाथों में अल कायदा के नेतृत्व के जाने की बात चल रही है। जमात-उद-दावा का मुखिया हाफिज हर तीसरे दिन जनसभा करता हुआ खुले आम लोगों को बरगलाता है। फिदायीन हमले के दस दिन पहले जैश-ए-मुहम्मद के मुखिया और इस कांड के जन्मदाता मसूद ने पाकिस्तान में अपनी तकरीर में कहा था कि अगर सब कुछ सही रहा तो एक महीने में हिंदुस्तान से कश्मीर को आजाद करा लिया जाएगा।

आतंकी संगठन अल बद्र के तीन हथियारबंद प्रतिनिधि पाकिस्तानी प्रान्त के दीर जिले के मुख्य चौराहे पर अपने संगठन में भर्ती की प्रक्रिया का एलान कर रहे थे। ‘मुजाहिदीन और पाक मिलिट्री एक हैं’ कह कर उन्हें भरोसा दे रहे थे। पाकिस्तानी अखबार डॉन ने 28 फरवरी, 2019 के संस्करण में इसका खुलासा किया और भारतीय खुफिया विभाग के पास भी इसके प्रमाण हैं। ये वही कबायली हैं जिन्होंने 1947 में भारत पर हमला किया था और भयंकर हिंसा, लूट और बलात्कार के बाद कश्मीर पर कब्ज़ा करने जा रहे थे।

आजाद भारत के इतिहास में पाक-प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ पहला शक्तिशाली इच्छाशक्ति का मुजाहरा सेना द्वारा 27 फरवरी, 2019 को हुआ। अमरीका की एफ बी आई के पास वे सभी काल डिटेल्स हैं, जिनमें कश्मीर में बैठे पुलवामा हमले के सेल के चार सदस्य पाकिस्तान में जैश के सरगनाओं से आदेश ले रहे थे। इसे भारत और अमेरीका ने सभी मुख्य देशों को बताया भी। साथ ही भारत ने एक डोसियर भी पाकिस्तान सरकार को दिया जिसमें सन 2014 से 17 तक कश्मीर में आतंकी घटनाओं में पकडेÞ गए चार आतंकी सरगनाओं के पाकिस्तानी होने, उनके घर के पते के साथ दिया गया। जिस दिन पुलवामा पर फिदायीन हमला किया गया, उस दिन इस आॅपरेशन से जुड़े सेल के चार सदस्यों का लगातार पाकिस्तान स्थित हैंडलरों से जो जैश के कार्यालय में उपस्थित थे, बातचीत का ब्यौरा अमरीका के एफ बी आई ने न केवल भारत को सौंपा है, बल्कि पाकिस्तान सहित दुनिया के तमाम बड़े देशों को भी। क्या अब भी किसी प्रूफ की जरूरत है? फिर इस घटना की जिम्मेदारी स्वयं मसूद अजहर और उसके संगठन ने एक विडिओ जारी कर लिया है, जिसमें उस हमलावर फिदायीन का बयान भी है। मुंबई हमले का मुख्य अभियुक्त कसाब पाकिस्तान के किस गांव का रहने वाला था, यह भी तथ्य पूरे विश्व को पिछले दस साल से मालूम है।

खुफिया एजेंसियों की भूमिका महत्वपूर्ण
भारत की जबरदस्त सैन्य, कूटनीतिक और नैतिक सफलता के पीछे भारत की तीन खुफिया एजेंसियों -आई बी, रॉ और मिलिट्री इंटेलिजेंस की वर्षों की साधना काम आयी। साथ ही हमारे मित्र देशों -खासकर इजराइल और अमरीका ने भी खास किस्म की मदद की है। इसका एक छोटा सा मुजाहरा वह लिस्ट करती है, जिनमें उन आतंकियों/फिदायिनों और ट्रेनरों के नाम, पते, फोन नंबर हैं जो भारत के ताज़ा हमले के दिन उस ट्रेनिंग कैंप में थे। पुलवामा फिदायीन हमले की ‘सफलता’ का जश्न मनाने के लिए और साथ हीं दजऱ्नों ऐसे ही आत्मघाती हमले से आने वाले कुछ हμतों में भारत को दहलाने की तैयारी के लिए वे एकत्र हुए थे।
1947, 1965, 1971 और 1999 में भी तो युद्ध हुए। सबके पीछे पाकिस्तान रहा। फिर भी कारगिल ऐसे ‘घोषित’ अघोषित सैन्य युद्ध में भी हमारी वायु-सेना के जहाजों को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने सीमा पार करने की इज़ाज़त नहीं दी थी। यह विकल्प मुंबई आतंकी हमले के बाद भी खुला था, जनता का दबाव भी था और कुछ हीं महीनों में चुनाव भी। तब तत्कालीन मनमोहन सरकार ने भी इस विकल्प को नहीं चुना। खुफिया जानकारी एक-एक चप्पे की थी-बालाकोट के आतंकी ट्रेनिंग अड्डे की भी। अमेरीका को भी इस अड्डे की सारी गतिविधि की रिपोर्ट उसकी सेना के मेजर-जनरल मिलर ने 31 जनवरी, 2004 को अपनी रिपोर्ट में दी थी। उस जानकारी के अनुसार, ग्वान्तिनामो में बंद कैदियों में से एक पाकिस्तानी नागरिक हाफिज रहमान ने बताया कि कैसे उसकी ट्रेनिंग इस आतंकवादी कैंप में की गयी थी। विकिलीक्स ने इस रिपोर्ट का खुलासा किया था और भारतीय खुफिया विभाग और रॉ ने भी बाद की अपनी रिपोर्ट में सरकार को यह सब कुछ बताया था। यह भी सही है कि मुंबई आतंकी हमले के बाद एयरफोर्स ने इसी तरह मुजμफराबाद में मिराज 2000 से लक्ष-भेदी हमले की पूरी तैयारी कर ली थी। मदद के लिए था वही सुखोई विमान ,लेकिन सरकार से इजाज़त एक महीने के इंतज़ार के बाद भी नहीं मिली। उसका जिक्र तत्कालीन स्क्वाड्रन लीडर जो सुखोई के इस हमले के लिए तैयार थे, उन्होंने अपने एक ट्वीट में किया है।
मोदी के तेलाबीब जाने के बाद इसरायल से बढ़ती दोस्ती भरोसेमंद दोस्ती के रूप में तब्दील हुई। वर्ष 1999 से 2010 तक देश आर्थिक विकास के प्रारंभिक दौर में था और अमेरीका भी पूरी तरह से पाकिस्तान के खिलाफ नहीं हुआ था। सैनिक और आर्थिक ममद देना अमेरीका ने 2010 से शुरू किया। तब उसे लगा कि भारत उसका मित्र है और चीन के खिलाफ एक बड़ी शक्ति भी। भारत ने भी रूस पर अपनी पूर्ण निर्भरता कम करनी शुरू की। रूस भी अमेरीका के लिए उतना बड़ा खतरा नहीं रहा जितना चीन।
इसलिए तुलनात्मक आंकलन में कई तथ्यों का ध्यान रखना होगा। अमेरीका के मदद बंद करने के बाद दुनिया के तमाम देश भी पाकिस्तान से आतंकवाद का दंश झेलने लगे। फिर तो पाकिस्तान अलग-थलग पड़ गया। मुंबई हमले में कसाब के पाकिस्तानी नागरिक होने के बावजूद पाकिस्तान और लश्कर डिनायल मोड (इनकार के भाव) में रहे । पुलवामा हमले में जैश ने हिमाकत दिखाते हुए घटना को अंजाम देने वाले फिदायीन का विडिओ भी जारी किया तो पाकिस्तान मुंह छुपाने लायक नहीं था।

अब जरा तस्वीर का दूसरा पहलू देखें। एक ओर प्रधानमंत्री इमरान खान पाकिस्तान की मजलिस-ए-सूरा (संसद) में ‘शांति के प्रतीक’ के रूप में भारतीय पायलट अभिनन्दन को रिहा करने का ऐलान कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर उनकी सेना के आला अधिकारी खैबरपख्तूनख्वा के तामाम जिलों में खतरनाक कबायलियों के साथ जगह-जगह ‘जिरगा’ (महा-पंचायत) कर उन्हें भारत के खिलाफ युद्ध के लिए तैयार कर रहे थे। आतंकी संगठन अल बद्र के तीन हथियारबंद प्रतिनिधि दीर जिले के मुख्य चौराहे पर अपने संगठन में भर्ती की प्रक्रिया का एलान कर रहे थे। ‘मुजाहिदीन और पाक मिलिट्री एक हैं’ कह कर उन्हें भरोसा दे रहे थे। पाकिस्तानी अखबार डॉन ने 28 फरवरी, 2019 के संस्करण में इसका खुलासा किया और भारतीय खुफिया विभाग के पास भी इसके प्रमाण हैं। ये वही कबायली हैं जिन्होंने 1947 में भारत पर हमला किया था और भयंकर हिंसा, लूट और बलात्कार के बाद लगभग कश्मीर पर कब्ज़ा करने जा रहे थे। उसी समय महाराजा हरिसिंह ने भारत में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किये और भारतीय सेना ने इन्हें बड़ी मुश्किल से खदेड़ा।

ब्रिगेडियर वकार जफर रजा के विडियो में सेना की मंशा का पता चलता है कि कश्मीर में आतंकवाद को एक नए आयाम पर ले जाया जाय। यही कारण है कि आपस में लड़ते रहे इन कबायलियों के दो साल पहले जब्त हथियार पाकिस्तानी सेना ने वापस दे दिए हैं। उधर अल बद्र के इन तीनों में से एक इलाके के युवाओं को इस संगठन में भर्ती हो कर पाकिस्तानी सेना के हाथ मजबूत करने की अपील कर रहा था। इसी इलाके के बालाकोट जैश ट्रेनिंग कैंप पर भारतीय एयरफोर्स ने बमबारी की थी। अल बद्र की जम्मू-कश्मीर में प्रभावी सक्रियता रही है और भारतीय खुफिया एजेंसियों के अनुसार जैश-ए-मुहम्मद और इसके सरगना मसूद अजहर के खिलाफ वैश्विक दबाव को देखते हुए पाकिस्तानी सेना ने अब अल बद्र को व्यापक और शक्तिशाली बनाने का दौर शुरू किया है। फाटा क्षेत्र के खैबर पख्तूनख्वा में विलय के बाद पाक सेना तथाकथित सुरक्षा समितियां बना कर उनमें भर्ती कबायलियों के हर महीने पैसा पहुंचाती है।

अब सेना इनका इस्तेमाल भारत में और खासकर कश्मीर में व्यापक हमले के लिए करना चाहती है। दरअसल ऐसे करीब एक दर्जन संगठन समय-समय पर नाम बदल कर भारतीय सीमा पर सक्रिय हैं। इन सबका आर्थिक स्रोत भी मुख्यत: एक ही होता है। अगर एक को प्रतिबंधित किया गया तो पाक सेना दूसरे को सतह पर रातो-रात ला देती है। यही कारण है कि आतंकवाद खत्म करने का जो तरीका भारत या दुनिया के तमाम मुल्क सोच रहे हैं, उससे खत्म होना तो दूर, बढ़ता जाएगा।
आज भारत जिस सटीक हमले को अंजाम दे कर पाकिस्तान के खैबर पख्तून्ख्वा के बालकोट जंगल-पहाडि़यों पर बनाये गए फिदायीन ट्रेनिंग कैंप में तबाही मचा सका, उसका बड़ा श्रेय एयरफोर्स के साथ ही भारतीय खुफिया एजेंसियों को जाता है। ऐजेसियों ने वह लिस्ट भी उपलब्ध कराई, जिसमें वहां ट्रेनिंग कैंप में मौजूद ट्रेनरों के नाम पते थे। साथ ही उन नए फिदायीन रिक्रूट  युवाओं के नाम और पते भी थे जिन्हें धर्म के नाम पर बरगला कर आत्मघाती दस्ते के रूप में तैयार किया जाता था। यानी भारतीय एजेंसियां यहां तक जानती थी कि पाकिस्तान के किस गरीब इलाके से कौन सा बच्चा/युवा किस आतंकी संगठन ने उसके मां-बाप से खरीदा है। हालांकि कहने को उसे धार्मिक शिक्षा का मुलम्मा दिया जाता है। दरअसल इन्हें ले जाकर इनको मानसिक रूप से इस बात का विश्वास दिलाया जाता है कि ये सौभाग्यशाली हैं कि अल्लाह ने उन्हें अपने काम के लिए चुना है। खैबरपख्तून्ख्वा के ही फाटा क्षेत्र में कुटीर उद्योग के रूप में बनाये जा रहे सुसाइड जैकेट पहना कर लक्ष्य के बारे में बताया जाता है। भारतीय खुफिया एजेंसियों की पैठ इतने अन्दर तक है कि वह जैश-ए-मुहम्मद के सरगना की हर क्षण की गतिविधि की जानकारी लेती रहती है। यही कारण है कि पुलवामा फिदायीन हमले के बाद सबसे उपयुक्त विकल्प चुना गया।

जो दुनिया के खुफिया सिस्टम को और उनकी कार्य प्रणाली को नहीं जानते वे पूछ सकते हैं कि अगर इतनी जानकारी थी तो कैसे मुंबई हमला हुआ। कैसे पुलवामा में आरडीएक्स लेकर फिदायीन घुसे और सफल रहे। इसके दो कारण होते हैं। दरअसल, शत्रु देश आतंकी हमला करना चाहे तो कहीं-न-कहीं से रास्ता निकल जाता है। मुमकिन है खुफिया एजेंसी के पास 100-150 जानकारियां हो लेकिन जब शत्रु देश में बड़ी तादात में फिदायीन तैयार किये जा रहे हों और वहां की अवाम की चेतना कुंठित हो गयी हो तो ऐसे हमले को रोकना मुश्किल होता है। फिर भारत-पाक सीमा की कुल लम्बाई लगभग 3350 किलोमीटर की है। तीसरी दिक्कत है भारत स्थिति कश्मीर में अलगाववादियों का शत्रु देश से हर मदद। स्थानीय लोगों में भी एक वर्ग है जो पैसे के लालच में या भय से सीमा पर से हो रही गतिविधि को पनाह देता है।
गैर-मुल्क से मिलने वाली खुफिया जानकारी से हम हमला तो कर सकते हैं पर उधर से होने वाली आतंकी गतिविधियों पर पूर्ण लगाम मुश्किल होता है। यही हुआ कि सटीक जानकारी पर हमने सर्जिकल स्ट्राइक भी किया और उससे भी सफल दुनिया को चौंकाने वाला वायु हमला भी। यह समय इस विवेचना का नहीं हैं कि पहले क्यों नहीं हुआ।

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